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सोमवार, 8 सितंबर 2014

कब हटेगा कोहरा, कब छटेगी धुंध


मौन
असंख्य शब्द आ और जा चुके हैं
तुम्हारे और मेरे बीच
मगर फिर भी हम वह नहीं कह सके
जिसके बाद मौन भी एक भाषा बन जाता है


बंदिशें
न जाने बंदिशों की कैद में हू मैं
या मेरे ही मन ने कैद कर लिया है बंदिशों को
अपनी परवाह नहीं रही अब
चाहती हूं कि
ये बंदिशें आजाद हों


संभावना
कहीं कुछ रहे न रहे
कोरे कागज पर हमेशा
शेष रहेंगी
संभावनाएं।


संवेदना
इच्छाओं के बाजार में
सरेआम
बेहद गिरे हुए दामों पर
बेची जा चुकी हैं संवेदनाएं
दिखाने और जताने को हैं सिर्फ सिसकियां
आह...
ओह...
ओहो...
आदि-आदि।


सोमवार, 2 दिसंबर 2013

प्रेम लुप्त हो चुका है

प्रेम लुप्त हो चुका है
डायनासोर से भी बहुत पहले।

मोहब्बतों की मौत के साक्षी रह चुके हैं
खुद प्यार करने वाले।
अब सिर्फ इश्क फरमाया जा रहा है।
...और जब हमारी औलादें रखेंगी
दिल की दहलीज पर कदम
तब युद्ध होगा
लुप्त हो चुके प्रेम को
फिर से जीवित करने का युद्ध
क्योंकि ऊब जाएंगी पीढ़ियां इश्क फरमाकर
तड़पेंगी प्यार के लिए पानी से ज्यादा
बीमारियों का इलाज बन जाएगा प्रेम
नसीहत में कहा जाएगा-
सुबह-दोपहर-शाम
खाने के बाद
खाने से पहले

आपको देना है
इन्हें अपना स्नेह भरा वक्त, प्रेम भरे पल।
प्रेम की खोज होगी
प्रेम पर शोध होंगे
अध्ययन किए जाएंगे
कि आखिरी बार कब, कहां, किसने किया था वह प्रेम,
जिसके अवशेषों से बचाया जा सके प्रेम का अस्तित्व

तब शायद किसी को हमारा भी दिल कहीं टूटा हुआ मिले...

रविवार, 18 दिसंबर 2011

एक जरुरी कवि


सुबह सुबह दफ्तर से फ़ोन आया अदम गोंडवी नही रहे. उनके लिए कुछ खास सामग्री इकठा करनी थी. ख़ास पेज के लिए. साहित्य मेरे लिए सांसों की तरह है और ये नाम बिलकुल अनजान. ये बात मेरे बॉस को भी शायद ठीक नही लगी जब उन्होंने मुझसे पूछा-जानती हो न अदम जी को, आज उन्ही पर काम करना है.. और मैंने अन्म्नाते हुए कहा, जान लुंगी सर जल्दी पहुँचती हू दफ्तर. लेकिन अनमनी से न मेरे भीतर कुल्बुका रही थी. कलाकार हैं या कवि. कौन है ये. मैं कैसे नही जानती इन्हें. कहाँ सूना है इनका नाम. एक दोस्त को फोन किया उन्होंने तुरंत एक ही बार में अदम जी का पूरा परिचय उनके अल्फाज मेरे सामने रख दिए और मेरी सोई हुई स्मृति अचानक जगी, बहुत साल पहले एक वाद विवाद प्रतियोगिता में मैंने शुरुआत ही इन पंक्तियों से की थी ...

 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी

ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया

सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार

होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की. 



तब नही जानती थी कि किनके अल्फाजों को अपने पक्ष का हथियार बना रही हूँ...आज जानें क्यों उनके जाने पर ऐसे लग रहा है कि कोई अपना बिना मिले ही चला गया. अफ़सोस भी है और अपनी अन्जानियत का गहरा अहसास और आघात भी. एक मित्र या कहूँ कि वरिष्ठ मित्र और  आलोचक हैं मेरे जो अक्सर मेरी कवितायेँ पढ़कर  कहते है -ये क्या लिखती रहती हो चाँद, सूरज, आसमान और धरती. प्यार इश्क और फूल पत्ते, एक ऐसे कविता लिखो जो जरुरी हो तुम्हारे लिए नही सबके लिए आम इंसान और देश दुनिया के लिए. लेकिन आज उनकी ये बात मुझे फी याद आई और लगा एक जरुरी कवि चला गया जिसकी हर कविता जरुरी थी और हमारे लोगों कि जरुरत भी..
ये साल तमाम बड़े नाम हमें अलविदा कह चुके हैं सिलसिलेवार
मैं तो किसी के नीजी जीवन में शामिल नही थी
न ही किसी कि बहुत बड़ी प्रशंसक
मकबूल फ़िदा हुसैन के जाने पर लगा इन्हें क़तर जाने की बजाय इनकी कदर होनी चाहिए थी देश में ही
भूपेन हजारिका गए तो लगा कि एक समाज कि जलती हुई लौ से घी ख़त्म हो गया
देव साहब की जिन्दादिली और उनकी दिनचर्या से हमेशा अपनी सोच के अंधेरों में घिरा होने पर प्रेरणा ली है मैंने तो उनका जाना मेरे लिए मेरी एक उम्मीद का टूटना था
लेकिन अदम जी तो एक अनजान बनकर मेरे आस पास अपने शब्दों के रूप में  रहे और जाते जाते इतना परिचित कर गए कि मैं बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रही हूँ कि इतने जरुरी कवि को नही जानती थी मैं और कविता लिखती हूँ
क्या मैं लिख पाऊँगी कभी कोई जरुरी कविता ?
 

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

प्रेम - कुछ सवाल(२)

बुरा होना बहुत जरुरी है
क्योंकि अच्छा बनकर
आप वो नहीं रह जाते
जो आप हो या होना चाहते हो
लेकिन जब आप बुरे होते हो
तो कितने लोग  ये समझ पाते हैं
कि अब वास्तव में आप अच्छे हो
कम से कम
सच्चे तो हो
....................................................................
मैं कहूँ कि बहुत बुरा महसूस हुआ मुझे
जब तुमने मेरे हाथों को
लोगों की उस महफ़िल में
अपने हाथों में लिया
जबकि
प्यार का
खामोश सा इजहार भी
हो चुका  है हमारे बीच
मुझे नहीं लगता प्यार में छूना
एक नैतिक जिम्मेदारी या परम्परा है
मुझे नहीं लगता कि
छुए बिना आगे नहीं बढ़ सकता प्यार
मुझे लगता है
इतना प्यार है हमारे दरम्यान
कि दरो दीवार की ये दूरियां
उसे कभी नहीं मिटा पाएंगी
वो एहसास
जब तुमने छू लिया था
मेरे दिल को गहरे तक
वो कभी धुंधला नहीं पड़ सकता
मेरी आँखों में
कभी मैला नहीं हो सकता
उससे मेरा आंचल
पर मैं बुरी हूँ तुम्हारी नजरों में
क्योंकि मैंने अपनी भावनाओ का भी ख्याल रखा
तुम्हारे प्यार को सहेजने और समझने के साथ
कह बैठी मैं तुमसे अपने दिल की बात
भूल गई उस शिक्षा को
जो अक्सर माँ को कहते सुना था
मर्दों से हर बात नहीं बाटनी चाहिए
मैं बुरी हूँ
क्योंकि मैं तुम्हे कोसना नहीं चाहती थी बाद में
मैं बुरी हूँ क्योंकि
मैं कुछ पलों के लिए नहीं
ताउम्र के लिए चाहती थी तुम्हारा साथ
..................................
एक लड़की है
जो मुझे लगता है कि
तुमसे थोड़ा  ज्यादा समझती है मुझे
मैं उसे पढ़वा  सकता हूँ अपनी प्रेम कवितायेँ
जिन्हें पढ़ना  तुम्हे नहीं है पसंद
या कि
तुम नहीं समझ पाओगी
कि तुम्हारे ख्यालों में खोकर ही
लिख बैठा था मैं
तुम ढूंदोगी  उनमे
किसी और का अक्स
मैं कहूँ कि
एक लड़की है
जो मुझे अपने जैसी लगती है
जिससे घंटों बातें करते वक़्त
मैं भूल जाता हूँ
वक़्त के बारे में सोचना
तब क्या करोगी तुम
मेरी प्रेयसी 
तुम खुद को कटघरे में खड़ा कर दोगी
या उठा दोगी मेरे चरित्र पर सवाल
..............................................


( ये दो अलग अलग बातें हैं .
एक में प्रेमिका अपने प्रेमी से संवाद कर रही है
और दूसरे में एक पति अपनी पत्नी से जिससे वो बेहद प्यार करता है.
अब सवाल ये है की प्रेम भरे इन रिश्तों के बीच  ये सवाल दीवार बनकर क्योंकर उठ खड़े हुए है क्या इनका कोई जवाब है या फिर ... एक वक़्त पर हर अहसास हर जज्बात इसी तरह खोखला हो जाता है ??? )



सोमवार, 19 सितंबर 2011

मन शैतान हो गया है


मन करता है नास्तिक हो जाऊं
मन करता है किसी को नाराज कर दूँ
और कभी न मनाऊँ
किसी को दूँ बेइंतहा मोहब्बत
और फिर मैं भी बेवफाई कर पाऊं
मन करता है अहसासों का
अंश अंश निकालकर
किसी कूड़ेदान में फेंक आऊं
मन  करता है किसी पहाड़ी जगह नही
पकिस्तान में जाकर छुट्टियाँ बिताऊं
मन करता है तोड़ दूँ
सारे परहेज और रजकर खाऊं
मांगूं नही
छीन लूँ
अपना हर हक़ - अधिकार
मोड़ दूँ तोड़ दूँ मरोड़ दूँ
उन सारे गृह नक्षत्रों को जो मेरे
खिलाफ
हो गए हैं
काट दूँ सारी किस्मत की रेखाएं
हाथ से
और खुद सपनों की एक तस्वीर हथेली पर सजाऊं
अब मन करता है खुद  पर करूँ एक अहसान
भूल जाऊं
सबको
और याद रखूं बस अपना नाम
ये मन अब शायद चंचल नही रहा
शैतान हो गया है

शनिवार, 26 मार्च 2011

एक चुटकी चैन


कुछ दिन पहले किसी ने ये दुआ दी थी मुझे  'तुम्हारा  इंसानी रूप दुनिया की हर तीखी धूप में बचा रहे। यह रंग जो तुम्हारा अपना है हंसी का, खुशी का, बचपन का, रिश्ते का, बरकरार रहे हर उस हमले से जो मासूमियत पर होता ही है हर तरफ से।
काश कि यह सब जिस जमीन पर खडा होकर मैं कह रहा हूं उसको पूरा पूरा पढ पातीं तुम। हालांकि उससे भी फर्क यही पढता कि तुम रो देतीं।''
 हाँ मैं रो देती ...
अधूरे अहसास और अनकहे लफ्जो के इस मकडजाल के बीच सच  में मुश्किल तो है उस जमीन को पूरा पूरा पूरा पढ़ पाना जहाँ जज्बात सिर्फ जरुरत भर रह गए है..जहाँ प्रेम करने के लिए प्रेम नही किया जा रहा.. जहाँ हम सब एक दुसरे के लिए सिर्फ माध्यम बन गए है.
लेकिन क्या फर्क पड़ता है अगर मैं उस जमीन को न भी पढूं तो ...
कदम बढ़ाते ही तो पैरों के नीचे वही जमीन होती है
और बिना पढने की मोहलत लिए मुझे उस जमीन को समझ कर संभल कर कदम रखने के बारे में सोचना पड़ता है.
हाँ मुझ पर हमला होता है
जब मेरे मासूम सवालों को
मायूस कर देने वाले जवाब मिलते है
जब मेरे दिल में बैठकर कोई मेरे दिमाग को
परख रहा होता है
जब उम्र भर के लिए साथ हो जाने वाला कोई लम्हा
बरसो पुराना बीता पल बन जाता है
और जब
मेरी आँखों को पढ़ सकने वाला
कोई शख्स
ढेरों शब्दों को भी नही समझ पाता है 
ये निरी कोरी भावनाए है
हर किसी का  दिल बहता होगा इनमे
मेरा जरा सा डूब गया है
और इस डूबते से मन को तिनके की तरह इन शब्दों का सहारा मिल रहा है
और ये शब्द कम्भक्त नशा बन गए है शराब की तरह
जिस दिन न पीयू नींद नही आती
 जिस दिन न लिखूं चैन नही मिलता
और फिर इतनी सख्त जमीन पर चलने के बाद
एक चुटकी चैन तो चाहिए न ....




शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

सात खून माफ़ और आठवां ...



अच्छी फिल्में सिर्फ फिल्म के लिहाज से ही अच्छी होती हैं जिंदगी के लिहाज से शायद ....
परदे पर हम अपनी दमित इच्छाओ की पूर्ति होते देख रोमांचित और उत्साहित महसूस  करते हैं और फिल्म हिट हो जाती है क्योंकि असल जिंदगी में सात खून माफ़ नही होते...और सात बार शादी करने का जोखिम उठाना .....????
हमारा आज, अभी और इस वक्त का सच ये है कि पत्नियाँ एक पति के साथ सात जन्मों के रिश्ते में बंधने के बाद शायद ७००० बार मरती हैं
बहुत सारे पतियों को लग सकता है कि ये एक तरफ़ा सच है और उनके पक्ष को दरकिनार कर दिया गया है ..तो हाँ...कर दिया है ..क्योंकि उनके पक्ष का प्रतिशत बहुत कम है..खैर इसे मेरी खुन्नस न समझिएगा सिर्फ एक बात लिखी है जो देखी और महसूस की अभी तमाम दुनिया देखना बाकी है और फिर हो सकता है कि विचार भी बदल जाये...
लेकिन विशाल भारद्वाज ने हमारे संकुचित समाज के सामने आंखे फाड़ कर, कान खड़े कर और कुर्सी से चिपक कर देखी जाने वाली एक फिल्म का प्रसार किया है ....जिस फिल्म के ख़त्म होने  के बाद अनजाने ही लोग standing oveation देते नजर आये....क्योंकि सात खून हो जाने के बाद शायद ये देखना किसी को गवारा न था कि प्यारे से शुगर( विवान शाह) का भी खून हो गया है ..साहेब (प्रियंका चोपरा) का वो शुगर जिसका एक बच्चा और बेहद प्यार करने वाली एक पत्नी है इसलिए हर बॉलीवुड फिल्म की तरह इस फिल्म की भी एंडिंग साइड हीरो और साइड हेरोइन के मिलन के साथ हैप्पी हो गई. लेकिन कुछ निराशा, अवसाद, अहसास और सवाल शादी नाम के रिश्ते से जुड़ते भी नजर आये जो कि हमारे देश में सिर्फ एक रिश्ता नही बल्कि भरा पूरा उत्सव है..
................
एक तरफ प्यार की तलाश में गुनाह करती औरत( सूजैना, प्रियंका चोपरा) ..और असफल होती सात शादियाँ और दूसरी तरफ बीवी बच्चे के साथ खुशहाल  जिंदगी जीने वाला एक छोटा सा परिवार ( विवान और कोंकना सेन शर्मा)
,क्या लगता है ????
शादी नाम की संस्था सिर्फ शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई एक औपचारिक परम्परा है या एक शादी के साथ भी हमें तन मन और ...धन तीनो का सुख मिल सकता है. फिल्म सिर्फ प्यार की  तलाश में धोखे खा रही एक औरत की कहानी है या ये सच दिखाने वाला एक आईना भी कि हर औरत एक बार अपने पति को मारने के बारे में जरूर सोचती है.
अजीब तरह से बदल रही है यार ये दुनिया
प्यार करने की भी एक निश्चित स्ट्रेटजी हैं यहाँ 
और शादी इस रिश्ते पर तो भयंकर रूप से प्रश्नचिन्ह  लग रहे है 
देखना ये है कि शेष क्या बचेगा 
और सिनेमा की दुनिया में सात खून माफ़ होने के बाद असल जिंदगी का आठवां खून क्या माफ़ हो पायेगा

 

dnt just obey boss



सिर्फ घोटालों ही नहीं तमाम तरह के मोह और माया जालों में फंसे धंसे देश के बेदाग़ छवि वाले प्रधानमन्त्री कह रहे है कि मैं जॉब कर रहा हूँ. ये बात सुनकर एकबारगी तो प्रधानमन्त्री जैसे बड़े से पद की महिमा बेहद छोटी नजर आती है लेकिन वहीँ दूसरी दफा सोचने पर कीचड़ में कमल की तरह खिलते मनमोहन सिंह दिखाई देते है जो असल मायनो में पार्टी प्रधान के दिशानिर्देशों पर शिद्दत से काम कर रहे है बिलकुल जॉब के शाब्दिक अर्थ को चरितार्थ करते हुए ...just obey boss . लेकिन उनके पद की गरिमा और गुंजाईश को नौकरी नुमा घेरे में कैद करना उस मिशन के साथ नाइंसाफी है जिसके  आधार पर इस पद की अवधारणा बनाई गई थी. 
बात सिर्फ प्रधानमन्त्री के ब्यान पर टिप्पड़ी करने की नहीं है बल्कि ये भी है कि अगर हम सब लोग अपने काम को सिर्फ जॉब मानकर करें जिम्मेदारी और जवाबदेही समझकर नहीं तो क्या इस विकासशील देश के विकास का पहिया चल पायेगा ...जो सोच पहले से ही  संकुचित है अगर उसे नौकरी समझकर सीमित भी कर लिया गया तो 
किसी कंपनी में बतौर प्रशिक्षु शुरुआत करने वाली कोई महिला उसी कंपनी के सर्वोच्च पद पर पहुँच पाएगी...
क्या एक टी  वी प्रोग्राम से शुरुआत करने वाला व्यक्ति एक पुरे न्यूज़ चैनल को स्थापित कर पाता..
पेट्रोल पम्प  पर काम करने वाल एक अदना सा कर्मचारी aदेश के नामी अमीरों में शामिल होता 
ऐसे कई सवाल है जो मंत्री जी के एक जवाब पर खड़े हो गए हैं 

 

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

पहले से ज्यादा जवां लगती है हर बार ये दिल्ली



लुधियाना में बैठकर दिल्ली की बात. बहुत नाइंसाफी है जनाब. हाँ है तो. लेकिन क्या करें कमबख्त दूरियों ने दिल में दिल्ली को और भी गहरे घुसा दिया है. चार दिन की छुट्टी के बाद लुधियाना लौटी हूँ तो दिल्ली में कई नए बने फ्लाई ओवर, पहले से कुछ ज्यादा फैशन परस्त हो गए लोगों और प्रेम के उन्माद में नियम तोड़ते( दरसल मेट्रो में अब महिलायों के लिए अलग से सीट अरक्षित कर दी गई है ऐसे में जो लोग जोड़े से मेट्रों में सफ़र करते है उनके लिए खासी परेशानी होती है जैसा की मुझे उस वक्त महसूस हुआ, मेट्रो कर्मचारी ने लड़के से वुमन कम्पार्टमेंट से जाने के लिए कहाँ तो वह उस कर्मचारी से ही झगड़ने लगा उसके साथ उसकी महिला मित्र ने अन्य महिला यात्रिओं के विरोध करने पर उनके साथ भी गलत तरह से बात की , मामला सिर्फ इतना था की वेह दोनों साथ खड़े होना चाहते थे और एक नियम उसमे बढा बन रहा था )  युवाओं के साथ पहले से कहीं ज्यादा जवां लगती दिल्ली कुछ भी सही लेकिन कुछ लिखने को मजबूर कर रही है. जैसे न जाने कितना कुछ समेटे है ये अपने गर्भ  में. जैसे किसी देवता के वरदान से मिले खजाने में धन ख़त्म ही नही होता उसी तरह दिल्ली के बारे में लिखने के लिए इतना कुछ है कि उसमे कुछ नया लिखने की शर्त कोई मायने ही नही रखती. अहसास तो शख्स बदलने के साथ खुद ब खुद नए हो ही  जाते है न . जैसे मेरा दिल्ली से नॉएडा जाने के लिए ३३ नंबर की बस पकड़ने और गंतव्य तक पहुँचने का अहसास आज भी मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देता है नही मुस्कान नही बड़ी सी हंसी. अगर आप इस बस से परिचित है और ये सब पढ़ रहे है तो अब तक मुस्कराहट आप के होटों को भी छु कर गुजर चुकी होगी अगर नही जानते तो माजरा ये है कि इस बस में सीट  तो दूर की बात है सांस लेने के लिए स्पेस मिलना भी मुश्किल होता है. अब शायद इस नंबर की बसों की संख्या बढा दी गई है तो कुछ सहूलियत हो लेकिन उस समय ३३ नंबर की बस में सफर करना और सुरक्षित लौटना जिंदगी की तमाम आपाधापियों के बीच जगह बना चुकी एक बड़ी चुनौती होतीं थी. मगर ये दिल्ली है और बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी बातें होती रहती है. इस शहर में आना भी बड़ी बात है रहना भी बड़ी बात है और अपनी जगह बनाना भी बड़ी बात है. और हाँ इस शहर का होकर भी इसे छोड़ जाना और फिर लौटकर अपना अस्तित्व बसाना ये सिर्फ बात ही बड़ी नही है ये काम भी बहुत बड़ा है ........आखिर बड़ा शहर है और हम छोटे लोग है वक़्त से भी और कद से भी ...हा हा हा. और फिर बड़ा बनने की न सही लेकिन बड़ा होने की ख्वाइशें अभी बाकी है ....

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लम्हा लम्हा तनहा तनहा अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ





लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
चाँद की चांदनी में खामोश रात
सूरज के उजाले में बेचैन दिन
वक़्त के सायें में सिसकते जज्बात
और साथ होकर भी जीना तेरे बिन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
हवा के महकते झोंको
में उचटता सा मन
बादल गरजकर बारिशें लाकर
हर शय  को भिगोता सावन
और गीली गीली भीगी भीगी सी इस रुत में
सुखा रह जाता मेरा दामन
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
लम्बे रास्ते दूर मंजिल
चलने का शौंक
और
पहुँचने का हुनर भी
फिर मिलना दिलों जाँ को
तोड़ देने वाली एक थकान
महफ़िल से गुजरकर
वीरान सा एक मकाम
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ
सांसो के एहसास से धड़कन की आवाज तक
कई मर्तबा तुझे खोकर
फिर से पाने की तारीख से आज तक
न जाने कितनी बार
मैंने खुद को तेरा होते हुए पाया है
और अब
जिंदगी का यूँ तुझे पराया कर जाना 
लम्हा लम्हा तनहा तनहा
अपनी अपनी सी कुछ उदासियाँ

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

तन्हाई पर नहीं 'रजाई' पर लिखूं



 आज सोचा कि
जिंदगी की तन्हाई पर नही 
हर रात मुझे गुदगुदाता है जिसका अहसास 
अकेले से बिस्तर की उस रजाई पर लिखू 
उन बातों पर नहीं
जिनसे बेमानी हो गए थे रिश्ते 
उन मुलाकातों पर लिखूं 
जिन्होंने हर बार दे छोड़ी 
दोबारा मिलने की एक वजह
उन किस्सों को न फिर से आम करूँ आज 
जिन्होंने हर खास पल को बना दिया था खोखला
अब लिखूं वो कहानिया 
जिन्होंने राजा रानी की ख़त्म हो चुकी कहानी को भी 
आगे बढ़ाने का होंसला दिया 
करूँ कुछ ऐसा क़ि
चाँद शर्माए और शिद्दत भी शर्मिंदा हो जाए 
देश दुनिया से दूर किसी द्वीप पर '
कोई ताजमहल नहीं 
एक तस्वीर बन आऊं 
बस एक वो ही न जान पाए
उसकी बेकरारी का मुझ पर असर 
और सारी कायनात को खबर हो जाए
क्यूँ लिखूं मैं कुछ दिल पर
दिल की बातों पर 
या दिल के बारे में
आज जिक्र करना चाहिए मुझे धड़कन का 
जिसने दिल के हर बदलते रुख को दिया है 
आगे बढ़ने का रास्ता 
ख्वाइशों और खामोशियों पर जाने कितना कुछ लिखा गया है आज तलक 
आज सोचती हूँ लिखूं उन इशारों पर 
जिन्होंने हर बार किया था खबरदार 
दिल की बातों में बह जाने से
दिखाया था आईना कई बार 
मिलाया था 
मेरे ही अक्स में मेरी जिंदगी से जुड़े हर अफ़साने से
उसने नहीं लिखे थे कभी ख़त मुझे 
भेजे थे कुछ एस ऍम एस 
संक्षिप्त सन्देश सुविधा के तहत
आज रोक लूँ मैं किसी तरह खुद को 
न पढूं दोबारा से उन शब्दों को 
जिन्होंने हकीकत से रुसवा कर दिया मुझे 
आज याद करूँ उन इमारतों को
जहाँ बचपन में मैंने अनजाने ही लिख दीये थे 
दो नाम 
एक बेनाम प्रेम कहानी के
क्यों ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?
सही सोचा है न मैंने 
जिंदगी की तन्हाई पर नहीं 
अकेले से बिस्तर की रजाई पर लिखूं



बुधवार, 5 जनवरी 2011

मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा.. ?





कितने दिन हो गए इस शहर में आये...आज भी हर शाम अलसाई सी है और हर सुबह ललचाई सी है. हालाँकि  इस शहर की  आबोहवा में खुद को तबसे ही शामिल कर लिया था जब दिल्ली से आ रही बस की खिड़की से मैंने वो बोर्ड देखा था. .. वेलकम टू लुधियाना सिटी . ये कोई  टूरिस्ट स्पोट नही था न ही कोई हिल स्टेशन, ये मेरी जिंदगी का पहला destination है ,  जहाँ मैंने अपने सपनो की तरफ अपना पहला कदम रखा था. शहर को जाना.. देखा.. जहाँ तक देख सकती थी, फिर लिखा भी.. उन बातों को जो चुभी जिन्हें महसूस किया. लेकिन लगा और लगातार लग रहा है कि शहर ने मुझे नही अपनाया. एक अजीब सा अकेलापन है यहाँ. हालाँकि अकेलापन अजीब ही होता है लेकिन मैं ये कहूँगी  कि ये अकेलापन अजीबोगरीब है. अजीब इसलिए कि अकेलेपन को दूर करने के जो उपाय है उन पर अमल नही हो पा रहा और जिन उपायों को अपनाने का मन है उन्हें खरीदने की पहुँच अभी नही जुटा पाई हूँ.
सार संक्षेप ये है कि यहाँ मन लग रहा है रम नही रहा. कुछ लोग यहाँ आकर लुधियानवी हो गए और मैं अब तक वो वजह नही जुटा पाई जिससे लुधियाना के कुछ लम्हे बटोर पाऊ अपनी यादों के लिए. नाम के साथ सरनेम जोड़ना तो दूर की बात है.
लोग अच्छे नहीं है जब ये सोचती हूँ तो लगता है क़ि मैं खुद भी तो बहुत बुरी सी हो गई हूँ शायद. और फिर किसी ने कहा क़ि पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा शायद इस शहर के साथ भी मेरी चाहतों का कुछ ऐसा ही सिलसिला  चल रहा है. मैं ही नहीं छू पाई हूँ यहाँ क़ि रूह को.. खैर आजकल तो धुंध भी बहुत है रूह को ढूँढ पाना फिर से एक मुश्किल भरा काम होगा. न जाने क्यों दिल चाहता है क़ि मैं उस रूह को न तलाश करू वो रूह खुद ब खुद मुझे दूंढ ले
 पहले से भी ज्यादा आलसी हो  गई हूँ यहाँ आकर ...............  

शनिवार, 1 जनवरी 2011

बीता साल- एक अलग शब्द, एक अनकहा अर्थ

बहुत सारा समय बीत गया
या सिर्फ एक साल ..
कविता सी रही जिंदगी
वक़्त से कदमताल करती हुई
या
उतार चढाव ने दी
एक अधूरी आखरी पंक्ति वाली
कहानी की  शक्ल
जिंदगी को
ख्वाबों को मिला खुला आसमान
या
अरमानो की आंधी में उड़ चले
मजबूर लम्हे और उलझे मसले तमाम 
बात कहकहो की बारात की
या
कुम्हलाया रहा सूरज जिस दिन
उस रात की बात
मामलात वो जिन्होंने तसव्वुर
को महका दिया
या
वो मशविरे जिन्होंने बेहद
मासूमियत से दगा दिया
बहुत सी शख्सियतें
और कुछ एक शख्स
या
महज एक बंदा खुदा का(माँ)
जिसने साल भर मिसाल बन
जीना आसान किया
जिसने हर साल, हर महीने, हर हफ्ते, हर दिन, हर पल को
अपने आंचल से छान
मुझे हर धूप से बचा लिया
फरवरी के महीने में भी जो खिले हुए फूलों से खरखराहट
सुनी थी मैंने
और जून की दोपहरी भी वो
जिसने पसीने को पहलूँ में छुपाने का लुत्फ़ दिया
एक अलग सा शब्द रहा वो साल जिसने
एक अनकहा अर्थ दिया

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

एक चुप सौ सुख

एक चुप सौ सुख
मगर इतना आसान भी नही है 
यूँ चुप रह जाना 
कितना भी हो 
थोडा या ज्यादा
लेकिन , मुश्किल तो है ही 
शब्दों को पी जाना 
होंटों को सी जाना 
कशमकश है कि
कह दूं तो 
शायद 
रातें खफा हो जाएँगी
ख़ामोशी से भी वैसी दोस्ती नही है मेरी
रहूंगी खामोश गर तो 
बातें जुदा हो जाएँगी
कैसे चुप रहूँ
इस मौन को तोड़ने के शोर के बीच
कैसे रहूँ स्तब्ध 
झंझावातों के इस दौर के बीच
मैं बोलती हूँ तो 
बोलने को वो मेरा कसूर बताता है
चुप रहने पर
चुप चाप ही जाने कौन
चुप रहने की सजा सुना जाता है
मैं अपनी जनम  कुंडली में 
खुद जो बना रही हूँ जिंदगी के निशाँ 
तो जमाना जिरह पाले है मुझसे 
मेरी हर बात ही पर एतराज जताता है 

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...