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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

खत के नाम एक खत


इस दुनिया के ऐसे बहुत से काम हैं, जो मैंने कभी नहीं क‌िए हैं।
मगर इन कामों में से एक काम ऐसा है जो मैं जल्द से जल्द करना चाहती हूं।
अगर कोई कहे कि यह मेरी जिंदगी का आखिरी दिन है तो भी शायद मैं सबसे पहले उसी काम को निबटाउंगी।
मैं खत लिखूंगी। जितना समय मेरे पास बचा होगा उतने खत।

सबसे पहला खत शायद एक प्रेम पत्र होगा।
जिसमें वो सारी बातें लिखी जाएंगी जो एसएमएस की शब्द सीमा के कारण कहीं नहीं जा सकीं।
या नेटवर्क फेल हो जाने के कारण सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुंच नहीं सकीं।
और वो सारी बातें जिन्हें कहने से पहले खुद को रोक लिया गया ये सोचकर कि कहीं शब्दों की धार इस कच्चे और नाजुक रिश्ते की डोर को तोड़ न दे।
और वो सारी बातें जिन्हें कह देने के बाद शायद हमेशा के लिए अटूट बंधन में बंध सके अधूरा रह गया प्रेम।

दूसरा खत मां-पापा को लिखा जाएगा
इस खत में वो सारी बातें होंगी जिनके बारे में दफ्तर से घर लौटने के रास्ते में सोचा गया मगर घर पहुंचकर जिन पर बात नहीं हो सकी।
वो सारी बातें जिन्हें कहने से पहले यह कहकर बात टाल दी गई कि आप नहीं समझोगी मम्मी।
आपको क्या पता पापा?
और आखिर में यह बात भी जरूर लिखी जाएगी कि दिन के 12 घंटे घर से बाहर और घर आने के बाद वाले 12 घंटे में से मुश्किल से सिर्फ एक घंटा आपके साथ बिताने के बावजूद भी आप मेरी जिंदगी के सबसे अहम लोग हैं। सबसे खास। सबसे अनमोल।

तीसरा खत दोस्तों को
इस खत में लिखने के लिए ढेर सारी बातें होंगी। जिन्हें काफी देर-देर तक याद कर-कर के लिखना होगा।
शायद इस बहाने हर एक दोस्त के बारे में सोचने का भी मौका मिल जाए।
शायद उसकी कोई ऐसी बात भी याद आ जाए जिस पर पहले कभी ध्यान ही नहीं गया होगा।
यह खत शायद उन आंसुओं से सील जाए तो हंसते-हंसते इस पर गिरते जाएंगे, इसे लिखते वक्त।
यह खत शायद बहुत मजेदार होगा।


चौथा और आखिरी खत कुछ अजनबियों के नाम
इस खत में वो लोग शामिल होंगे जिनके बारे में सोचने के लिए कभी वक्त ही नहीं निकाला गया। मगर वक्त पड़ने पर ये अजनबी इस तरह काम आए जैसे कोई अपना या शायद अपना भी नहीं।
वो दो लड़के जिन्होंने ग्रेजुएशन का फॉर्म भरने की आखिरी तारीख पर और ऐसे समय में जब मुझे ड्रॉफ्ट बनवाने की कोई जानकारी नहीं थी, मुझे ड्राफ्ट बनवाकर दिया।
वो एक आंटी जिन्होंने मुझे उस वक्त अपने सुरक्षा घेरे का अहसास कराया जब मैं पहली बार रात में अकेले बस का सफर कर रही थी।
वो एक आदमी जिसने मुझे सड़क पर अकेले देखकर कमेंट कर रहे एक लड़के को डांट लगाई।
और भी न जाने कितने लोग...
अफसोस कि यह खत अपनी सही जगह तक नहीं पहुंचाए जा सकेंगे।
कहां से ढूंढे जाएंगे इन अपने से अजनबियों के पते।
मगर मैं ये खत भी जरूर लिखूंगी।

पांचवा खत होगा उनके नाम जिनके पास मैं जा रही हूंगी - एन इनविजिबिल पावर कॉलड 'गॉड'  (इस आर्टिकल को लिखने के लिए दी गई सिच्युएशन के अनुसार)
वैसे जिनके पास जाना ही है उन्हें खत लिखने की क्या जरूरत..
मगर दूर रहकर उनसे की गई प्रार्थनाओं का जो हिसाब-किताब अक्सर गड़बड़ाता रहा है
उस पर बात करना बहुत जरूरी है...
वो प्रार्थनाएं जो हजार बार करने पर भी पूरी नहीं की गईं
और वो जिन्हें बिना मांगे ही ...
उन हालातों के बारे में भी तो बताना है जब उनसे विश्वास ही उठ गया
और उनके बारे में भी जब लगा कि वह हैं और हमें देखते हैं, सुनते हैं और जवाब भी देते हैं।

ए लेटर टू गॉड तो बनता है एक बार दुनिया छोड़ने से पहले।

मगर...
क्या ये खत लिखे जा सकेंगे?
क्या यह मालूम चल सकेगा कि हमारी जिंदगी का आखिरी दिन कौन-सा है?
और अगर मालूम चल भी जाए तो क्या हम खत लिखेंगे।
लिखेंगे तो कैसे लिखेंगे हम खत? क्या हमें आता होगा खत लिखना?
खत लिखने का चलन भी तो खत्म हो चुका है और इसी के साथ
न जाने कितना कुछ खत्म हो चुका है...

क्या एक कोशिश फिर से नहीं की जानी चाहिए
क्या आज ही हमें नहीं लिखना चाहिए अपनी जिंदगी का पहला खत...

सोमवार, 19 अगस्त 2013

भावनाओं की अर्थव्यवस्था

मुझे कुछ मिलने वाला था
...नहीं मिला
मैं दुखी हूं।
.................

उसके पास कुछ था
...छिन गया
वह दुखी है।
...............

तुम्हारे पास सब कुछ है
तुम्हारी हर दुआ कुबूल है
तुम्हारा हर ख्वाब सच है
अब पाने को कुछ नहीं है
तुम दुखी हो।
..............

दुख भी अजीब चीज है
................

मांग शून्य है
और उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है
.................

भावनाओं की अर्थव्यवस्था डगमगाने वाली है
..................

किसी कवि से दुखों का विज्ञापन करवाना चाहिए।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जब शब्द मरते हैं

एक आदमी था
बिलकुल वैसा ही जैसा होता है एक आदमी
मगर उस आदमी को सही-सही याद था
अपने जन्म का समय, तारीख और जगह।

उसने सुना एक जाने-माने विद्वान पंडित के बारे में।

वह उसके पास गया अपनी
किस्मत और उसका हुनर आजमाने

आदमी के हाथ की रेखाओं को पढ़ते ही 
विद्वान ने बता दिया उसके परिवार, सेहत, दाम्पत्य और करियर का हाल। 

समझा दिया आने वाली 
हर विपदा से बचने का उपचार

वह कब तक जीएगा
और मरने से पहले क्या-2 हासिल करेगा, 
इस बात का भी हो गया उस आदमी को ज्ञान

मगर परेशान हैं वह आदमी 
पिछले कुछ दिनों से बहुत।

बहुत हंसता है
और रो पाने की हर कोशिश
जैसे नाकाम हो गई है।

बहुत चुप रहता है
और कह दे किसी से ये चाहत
जैसे श्मशान हो गई है।


आदमी की जिंदगी और मौत की तिथ‌ि
बताने वाले विद्वानों 
को शायद नहीं मालूम हो पाता है
शब्दों की मौत का समय

इसका अहसास खुद समय करवाता है
जैसे अभी-अभी उस आदमी को हुआ है अहसास...

उम्मीद नामक एक शब्द मर चुका है उसके जेहन में 

और अब परेशानी की वजह बन रही है
मर चुकी उम्मीदों की भटकती आत्मा


विद्वानों को थोड़ा और विद्वान होने की जरूरत है शायद

गुरुवार, 20 जून 2013

मुझे धूप चाहिए

मुझे धूप पसंद है, उसने कहा था।
और मैंने तपाक से उसके मुंह की बात छीनकर कर उसे भला-बुरा कहना शुरू कर दिया था, '' ‌छ‌ि तुम्हें धूप  पसंद है, मुझे तो बा‌र‌िश पसंद है'' 
और फिर उसने भी तुरंत मेरी बात को लपक कर कहा था, ‘’मुझे बारिश बिलकुल पसंद नहीं है।‘’
वैसे बातें करने में मैं खुद भी बहुत माहिर हूं, लेकिन उसके तर्कों के आगे जीतना अक्सर मेरे लिए मुश्किल हो जाता था। उस दिन भी उसने मुझे बारिश के सैकड़ों नुकसान और धूप के हजारों फायदे गिना दिए थे। जवाब में मेरे पास सिर्फ वही घिसी-पिटी नॉनसेंस बकवास थी, जिसमें बारिश के होने से दो दिलों का धड़कना, किसी के लिए तड़पना और तन-मन में कुछ-कुछ होना शामिल था। हमारी बहस में कौन जीता, ये बताने के लिए किसी जज की जरूरत नहीं थी, क्योंकि हर बार की तरह उसकी जीत तय थी।
हारना यूं तो किसी को भी पसंद नहीं होता, लेकिन मुझे हारने से सख्त चिढ़ है। मैं हार बर्दाश्त ही नहीं कर सकती। उससे बात करने की सबसे खास और दिलचस्प बात ही ये थी कि उससे बातों में हारकर भी मुझे बुरा नहीं लगता था। ऐसा इसलिए होता था कि मैं हार कर भी जीत जाती थी, आखिर बिना कोई किताब पढ़े, बिना घंटों इंटरनेट पर आंखें गड़ाए मुझे इतनी सारी बातें जो पता चल जाती थी। चलते-फिरते विकीपीडिया की तरह था वो। अब इससे पहले कि आपका ध्यान असल मुद्दे से ज्यादा इस बात पर जाए कि वो कौन था तो वो मेरा एक दोस्त था। जिससे अक्सर साहित्य, राजनीति, शहर, समाज, देश, दुनिया, प्यार और सपने जैसे विषयों पर घंटों चर्चा हुआ करती थी। अब काफी समय से बात नहीं हुई है इसलिए लिखते वक्त वाक्यों में भूतकाल का भावना आ गई। अब मुद्दा यहां हमारी बातें या दोस्ती नहीं है, मुद्दा है बारिश और धूप।

मुझे हमेशा से बारिश बहुत पसंद रही है। हालांकि ऐसा भारत में कई लोगों के साथ है और खासकर लड़कियों के साथ। हो सकता है कि बॉलीवुड की फिल्मों का असर हो। लेकिन ऐसा सच में है।
चलो, अब बारिश का पसंद होना या न होना अपनी जगह है, लेकिन किसी को धूप पसंद है, ये बात समझना मेरे लिए अब से पहले तक काफी मुश्किल था।
कहते हैं न वक्त बड़ी चीज है। सब समझा देता है। हर बात और हर जज्बात। पिछले कुछ दिनों में काफी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी सोच को या कहिए कि पसंद पर ही प्रश्नचिंह् सा लगा दिया है। अब ये सोचने से पहले कि मुझे बारिश पसंद है, खुद को भीतर से कई बार खंगालना पड़ता है।

हाल ही में हम वैष्णो देवी की यात्रा पर गए। वहीं से कुछ किमी की दूरी पर एक पहाड़ी एरिया है पटनीटॉप। हर तरफ पहाड़ और हरियाली। जरा सा सिर ऊपर उठाओ तो लगता है कि बादल आपको छूकर जा रहे हैं। कहीं लगता कि पेड़ों ने बादलों की टोपी पहन रखी है। कहीं लगता है कि पहाड़ बादलों का कंबल ओढ़कर सो गए हैं। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वहां मौसम बदल रहा था एक पल में बारिश होती थी, एक पल में रुक जाती थी। दिल्ली के 47 डिग्री टेम्परेचर के बाद वहां जाना किसी जन्नत से कम नहीं था। लेकिन सिर्फ एक दिन वो भी पूरा नहीं, समझ लीजिए एक दिन के सिर्फ कुछ घंटे वहां बिताकर, पूरा समय बारिश को महसूस कर उसमें रमकर अचानक मुझे धूप की कमी महसूस होने लगी। ऐसा लगा जैसे मुझे तुरंत एक धूप का टुकड़ा मिल जाए और मैं उसे अपने सिर पर रख लूं। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जब हम रात को तकरीबन 11 बजे वहां से लौटे तब बारिश और भी तेज हो चुकी थी। और मैं, जिसे हजार परेशानियों में भी अगर कोई चीज खुशी दे सकती है तो वो है बारिश, वो लड़की धूप के लिए तरसते हुए वापस लौटी थी। उस वक्त, वक्त शायद मुझे समझा रहा था कि धूप की अहमियत क्या है।

अहमियत तो शायद बारिश और धूप दोनों की है। लेकिन फर्क ये है कि बारिश सिर्फ अमीरों का मौसम है। गरीब और सड़क पर चलने वाले लोगों को जीने के लिए धूप चाहिए होती है। धूप में पसीना बहता है तो उनके घर-परिवार के लोगों की जिंदगी सुकून से चलती है, लेकिन बारिश में जब घर की छत से पानी टपकता है और कमजोर चप्पलें कीचड़ में फंसकर टूट जाती हैं तो जीना मुहाल हो जाता है। फिर बेशक इन सब बिंबों के बीच मुझ जैसा कोई व्यक्ति अपने किराये के मकान की बालकनी में बैठे-बैठे हाथों को जाली से बाहर निकालकर भिगोते हुए कितने ही बेमानी ख्वाब क्यों न सजा रहा हो...

और इन सब भावनात्मक बातों से ज्यादा अहम और बड़ी घटना उत्तराखंड में बारिश से हुई तबाही है, जिसके आगे ऊपर लिखे सारे कारण एकदम बौने हैं...

शनिवार, 11 मई 2013

भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए


वे कच्ची उम्र के नहीं थे।
जवानी को पार करके काफी आगे निकल चुके थे।
दो जवान बच्चों की शादी कर चुके थे।
अच्छे खासे बुजुर्ग व्यक्ति थे।
बातों ही बातों में कमिटमेंट की बात चली और उन्होंने तपाक से कहा-
कमिटमेंट तो होता ही तोड़ने के लिए है। फिर इतना क्या डरना!
अब मुद्दा यहां यह नहीं है कि किस मुद्दे पर उन्होंने यह बात कही।
मुद्दा यह है कि उन्होंने यह बात कही।
उन्होंने यानी 65 बरस के एक ऐसे व्यक्ति ने जो अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल जिंदगी में उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरी तरह सक्रिय है।
मैं यहां सिर्फ यह सब इसलिए नहीं लिख रही कि
मुझे उनकी बात बुरी लगी
या
बुजुर्ग उम्र के व्यक्ति का ऐसी बात कहना शोभा नहीं देता।
मैं यहां यह सब इसलिए लिख रही हूं कि 
बच्चे, बूढ़े, जवान
अमीर गरीब
महिला पुरुष
हर उम्र, लिंग और वर्ग का व्यक्ति यह बात अच्छे से मान चुका है कि कमिटमेंट होता ही तोड़ने के लिए है।

कैसी मान्यता है ये!

कहां से आई है?
क्या हमारे ही दिए हुए धोखे, दगा और अविश्वास ने हमारे ही आसपास के लोगों को ऐसा बना दिया है।
या फिर एक रस्म शुरू हो गई है इनसानों के बीच 
उन बादलों की तरह जो जेठ की दोपहरी में गरज-गरज कर जी को जलाते हैं, मन को ललचाते हैं और बिना बरसे ही चले जाते हैं।
आसमान में बादल को देखकर भी धरती के सूखे रह जाने जैसा ही होता है वह पल
जब हम आप एक दूसरे को दिलाए गए भरोसे पर खरे नहीं उतरते।


भाषण देने का तात्पर्य बिलकुल नहीं है।

लेकिन एक टीस है
जिसे निकालने की शैली में भाषणनुमा वाक्य घुसपैठ करते जा रहे हैं
और मैं उन्हें रोक नहीं पा रही हूं। 


बात सिर्फ प्यार, मोहब्बत के कमिटमेंट की नहीं है।

बात उस बात की है
जब एक कामयाब बेटा अपने बूढ़े मां-बाप से हर‌ महीने मिलने और घर खर्च के पैसे देने का वादा करता है और किसी भी महीने मिलने नहीं आता।


बात उस बात की है 

जब आज की कामकाजी मां हर दिन अपने बेटे को यह विश्वास दिलाती है कि वह उसके साथ दफ्तर से आकर जरूर खेलेगी, लेकिन हर दिन वह घर आकर अपनी थकान को ज्यादा प्रमुखता देती है और बच्चे का भरोसा टूटता जाता है।


बात उस बात की है

जब एक लड़का एक लड़की को प्यार करने के साथ-साथ उस शादी के भी सपने दिखाता है, जिसका न हो पाना पहले से तय होता है।


बात उस बात की भी है

जब एक लड़की यह जानने के बावजूद कि वह अपने प्यार और मां-बाप में से हमेशा मां-बाप को ही चुनेगी, लड़के को अपने प्यार में बांधे रखती है, पिंजरे के पंछी की तरह।


बात उस मामूली सी बात की भी है

जब हम यूं ही अपने साथ काम करने वाले को विश्वास दिलाते रहते हैं, उसकी मदद जरूर कर देंगे। उसके काम की चीज जरूर लाकर दे देंगे।
और हफ्ते दर हफ्ते 
''ओह मैं तो भूल ही गई''
''अरे कल पक्का''
जैसे संबोधनों और खिलखिलाहट में सच को छिपाते रहते हैं।


आखिर में बात सिर्फ इतनी है कि आप मत कीजिए वह काम जो आप नहीं करना चाहते

नहीं कर सकते
चाह कर भी नहीं
लेकिन कम से कम भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए।
माना कि उम्मीद पर दुनिया कायम है
लेकिन उम्मीद भी तो ऐसी हो, जिसे पचाने के लिए कायम चूर्ण की जरूरत न पड़े।

''

मैंने भाषणबाजी न करने का भरोसा नहीं दिलाया था। 
''
;)






शनिवार, 27 अप्रैल 2013

चुन्नी को लपेटने का फर्क था सिर्फ



बचपन में सजने-संवरने का बहुत शौक था। अक्सर मां की चुन्नी को साड़ी बनाकर पहना करती थी और शीशे के सामने घंटों खुद को देखा करती थी। फिर एक दिन यूं ही चुन्नी छोटी लगने लगी और सिर से लपेट कर नीचे लाते-लाते चुन्नी का बुर्का बनाना आ गया। फिर तो सहेलियों को भी सिखा दिया। उसके बाद अक्सर हमारे घर-घर के खेल में एक सहेली चुन्नी की साड़ी बनाकर पहनती तो एक चुन्नी का बुर्का बनाकर। जब तक घर-घर का खेल रहा, ये सिलसिला यूं ही चलता रहा।
जब खेलने की उम्र चली गई तो इस सिलसिले का सच सामने आया।
सच ये था कि -
चुन्नी एक ही थी।
लपेटने के तरीके दो थे।
दो तरीकों में दो धर्म घर कर बैठे थे,
ये बात घर-घर के उस खेल में कभी महसूस नहीं हुई थी।
आज भी महसूस नहीं होती,
बल्कि आंखों के सामने दिखाई देती है।
न मैंने आजादी की लड़ाई देखी है
न 84 के दंगे।
मैं अभी कुछ ही दिन पहले देख कर आई हूं पाकिस्तान से दिल्ली आए 480 हिंदू परिवारों को।
जो पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहते।
कहते हैं - पाकिस्तान में मुसलमान उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं, हिंदुस्तान में रहकर मर जाएंगे, लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे।
मैंने अभी-अभी देखी है हिंदु-मुस्लिम दंगों के गवाह और शिकार बने लोगों पर एक फिल्म-फिराक।
और मैं कई मरतबा पड़ी हूं इस बहस में कि क्यों मुझे शाहरुख खान पसंद है।
क्यों मैं तारीफ कर बैठती हूं मुसलमानी लड़कियों की तहजीब और नजाकत की।
क्यों गालिब से लेकर फराज तक की शायरी के ज्यादा से ज्यादा कसीदे मुंहजबानी याद कर लेने की जंग छिड़ी रहती हैं मेरे दिमाग में।
क्यों आखिरकार में हर साल कोशिश करती हूं उर्दू की क्लास में दाखिला लेने की, जो मेरे समय से मेल न खा पाने के कारण हर साल अधूरी रह जाती है।
ये महज इतेफाक है।
ये महज मेरे जज्बात हैं।
ये महज पसंद की बात है।
लेकिन मेरे आसपास के लोग इसे एक विद्रोही रंग दे देते हैं।
कहते हैं या चिढ़ाते हैं,
लेकिन मेरी हर बात पर अपनी यही बात दोहराते हैं कि
-तुम्हें तो मुसलमान ही पसंद हैं। पाकिस्तान चली जाओ।
मानो ये पसंद
पसंद नहीं
गुनाह है।
शुक्र है माहौल इतना भी गर्म नहीं है कि इस बात पर दंगे हो जाएं।
वरना शायद मैं भी कत्ल कर दी गई होती।
वैसे शायद कत्ल होने से ज्यादा खतरनाक होता होगा, कत्ल होते देखना।
जैसा कि पाकिस्तान से दिल्ली के बिजवासन में आए हिंदु लोगों के बीच बैठी एक पांच साल की बच्ची दिव्या भारती ने मुझे बताया था कत्ल का आंखों देखा हाल। उसकी मां उसे चुप रहने का इशारा कर रही थी। जो कत्ल उसने होते देखा था, उसकी वजह भी उसे मालूम थी, ये कत्ल होते देखने से भी ज्यादा खौफनाक था।
क्यों मारा तुम्हारे मामा के बेटे को।
वो मुसलमान था ने इसलिए।
.
.
.
इस जवाब के बाद सवाल भी दफन होने से पहले ये पूछ रहे थे मुझसे
कि उन्हें कब्र दी जाएगी या उनकी चिता जलाई जाएगी...
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मेरा इतिहास बहुत कमजोर है
शायद गणित भी।
मगर जितनी भी तालीम है
उसे पूरा समझने-बूझने के बाद भी मुझे जाति और धर्म का भेद समझ नहीं आता।
इस बात का दुख मनाने से पहले कि कोई मुसलमान हिंदु को मार रहा है
या कोई हिंदु, एक नहीं हर मुसलमान से नफरत कर रहा है
मुझे इस बात का खौफ ज्यादा है कि
हम सब ही हिंदु मुसलमान से पहले
सिर्फ इन्सान हैं
और सिर्फ इन्सान ही हैं
इसके बाद में भी
ये बात कुछ लोग बिलकुल नहीं समझ रहे हैं।


काश कि इन लोगों की यादाश्त खो जाए और ये फिर से सिर्फ और सिर्फ इन्सान हो जाएं। 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी के लड्डु खाकर पछता रही हूं मैं

इससे पहले भी जब कभी मैंने आजादी के दिन के बारे में कुछ लिखा है तो उन लड्डुओं का जिक्र जरूर किया है जो मैंने पूरे 12 साल हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर खाएं हैं। बेशक मैं कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं मगर एक सामान्य शख्स की तरह कुछ इंसानी कमजोरियां मेरे साथ भी  हैं। लड्डु उन्हीं कमजोरियों में से एक है।
इसलिए शायद पिछले इतने सालों में जब भी मैंने आजादी के सही मायने तलाशने और उनके बारे में संजीदगी से सोचने की कोशिश की तो लड्डु का स्वाद उस पर हावी हो गया। आप सोचेंगे मेरी जिंदगी के 12 साल बीते हुए तो  11 साल का वक्त निकल गया फिर.. 11 साल मैं क्या करती रही..दरअसल मेरी मां टीचर हैं तो मेरा स्कूल खत्म होने के बाद भी घर पर लड्डुओं का आना जारी रहा और इसलिए मुझ पर मेरी कमजोरी का हावी होना भी...
खैर
इस बार मैंने इस पर काबू किया है...बिल्कुल वैसे ही जैसे लड़कियां अपनी दूसरी तमाम कमजोरियों पर काबू करती रहती हैं न जाने कितनी बार....
लड्डु न खाने से पेट में जो स्पेस खाली छूटा है वहां एक सवाल घुड़मुड़-घुड़मुड़ कर रहा है। सवाल ये कि क्या ये दिन सच में इस तरह खुश होने का है कि स्कूलों में लड्डु बांटे जाएं। छतों पर पतंग उड़ाई जाए। फिल्म देखी जाए। बाहर घूमने जाया जाए। धानी और नांरगी रंग के कपड़े पहने जाएं। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया जाए। रंगारंग कार्यक्रम किए जाएं...?
आज इतने सालों बाद आजादी पर सोचते हुए मैंने अपनी एक कमजोरी को तो पीछे छोड़ दिया है मगर दूसरी फितरत मेरे साथ है और वो है मेरा स्वार्थ। स्वार्थ ये कि यहां मैं पूरे देश या देशवासियों की नहीं सिर्फ अपने लिए आजादी के मायनों की बात करुंगी। जानती हूं कि 65 साल बाद इन बातों का रोना रोकर कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन मैं इतने सालों तक खाए गए लड्डुओं का पश्चाताप करना चाहती हूं।
तो कहानी कुछ इस तरह है कि किताबों और किस्सों से इतर जब मैंने इस बार आजादी को समझा तो देखा कि
इस डिप्लोमेटिक आजादी की वजह से ही आज मेरे पास मेरे गांव का नाम नहीं है। वो गांव जहां शहर की आपाधापी से दूर जाकर कुछ दिन मैं सुस्ता सकूं। कोई जमीन नहीं है जिसके खेतों में मैं गर्मियों की छुट्टी में जाकर लहलहा सकूं। पुरखों की विरासत नहीं है। वो गली कूचे नहीं है जहां मेरे  दादा-परदादा रहे और पले-बढ़े। और जहां जाकर मैं उनके अस्तित्व को महसूस कर सकूं। उन पर किस्से कहानियां औऱ कविताएं लिख सकूं। विभाजन की वो टीस क्या होती है वो इस बार पहली बार मुझे महसूस हुई। शायद कहीं दबी तो पड़ी थी पर लड्डुओं ने उसे उबरने नहीं दिया।
कहां की हो तुम...ये सवाल न जाने कितने सालों से हर वक्त हर मोड़ पर पीछा करता रहता है। ... औऱ मैं कुछ ठीक-ठीक नहीं बता पाती। क्यों..क्योंकि हम मुलतानी हैं। मुलतान के रहने वाले मुलतानी.. इतना कह भर देने से ही मेरे दोस्त मुझे रिफ्यूजी कह कर चिढ़ाने लगते औऱ एक कुंठा मेरे अंदर दाखिल होती और फिर हवा के रास्ते बाहर निकल जाती। मुझे लगता रिफ्यूजी होना एक मजबूरी है कोई इतनी बुरी बात नहीं जिस पर संजीदा हुआ जाए।
लेकिन आज मैं बेहद संजीदा हूं क्योंकि इस रिफ्यूजी होने ने मुझसे मेरा इतिहास छीन लिया और इसलिए मैं अपने भूगोल को आज तक नहीं समझ पाई औऱ न ही समझा पाई....
अब आप ही बताइए कि मेरी मां का जन्म उत्तरप्रदेश के एक कस्बा नुमा शहर खुर्जा में हुआ उनका बचपन पंजाब के अबोहर में बीता। मेरे पिता जयपुर में पले-बढ़े। देहरादून में पढ़े-लिखे। हरिद्नार में बसे। और मेरा जन्म हुआ बुलंदशहर में और मैं बचपन से रही हूं गाजियाबाद में..............अगर आप मेरे इस भूगोल को समझ सकें हों तो मुझे भी एक शब्द में इस सवाल का जवाब दीजिएगा कि "मैं कहां की हूं..."सिवाए इस जवाब के जो मैंने अभी कुछ बरस पहले ही देना सीखा है.." हिंदुस्तान"
मगर फिलहाल मैं खुद ही एक कोशिश करती हूं अपने असल भूगोल को समझने की...
मुलतान, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, चेनाब नदी के किनारे।
मुलतान, जिसे सूफी और संतों का शहर कहा जाता है।
मुलतान, जो बाबा फरीद के नाम से मशहूर पंजाबी के बेहद शुरुआती दौर के कवि फरीदुद्दीन गंजशकर का जन्मस्थान है।
मुलतान, जो सिर्फ एशिया ही नहीं दुनिया के कुछ एक सबसे पुराने शहरों में से एक है।
औऱ
मुलतान, वही शहर जो आजादी के नाम पर अपनी पहचान लुटा बैठा। और मुलतानी कहे जाने वाले इसके बाशिंदे भारत का रुख कर गुमनाम हो गए क्योंकि मुस्लिम बहुल होने के कारण मुलतान को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया....।
ये ख्याल बहुत पाक नहीं लगते जो आज मन में यूं कुलाचे मार रहे हैं। क्योंकि इतना जानती हूं मैं कि उस वक्त ब्रिटिश रुल से आजाद होना ही सबसे बड़ी परिभाषा थी आजादी की..शायद रहनुमाओं  को ख्याल ही न आया हो किसी की पहचान और गांव घर के हमेशा के लिए दफन होने का।...मगर आज इन ख्यालों को रोकना नहीं चाहती मैं... बेशक नापाक ही सही लेकिन आज आजादी के इरादे मेरे मन में कुछ नेक नहीं लगते...आज मैं आजादी के इस दिन को बेदखल कर देना चाहती हूं अपनी जिंदगी से ...

सोमवार, 11 जून 2012

जिदंगी में एक दुनिया रहती है



दीवार में एक खिड़की रहती है-विनोद कुमार शुक्ल।


काश.. जिंदगी का होना.. जिदंगी में जिंदगी का होना भी होता। अजीब सी है न ये लाइन। लेकिन विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास दीवार में खिड़की रहती है ....पढ़ने के बाद... आपको धीरे धीरे इस तरह की अजीब लाइनें भी समझ आने लगती हैं... और साथ में समझ आने लगता है.. जिंदगी का एक नया चेहरा।


सच में समझ नहीं आता कि कहां उलझी है जिंदगी... ऐसी कितनी ख्वाहिशें हैं.. जिन्हें पूरा करने के दौरान खुद से ही मिलने का वक्त नहीं मिल पा रहा। खुद को पीछे छोड़कर कैसे आगे बढ़ रहे हैं हम। क्या ये आगे बढ़ना सही में वो आगे बढ़ना है जिस तरह हम आगे बढ़ना चाहते थे।


जानती हूं कि ये सारी बातें किसी भी वक्त.. कोई भी लिखने वाला इंसान लिख सकता है। मैं कुछ नया नहीं लिख रही। सही मायनों में कहूं तो ..बहुत ही घिसी पिटी बकवास लिख रही हूं।


लेकिन हमारी बहुत ही तमीजदार जिंदगी में इस तरह की एक बकवास की जगह होना भी जरूरी है। ये बकवास कई बार वजह दे देती है.. जिंदगी में.. जिंदगी को महसूस करने वाले कुछ पलों से मिलने की। ऐसे पल... जब बिन बात के हंसी आ जाती है ...और बिन बात के रोना। जब बिना पहचान के कोई मदद कर देता है और जान बूझकर किसी का परेशान करना भी अच्छा लगता है।




बीच में ही इम्तिहान आ जाने की वजह से कई दिन लग गए इस उपन्यास को पूरा पढ़ने में। आज.. अभी.. इसका आखिरी पन्ना पढ़कर पूरा किया इस उपन्यास को।


यकीन मानिए.. बड़ी तेज फीलिंग हो रही है कि काश एक ऐसी खिड़की मेरे पास भी होती.. जिसे जब चाहे लांघकर मैं अपने मन की दुनिया में जा सकती।


विनोद कुमार शुक्ल को पहली बार पढ़ा मैंने। काफी जगह लगा कि क्यों पढ़ रही हूं इस उपन्यास को मैं। न इसमें कोई हीरो टाइप का चरित्र है न कोई संघर्ष न कोई विशेष परिस्थिति..छोटे छोटे से कुछ ब्यौरे हैं बेहद छोटी छोटी बातों के। मगर इसका सार तब समझ आता है जब आप उपन्यास का आखिरी पन्ना पढ़ते हैं...पता चलता है कि


 जिंदगी में इस तरह की भी एक दुनिया रहती है जो दीवार की खिड़की से बाहर निकलकर ही दिख सकती है....ये दिखना दरवाजे से नहीं हो सकता...दरवाजा उस दुनिया में दाखिल ही नहीं होने देता कभी...




फिर वही ख्वाहिश कि काश ये  खिड़की मेरे घर की दीवार में भी होती
पर घर ही नहीं है
किराये का है तो खिड़की कैसे हो सकती है....

रविवार, 18 दिसंबर 2011

एक जरुरी कवि


सुबह सुबह दफ्तर से फ़ोन आया अदम गोंडवी नही रहे. उनके लिए कुछ खास सामग्री इकठा करनी थी. ख़ास पेज के लिए. साहित्य मेरे लिए सांसों की तरह है और ये नाम बिलकुल अनजान. ये बात मेरे बॉस को भी शायद ठीक नही लगी जब उन्होंने मुझसे पूछा-जानती हो न अदम जी को, आज उन्ही पर काम करना है.. और मैंने अन्म्नाते हुए कहा, जान लुंगी सर जल्दी पहुँचती हू दफ्तर. लेकिन अनमनी से न मेरे भीतर कुल्बुका रही थी. कलाकार हैं या कवि. कौन है ये. मैं कैसे नही जानती इन्हें. कहाँ सूना है इनका नाम. एक दोस्त को फोन किया उन्होंने तुरंत एक ही बार में अदम जी का पूरा परिचय उनके अल्फाज मेरे सामने रख दिए और मेरी सोई हुई स्मृति अचानक जगी, बहुत साल पहले एक वाद विवाद प्रतियोगिता में मैंने शुरुआत ही इन पंक्तियों से की थी ...

 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी

ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया

सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार

होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की. 



तब नही जानती थी कि किनके अल्फाजों को अपने पक्ष का हथियार बना रही हूँ...आज जानें क्यों उनके जाने पर ऐसे लग रहा है कि कोई अपना बिना मिले ही चला गया. अफ़सोस भी है और अपनी अन्जानियत का गहरा अहसास और आघात भी. एक मित्र या कहूँ कि वरिष्ठ मित्र और  आलोचक हैं मेरे जो अक्सर मेरी कवितायेँ पढ़कर  कहते है -ये क्या लिखती रहती हो चाँद, सूरज, आसमान और धरती. प्यार इश्क और फूल पत्ते, एक ऐसे कविता लिखो जो जरुरी हो तुम्हारे लिए नही सबके लिए आम इंसान और देश दुनिया के लिए. लेकिन आज उनकी ये बात मुझे फी याद आई और लगा एक जरुरी कवि चला गया जिसकी हर कविता जरुरी थी और हमारे लोगों कि जरुरत भी..
ये साल तमाम बड़े नाम हमें अलविदा कह चुके हैं सिलसिलेवार
मैं तो किसी के नीजी जीवन में शामिल नही थी
न ही किसी कि बहुत बड़ी प्रशंसक
मकबूल फ़िदा हुसैन के जाने पर लगा इन्हें क़तर जाने की बजाय इनकी कदर होनी चाहिए थी देश में ही
भूपेन हजारिका गए तो लगा कि एक समाज कि जलती हुई लौ से घी ख़त्म हो गया
देव साहब की जिन्दादिली और उनकी दिनचर्या से हमेशा अपनी सोच के अंधेरों में घिरा होने पर प्रेरणा ली है मैंने तो उनका जाना मेरे लिए मेरी एक उम्मीद का टूटना था
लेकिन अदम जी तो एक अनजान बनकर मेरे आस पास अपने शब्दों के रूप में  रहे और जाते जाते इतना परिचित कर गए कि मैं बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रही हूँ कि इतने जरुरी कवि को नही जानती थी मैं और कविता लिखती हूँ
क्या मैं लिख पाऊँगी कभी कोई जरुरी कविता ?
 

सोमवार, 19 सितंबर 2011

मन शैतान हो गया है


मन करता है नास्तिक हो जाऊं
मन करता है किसी को नाराज कर दूँ
और कभी न मनाऊँ
किसी को दूँ बेइंतहा मोहब्बत
और फिर मैं भी बेवफाई कर पाऊं
मन करता है अहसासों का
अंश अंश निकालकर
किसी कूड़ेदान में फेंक आऊं
मन  करता है किसी पहाड़ी जगह नही
पकिस्तान में जाकर छुट्टियाँ बिताऊं
मन करता है तोड़ दूँ
सारे परहेज और रजकर खाऊं
मांगूं नही
छीन लूँ
अपना हर हक़ - अधिकार
मोड़ दूँ तोड़ दूँ मरोड़ दूँ
उन सारे गृह नक्षत्रों को जो मेरे
खिलाफ
हो गए हैं
काट दूँ सारी किस्मत की रेखाएं
हाथ से
और खुद सपनों की एक तस्वीर हथेली पर सजाऊं
अब मन करता है खुद  पर करूँ एक अहसान
भूल जाऊं
सबको
और याद रखूं बस अपना नाम
ये मन अब शायद चंचल नही रहा
शैतान हो गया है

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

मैं लिखना चाहती हूँ

 (मेरे लिए जिंदगी में लिखना बहुत जरुरी है ..उतना ही जितना कि जीना- खाना-पीना
जिन दिनों नहीं लिख पाती वो दिन बेचैन होते हैं और रातें करवट करवट
लेकिन कई बार हमारे लिखने का विषय बिलकुल rigid  हो जाता है यानि हम एक ही दुनिया के इर्द गिर्द घूमते रहते है
सावन, साजन, मोहब्बत, मंजिले....ये कुछ ही सब कुछ नही हैं
अगर हम शब्दों को जोड़कर किसी बात को बेहतरी से कहने का हुनर रखते है
तो क्यों न कुछ ऐसा कहें जिससे एक दिशा मिले हमें भी पढने वाले को भी
कुछ ऐसा ही करने की कोशिश थी मगर फिर ये कविता बन गई ...)

मैं लिखना चाहती हूँ
कुछ ऐसे लेख जो जुड़े हो देश, दुनिया और समाज से
कुछ ऐसी कवितायेँ
जिनमे न हो बारिश, फूल, भवरे, रास्ते, मंजिले और तुम्हारा जिक्र
जिनमे हो भूख, तड़प, समानता, संघर्ष और क्रांति की बातें
..
..
.
आज भी जब में लिख रही हूँ कुछ
तो चाहती हूँ कि
लिखूं
एक मीडिया मुग़ल का अंत (रुपेर्द मर्डोक के अखबार न्यूज़ ऑफ़  द वर्ल्ड के  बारे में )
समाज सेवी अन्ना और अड़ियल सरकार के बीच चल रहा द्वन्द
कुछ कर नही सकती मगर कहूँ कुछ
उन बम धमाकों के बारे में जो आतंकियों के लिए थे
महज जन्मदिन के पटाखे
मगर उनसे बेडोल हो गई थी कई जिंदगियां
और भरा पूरा
हँसता खेलता
अपनी चमक से
सारी दुनिया को रोशन करता
एक शहर
मैं लिखना चाह रही हूँ बहुत दिनों से
पद्नाभ्स्वामी मंदिर के खजाने
और
उस खजाने को खोलने की याचिका डालने वाले
व्यक्ति की मौत से
पनपे अंधविश्वास
और अथाह दौलत
के इस्तेमाल के बारे में कुछ
जब पीने अखबार में देखी मर्लिन मुनरो की मूर्ति की तस्वीर
जिस पर टिकी हैं सारी दुनिया की निगाहें
और जिस ड्रेस के कारण ही
कहा जाता है कि
हो गया था उसका तलाक
हां मैं लिखना चाह रही थी बहुत कुछ इस महंगाई के मौसम
में टाटा के ३२ हजार का घर बनाने के प्रोजेक्ट के बारे में कुछ
देखो न
कितना कुछ था मेरे पास लिखने के लिए
और मैं बस लिखती रही
तुम्हे
तुम्हारे इन्तजार को
हर बार आने वाली इस सुखी सी बहार को

मंगलवार, 7 जून 2011

ये नामुराद शहर

सपनो की अपनी एक दुनिया होती है लेकिन
मधय्वार्गिये लोगों की  दुनिया में सपनो की दुनिया का नाम कुछ  शहरों से जुडा है
जैसे लोग हनीमून मनाने के लिए स्विट्जर्लैंड  जाने का सपना देखते है
गर्मिया बिताने के लिए शिमला, मंसूरी या नैनीताल जाने का 
सपना देखते है
जीवन के आखिरी पड़ाव पर चारों धामों की यात्रा करने का सपना देखते है
और
युवा एक नई, बेहतर, शानदार, सितारों सरीखी जिंदगी जीने के लिए मुंबई जाने का सपना देखते हैं
क्या सपनो की दुनिया सिर्फ मुंबई है ....?
मैं मुंबई में रहने वाली ऐसी आँखों को भी जानती हूँ  जिनमे घर वापस लौटने का सपना पलता है
घर जो लखीम पुर खीरी में है , घर जो उज्जन में है , घर जो चित्रकूट में है...घर जो रांची में है
एक तरफ से देखें तो  घर वापसी का ये सपना गलत है, भावुकता है 
या कमजोरी है
दूसरी तरफ से देखे तो ये सपना प्यार है , लगाव है , खिंचाव है 
या जरुरत है
सपने सिर्फ वही तो नही होते न जो शाहरुख़ खान  बनने के लिए देखे जाते हैं..सपने वो भी होते हैं जो गरमी में बिना बिजली के सोती माँ के लिए इन्वेर्टर लगाने के लिए देखे जातें है...जो पापा की झुकती कमर को अपने हाथों के सहारा देने के लिए देखे जाते हैं  इसलिए बहुत से ऐसे सपने हैं जिनका शहर मुंबई नही है नॉएडा  है , गाज़ियाबाद है,  कलकाता है, बिहार भी है और ऐसे ही बहुत से नामुराद शहर जहाँ इन लोगों का घर बसता है
इस सब की जद्दोजहद में सिर्फ एक सपना होता हैं घर वापसी का


विस्थापन एक बेहद पीड़ादायक शब्द है और भविष्य बनाने के लिए घर बार को छोड़कर दूर किसी दूसरे शहर में जा बसना विस्थापन सरीखी ही पीड़ा देता है.. हाँ ये पीड़ा पथरीली नही होती मखमली होती है मगर पीड़ा तो होती है न


शनिवार, 26 मार्च 2011

एक चुटकी चैन


कुछ दिन पहले किसी ने ये दुआ दी थी मुझे  'तुम्हारा  इंसानी रूप दुनिया की हर तीखी धूप में बचा रहे। यह रंग जो तुम्हारा अपना है हंसी का, खुशी का, बचपन का, रिश्ते का, बरकरार रहे हर उस हमले से जो मासूमियत पर होता ही है हर तरफ से।
काश कि यह सब जिस जमीन पर खडा होकर मैं कह रहा हूं उसको पूरा पूरा पढ पातीं तुम। हालांकि उससे भी फर्क यही पढता कि तुम रो देतीं।''
 हाँ मैं रो देती ...
अधूरे अहसास और अनकहे लफ्जो के इस मकडजाल के बीच सच  में मुश्किल तो है उस जमीन को पूरा पूरा पूरा पढ़ पाना जहाँ जज्बात सिर्फ जरुरत भर रह गए है..जहाँ प्रेम करने के लिए प्रेम नही किया जा रहा.. जहाँ हम सब एक दुसरे के लिए सिर्फ माध्यम बन गए है.
लेकिन क्या फर्क पड़ता है अगर मैं उस जमीन को न भी पढूं तो ...
कदम बढ़ाते ही तो पैरों के नीचे वही जमीन होती है
और बिना पढने की मोहलत लिए मुझे उस जमीन को समझ कर संभल कर कदम रखने के बारे में सोचना पड़ता है.
हाँ मुझ पर हमला होता है
जब मेरे मासूम सवालों को
मायूस कर देने वाले जवाब मिलते है
जब मेरे दिल में बैठकर कोई मेरे दिमाग को
परख रहा होता है
जब उम्र भर के लिए साथ हो जाने वाला कोई लम्हा
बरसो पुराना बीता पल बन जाता है
और जब
मेरी आँखों को पढ़ सकने वाला
कोई शख्स
ढेरों शब्दों को भी नही समझ पाता है 
ये निरी कोरी भावनाए है
हर किसी का  दिल बहता होगा इनमे
मेरा जरा सा डूब गया है
और इस डूबते से मन को तिनके की तरह इन शब्दों का सहारा मिल रहा है
और ये शब्द कम्भक्त नशा बन गए है शराब की तरह
जिस दिन न पीयू नींद नही आती
 जिस दिन न लिखूं चैन नही मिलता
और फिर इतनी सख्त जमीन पर चलने के बाद
एक चुटकी चैन तो चाहिए न ....




बुधवार, 12 जनवरी 2011

आखिर ये मुद्दआ क्या है





हर रोज ऑफिस आते हुए मैं मंदिर के सामने से गुजरती हूँ
हाथ जोडती हूँ और कान पकडती हूँ
बचपन की आदत है
माँ अक्सर चलती बस से भी इशारा कर मंदिर की तरफ सर झुकाने  के लिए कहती थी जाने अनजाने किसी का दिल दुखाने और गलतियों की माफ़ी मांगने को कहती थी हालाँकि इस बात के अपने अलग तर्क हो सकते है कि माफ़ी मांग लेने से गलती सुधार नही जाती लेकिन ये माँ कि बात है जिस पर हर तर्क फीका पड़ जाता है उसी तरह तब  की ये आदत आज तक बरकरार है ...और गलतियां भी तो नही रुकी फिर चाहे बचपन हो या जवानी. खैर
वहां हर रोज मैं मंदिर में एक महिला को देखती हूँ उनके अलावा मंदिर में सिर्फ पंडित जी होते है जो अक्सर बाहर आकर बातें करते हुए दिखते है
वो महिला अकेली ही मंदिर में भजन गाती है ..कभी राम रूप में आना कभी श्याम रूप में आना ... प्रभु जी चले आना
मंदिर के आलो में दीये जले होते है...एक अजीब सी सुकून देने वाली और चुभने वाली शांति भी होती है जो कभी कभी सन्नाटे जैसी भी लगती है ...ऑंखें बंद किये ढोलक की थप से अपने सुर मिलाने की कोशिश करती वो महिला गीत गाती रहती है
भगवान् को बुलाती रहती है पता नही वो वापस कब जाती होगी
पता नही भगवान् उसके बुलाने से आते होंगे या नही
क्या ये भगवान् को बुलाने का तरीका है या फिर खुद को बहकाने का
यहाँ मुद्दा
न आस्था है
न भगवान्
न अरदास
बात ये है कि
इंसान जीवन के यथार्थ पर नहीं बल्कि सपनो पर जीता है.
ऐसे सपने जो कभी कभी बिलकुल बेमानी होते है और कभी कभी ऐसे कि सपने जिंदगी बन जाते है
पर उस महिला को देखकर फिर भी बहुत से सवाल सामने आ जाते है
क्यों गा रही है ये अरदासों के ये गीत जब हर कोई मशगूल है अपनी जिंदगी में
मंदिर का पंडित भी मंदिर से बाहर बगले झांक रहा है







बुधवार, 5 जनवरी 2011

मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा.. ?





कितने दिन हो गए इस शहर में आये...आज भी हर शाम अलसाई सी है और हर सुबह ललचाई सी है. हालाँकि  इस शहर की  आबोहवा में खुद को तबसे ही शामिल कर लिया था जब दिल्ली से आ रही बस की खिड़की से मैंने वो बोर्ड देखा था. .. वेलकम टू लुधियाना सिटी . ये कोई  टूरिस्ट स्पोट नही था न ही कोई हिल स्टेशन, ये मेरी जिंदगी का पहला destination है ,  जहाँ मैंने अपने सपनो की तरफ अपना पहला कदम रखा था. शहर को जाना.. देखा.. जहाँ तक देख सकती थी, फिर लिखा भी.. उन बातों को जो चुभी जिन्हें महसूस किया. लेकिन लगा और लगातार लग रहा है कि शहर ने मुझे नही अपनाया. एक अजीब सा अकेलापन है यहाँ. हालाँकि अकेलापन अजीब ही होता है लेकिन मैं ये कहूँगी  कि ये अकेलापन अजीबोगरीब है. अजीब इसलिए कि अकेलेपन को दूर करने के जो उपाय है उन पर अमल नही हो पा रहा और जिन उपायों को अपनाने का मन है उन्हें खरीदने की पहुँच अभी नही जुटा पाई हूँ.
सार संक्षेप ये है कि यहाँ मन लग रहा है रम नही रहा. कुछ लोग यहाँ आकर लुधियानवी हो गए और मैं अब तक वो वजह नही जुटा पाई जिससे लुधियाना के कुछ लम्हे बटोर पाऊ अपनी यादों के लिए. नाम के साथ सरनेम जोड़ना तो दूर की बात है.
लोग अच्छे नहीं है जब ये सोचती हूँ तो लगता है क़ि मैं खुद भी तो बहुत बुरी सी हो गई हूँ शायद. और फिर किसी ने कहा क़ि पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा शायद इस शहर के साथ भी मेरी चाहतों का कुछ ऐसा ही सिलसिला  चल रहा है. मैं ही नहीं छू पाई हूँ यहाँ क़ि रूह को.. खैर आजकल तो धुंध भी बहुत है रूह को ढूँढ पाना फिर से एक मुश्किल भरा काम होगा. न जाने क्यों दिल चाहता है क़ि मैं उस रूह को न तलाश करू वो रूह खुद ब खुद मुझे दूंढ ले
 पहले से भी ज्यादा आलसी हो  गई हूँ यहाँ आकर ...............  

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

प्यार, दोस्ती, आकर्षण या अटैचमैंट


तैतीस करोड़ देवी देवता , चार धाम, चार पुराण, ग्यारह उपनिषद, और भी न जाने कितना कुछ. माने तो सब कुछ यही न माने तो कुछ भी नही.लेकिन मेरे ख्याल से ९० फिसद लोग मानते हैं और जो नही मानते वो कमसे कम इस ९० फिसद के शोर में काफी बातें जानते हैं. जानकारी हो भी क्यों न. धारावाहिक बन चुके हैं, फिल्मे बन चुकी है. किताबे तो है ही. एक नाम आप ने भी जरूर सुना होगा  दरअसल  नाम तो दो हैं लेकिन दोनों इस तरह जुड़े हैं की उन्हें एक ही कहा जाता हैं ..... राधाकृष्ण. मेरा मुद्दा भगवान् या उनके अस्तित्व पर चर्चा करने का नही था लेकिन कुछ दिन पहले बातों बातों में एक ऐसी बात निकाली की उसने बात करने के लिए उत्साहित किया ... राधा कृष्ण का नाम एक अमर प्रेम कहानी की पहचान है. दो लोग जो एक ही थे, जो मिलकर भी जुदा रहे. जो एक दुसरे के बिना अधूरे है जो अलग है लेकिन जिन्हें सब एक दुसरे के साथ से ही जानते हैं. आज के ज़माने में तो ऐसी हकीकत की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ..और अगर ये कल्पना कही सच होती नजर आये तो यक़ीनन इबादते गौर है ...लेकिन इबादत के इस रिश्ते पर  एक जवान दिल ने सवाल उठाया है. जाने क्यों मुझे ये अजीब भी लगा, नागवार भी फिरभी लग रहा है की इस समय के किसी जवान दिल का ये सबसे जमीनी सवाल है ..सवाल था 
राधा कृष्ण का ये रिश्ता 
प्यार था 
???????
दोस्ती थी 
????????
आकर्षण था
या फिर
????????
अटैचमैंट
????????

प्रश्न चिन्ह लग चूका है ?
जवाब आप भी दे सकते है और आप भी यानि वो भी जो मानते है और वो भी जो सिर्फ जानते है 
लेकिन  जवाब दीजियेगा जरूर. बहुत सारे जवान दिलों का सवाल है ........जवाब के इन्तजार में ....हिमानी
 

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

मासूम सी मुश्किलें

कदम दर कदम मेरे साथ रहती है
कुछ मासूम सी मुश्किलें
जैसे जानती हो
वो मुझे हमेशा से
मालूम चल जाता हो उन्हें मेरी हर आहट  का पता
मेरे हर मकसद की वजह

सुकून के एक छोटे से पल में
भी इनके आने का ही शोर रहता है
हर ख़ुशी से हो जाती हूँ मैं अनमनी   सी
मुश्किलों की उस सनसनी में 
फिर कौन साथ देता है 

अपना पराया तो महज दो शब्द हैं विरोधाभास के 
आखिर तो हर आदमी में एक आदमी रहता है
प्यार, वफा, नफरत, धोखा 
कहने को तो किस्से हजारों है 
मगर सब एक इन्तजार में हैं
चुप है यहाँ
की देखे कौन पहले कहता है 

जिक्र हो उठा कहीं उनकी कहानी का पहले तो फिर होगा ये सितम
की शब्द ढाएँगे जुलम
कहेंगे देखो भई 
उस शराफत के पैमाने में ही तो नशे का सारा चिलम रहता है 

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

दिल का कचरा



बेशर्म ख्वाब 
बेअदब ख्वाइशें
बगावती ख्याल 
ख़ाली से इस दिल में 
कितना कचरा भरा है 

हकीकी से रु ब रु 
हुक्म की तामील करता 
हदों में रहता 
हर शख्स 
उपरोक्त कचरे से दूर
कितना साफ़ सुथरा दिखता है 

आदतों में शुमार अदब 
तहजीब से लदा 
तरकीबों से अलहदा 
ये हुस्न मुझे मगर 
नागँवार लगता है 

अब चाहती हूँ इस जिस्म में भी नूर हो 
शर्मों ह्या की इस चाशनी में 
शरारत का तड़का 
तवे सी रोटी के सुरूर में तंदूरी नान सा गुरूर हो 

दिल में थोडा कचरा होना भी 
जीने के लिए जरूरी है 



बुधवार, 25 अगस्त 2010

कैसे हो हल 'हिमानी' ??





जुनून को किनारा मिल जाता तो
जिंदगी को सहारा बनाता कौन ??
 
हम भी राहों में तुम भी दूर मंजिल से
कोई एक भी अगर कुछ पा जाता तो
एक दूजे को फिर रास्ता बताता कौन ??
 
कहने को है ढेर सारा गम इकट्ठा
इस दिल में
सुनने बैठ जाता गर कोई
तो फिर तन्हाई मे तकिए तले
बुझे हुए मन की लौ जलाता कौन ??
 
कागज, कलम हाथ में
शब्दों का एक सिलसिलां हमेशा साथ में
हर बार ही बन जाती उम्दा गजल तो
फिर गैरों की शायरी को सीने से लगाता कौन ??
 
यहां कुछ कहना मना है
वहां सुननें में सुकून नहीं मिलता दोस्तों को
गर आसान होती कहा-सुनी इतनी तो
किसी को दुश्मन बनाता कौन ??
 
जब हिज्र बनने लगी है हकीकत
तो सारे ख्वाब अब हिजाब में हैं
हर आरजू का पूरा होना मुनासिब नहीं
सब मान ही जाता खुदा तो
मन्नतें मनाता कौन ??
 
वो इब्तिदा और ये इंतहा
इस बीच एक मैं अकेली सी पहेली
कैसे हो हल  'हिमानी'  ??

 सवालों का ये काफिला टूट जाता गर
तो फिर जवाबों का मोल चुकाता कौन ??



शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

हो गई अनसुनी हर दुआ अब मेरी


गला सूख रहा है
लबों पर जो बातें हैं
उन्हें बोलने मे जुबां साथ नहीं दे पा रही
अचानक ही हुआ या
 धीरे-धीरे चूसा जा रहा था
कई दिनों से मेरे  जेहन की नमीं को
गले का सूखना
बातों का जुबां पर ही रुकना
ये प्यास काफी बड़ी लगती है।
ये जज्बात जो यूं जन्में हैं
इनकी जड़ें कहीं नजर नहीं आती।
जख्मों की टहनियां सी हैं बस
जिनसे मवाद रिस रहा है।
गहरे घाव और
दवा-दारु की खोई खिदमत नहीं
फिर अचानक दुआओं का अनसुना
हो जाना भी तय हो गया है।

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...