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रविवार, 15 सितंबर 2013

गुनाहों का देवता न बनाएं उन्हें

देश ही नहीं दुनिया भर से एक ही आवाज सामने आई- फांसी। 
आवाज अपनी मंजिल तक पहुंची और फांसी का फैसला सामने आया।
जिस उम्मीद से न्यायपालिका की तरफ देखा जा रहा था, वह उम्मीद पूरी हुई।

मगर फिर भी न जाने क्यों मन को चैन नहीं मिला।
वजह यह कि कुछ ऐसी बातें फिर से देख ली, फिर से पढ़ ली और फिर से समझ लीं कि फांसी के फैसले से जो ठंडक दिल को मिली थी उससे भी कंपकंपी होने लगी।
 
पहला तो यह कि फांसी का फैसला सुनने भर पर इतना फोकस था कि ध्यान ही नहीं रहा, यह फांसी पहले सिर्फ कागज पर होगी और उसे हकीकत बनता देखने के लिए लंबा इंतजार भी करना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट-मर्सी पिटीशन और इसके बाद जब हर स्तर पर यह मान लिया जाएगा कि सच में एक जघन्य अपराध के लिए दिया गया यह फैसला सही है तब जाकर फांसी की सजा मुकम्मल होगी।
बेशक यह एक कानूनी प्रक्रिया है, जिस पर अमल होना जरूरी है और न्यायपरक भी।
 
चिंता, डर और परेशानी सिर्फ इसी बात को लेकर है कि कहीं इस एक मामले के दोषियों को फांसी तक पहुंचते-पहुंचते इतना वक्त न लग जाए कि कई दामिनियों के दमन की कहानी हमारे सामने हो और हम बेबस होकर सिर्फ इंतजार ही करते रह जाएं।
डर, बेवजह भी नहीं है।
पहले आसपास की घटनाएं डराती थी।
फिर खबरें पढ़कर डर लगने लगा
फिर लगातार बढ़ते हुए आंकड़े सामने लगे
और अब अध्ययन भी...
 
''केवल झारखंड में ही पिछले एक महीने के दौरान बलात्कार के 818 मामले दर्ज दिए गए हैं।'' (बीबीसी हिंदी)
 
''एशिया के कुछ हिस्सों में किए गए हाल के एक अध्ययन के मुताबिक 10 में से एक व्यक्ति ने माना कि उसने एक महिला के साथ बलात्कार किया है।''
 
दूसरा मुद्दा मानवअधिकारों की रक्षा करने वाले लोगों का है। ये लोग आज भी न जाने अपनी पेशेवर मजबूरी या फिर किसी और वजह से यही राग अलाप रहे हैं कि बलात्कारियों के भी मानवाधिकार होते हैं।
जिस समाज में आज भी एक तबका औरत को इंसान जैसे अधिकार नहीं देता उसी समाज में एक औरत का बलात्कार करने वाले व्यक्ति के मानवाधिकार की बात करना......यह तर्क सुनने में ही इतना घटिया लगता है कि इसे विडंबना भी नहीं कहा जा सकता।
 

तीसरी बात उन लोगों की है जिन्हें लगता है कि दोषियों को सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए लिहाजा उनकी सजा भी कम होनी चाहिए।
इस बात का जवाब एक दृश्य की कल्पना से देना ज्यादा बेहतर होगा-
 
मान लीजिए आपके हाथ में गर्म चाय का कप है, सामने से कोई अपनी मस्ती में आ रहा है और उसका धक्का आपको लग गया।
गर्म चाय आपके हाथ पर गिर गई और हाथ जल गया।
आपको गुस्सा आएगा। आप चिल्ला भी सकते हैं।
सामने वाला माफी मांग सकता है।
आप थोड़ा बहुत चिल्ला कर लड़-झगड़कर माफ भी कर सकते हैं।
 
अब मानिए कि आपके हाथ में गर्म चाय का कप है और सामने से आने वाला व्यक्ति यह सोचकर ही आ रहा है कि वह आपको इस तरह धक्का देगा कि चाय आपके हाथ पर गिरे और हाथ जल जाए।
वह आता है और अपनी योजना के मुताबिक आपका हाथ जलाकर भाग जाता है।
आप क्या करेंगे।
आप सिर्फ चिल्लाएंगे नहीं।
उसके पीछे दौड़ेंगे। आसपास के लोगों को आवाज लगाएंगे। उसे पकड़वाएंगे।
चाहेंगे कि उसे सजा हो। शायद ही आप वहां पश्चाताप की गुंजाइश तलाशने बैठें।
 
 
जिन लोगों की बात हम यहां कर रहे हैं वह दूसरे दृश्य से संबंधित हैं।
उन्होंने गलती नहीं की है गुनाह किया है।
 

स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है और उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में भी यह स्पष्टता सार्थक होगी
और इंसाफ रास्ते में ही दम नहीं तोड़ देगा। 

रविवार, 2 दिसंबर 2012

दो रूठे हुए मुल्कों की हंसी ठ‌िठोली


21 नवंबर की जिस सुबह पूना की जेल में कसाब ने खुदा से अंतिम माफी मांगी,ठीक उसी दोपहर दिल्ली में प्रगति मैदान के व्यापार मेले में पाकिस्तान के उस्मान रियाज ने कहा,'' हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं'' एक मुल्क, एक मजहब लेकिन मकसद बदलते हैं तो जिंदगी का रवैय्या भी बदल जाता है। कसाब आतंक का व्यापारी था,उस्मान रियाज रेशमी रूमाल लेकर व्यापार मेले में आया था। एक के पास नफरत की पूंजी और दूसरे के पास महीन कारीगरी की एक ऐसी मिसाल, जिसे चाहने वाले उधर भी हैं और इधर भी। दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में पाकिस्तान के सौदागरों के चेहरे पर एक दर्द था तो उनसे सौदा खरीदने आए कई लोगों पर भी उसी दर्द की छाप थी। दो मुल्कों के एक से दर्द की यह कहानी नई तो नहीं, लेकिन 65 साल पहले दुनिया के भूगोल पर खिंची गई रेखा बीतते वक्त के साथ मिट नहीं रही, और पुख्ता हो रही है-"क्या अलग है, मैडम? एक जैसा कल्चर है। एक जैसी भाषा है। नेताओं ने दूर कर दिया है बस। दोनों मुल्क एक ही हैं, क्या हिंदुस्तान और क्या पाकिस्तान।"पाकिस्तानी से आए रफीक लखानी ने बिभाजन का वक्त तो नहीं देखा, लेकिन बाद की पीड़ा को जरूर महसूस किया है। कुछ दिन पहले ही हिंदुस्तान आए रफीक ने कराची से सटे अपने गांव में लोगों को अपने रिश्तेदारों के लिए रोते देखा है, जो बिभाजन में इधर आ गए। अपने सामानों को वेचते हुए वे व्यापारी जिस गर्मजोशी से मिल रहे थे, उससे कहीं नहीं लगता था कि ये सौदेबाजी ऐसे लोगों के बीच हो रही है, जिनके मुल्कों के बीच लंबे समय से तनाव है। युद्ध हो चुके हैं और जब भी संबंध सामान्य होने की बात आती है, कसाब जैसा आतंक का कोई न कोई सौदागर रंजिश की आग को भड़का देता है। कसाब को हिंदुस्तान में फांसी दी गई तो यह तल्खी और बढ़ गई। ठीक ऐसे वक्त में पाकिस्तान से आए 25 साल के उस्मान रियाज से पूछा था कि यहां के लोगों से मिलकर कैसा लगता है तो जवाब हैरान नहीं, परेशान करने वाला था। "हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं। अब सवाल अपने ही मन में उठने लगे थे कि आखिर ये कैसे पाकिस्तानी हैं? क्या ये उसी मुल्क से आए हैं, जिसके नाम के साथ
आतंकपर्यायवाची की तरह जुड़ चुका है। अगर उस तरफ अदब की तारीफ अफजाई हो रही थी, तो इस तरफ भी अपनापे का जोर कम असरदार नहीं था। इसका असर 50 की उम्र पार कर चुकी दिल्ली के लाजपत नगर की मीना जैसवाल में नजर आया। मीना ने बताया हर साल यहां जरूर आती हूं। पाकिस्तान की गोटा-पत्ती, नक्काशी, क्रोशिए, काजल और सुरमें का कोई सानी नहीं है।मीना के पति इस बात पर थोड़े खफा से थे। बोले, दिल्ली की चांदनी चौक में क्या नहीं मिलता, लेकिन इन्हें तो लाहौर और कराची के आगे कुछ नहीं भाता।मियां-बीवी की नोंक-झोंक में दो रूठे हुए मुल्क जैसे हंसी-ठिठोली कर रहे थे। फिर मुस्कुराते हुए जब कराची से आए तकरीबन 70 साल के लईक अहमद ने अपनी बात कही तो कई और सरहदें टूटीं। बोले, मैं तो यहीं रामपुर का हूं। विभाजन के बाद सब कराची जाकर बस गए, मगर मिट्टी से रिश्ता थोड़े ही टूटता है।" लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ने का दर्द बहुत गहरा होता है। इस वेदना को या तो डाल से टूटा पत्ता समझ सकता है या नीड से बेदखल कोई परिंदा लईक हर साल यहां आते हैं और अपनी मिट्टी के अहसास को साथ लेकर जाते हैं।ब्लूचिस्तान में निकलने वाले एक खास तरह के ओनेक्स पत्थर से बनी चीजों के बीच बैठे थे लईक। पत्थर की खासियत पूछने पर उन्होंने एक फूलदान की तरफ इशारा करते हुए बताया, "इस पत्थर पर जो भी रोशनी पड़ती है वो आर-पार होकर दिखाई देती है। बिल्कुल पारदर्शी पत्थर है, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।" पत्थर के उस फूलदान से रोशनी कुछ इस तरह आरपार हो रही थी जैसे कह रही हो कि तिरे चिराग अलग हो और मेरे चिराग अलग, मगर उजाला कभी जुदा नहीं होता।यह जगह थी दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे व्यापार मेले का हॉल नंबर 22। हॉल के बाहर बेशक पाकिस्तान के नाम का बोर्ड लगा था, लेकिन यहां कोई सरहद नहीं थी। था तो सिर्फ प्यार, अपनापा और एक चाहत। 

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

न जाने हम क्या कर रहे हैं



हम लिख रहे हैं
अतीत के अपराध
और वर्तमान के राग
कि
भविष्य बेहतर हो सके

हम दिख रहे हैं
इतिहास के भगत सिंह जैसे
21वीं सदी में क्रांति की मशाल लिए
कि
आने वाली सदियां हमें भी याद करें

हम खोल रहे हैं जुबां
चुप रहने की
त्रासदियों के बीच भी
कि
सच गूंगा न होने पाए
और झूठ भी सुन सके
उसकी गूंज को

हम शामिल हैं
हर उस विचार के साथ
कि
जिससे समाज को
समानता की सूरत मिल सके

हमने कुछ रास्ते अख्तियार किए हैं
दिखाने के लिए दूसरों को रास्ता
कि
हम गर मजबूर हो गए
कहीं अपनी अपनी मजदूरी के चलते तो
वो दूसरे उन रास्तों पर चल सकें।

मगर अब हमें बांध लेनी चाहिए
अपनी अंधी उम्मीदों की ये पोटली
कि
किसी दूसरे के कंधों को ये बोझ न सहना पड़े। 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

भाषा पर डिप्लोमेसी क्यों भाई


अपनी जेब से दस रुपये का नोट निकालिए (नोट 50 या 100 का भी चल सकता है, लेकिन बढ़ती महंगाई में ज्यादा दिल क्यों दुखाएं) अब इस नोट पर ढूंढिए कि कितनी भाषाओं में दस रुपये लिखा है। हिंदी और अंग्रेजी में लिखा दस रुपये तो आपको तुरंत दिख जाएगा। मगर जरा गौर करेंगे तो बांयी तरफ 15 अन्य भाषाओं में भी दस रुपये लिखा होगा। 15 अन्य भाषाएं बोले तो असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत‌, तमिल, तेलुगु और उर्दू। बात की शुरुआत ही इस बात से करने का मकसद ये है कि इस बात पर मैंने भी हाल ही में गौर किया है कि इंडियन करंसी शायद अपने आप में इकलौती ऐसी करंसी है, जिस पर 17 भाषाएं लिखी हुई हैं। एक देश और 17 भाषाएं। इस विविधता को ही भारत की पहचान माना जाता है, बेशक अब इसमें बसने वाली एकता धीरे-धीरे टूट रही हो। जिस देश में इतने सारे अलग-अलग तरह के लोग हों वहां इतनी सारी भाषाओं का होना हैरान नहीं करता। हैरान करती हैं हिदीं दिवस जैसी तारीखें और इन तारीखों के कर्ता-धर्ता यानी हमारे रहनुमाओं के लगातार अंग्रेजी में गिगियाते भाषण और घोषणाएं। डिप्लोमेसी के मामले में भारत भी पाकिस्तान से कुछ कम पीछे नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान आतंकवाद जैसे खतरनाक और गंभीर मुद्दे पर भी डिप्लोमेसी की चाल चलकर खुद को शातिर समझता है औऱ भारत भाषा जैसे सरल से विषय को भी अपनी डिप्लोमेसी में लपेटकर अपनी विश्व की उभरती ताकत बनने वाली छवि को मटमैला कर देता है। जब जिस देश के संविधान में बाकायदा एक भाषा को अपनी राष्ट्र भाषा बना लिया गया है लोगों को हिंदी वासी के तौर पर पहचान दी गई है वहां बात-बात पर हर काम-काज में अंग्रेजी क्यों हावी हो रही है। मैं यहां ये सब इसलिए नहीं लिख रही कि मैं अंग्रेजी के खिलाफ हूं बल्कि मैं इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मैं खिलाफ हूं ऐसी व्यवस्था के जहां कहा कुछ जाता है और किया कुछ औऱ जाता है। मैं खिलाफ हूं या शायद हर वो शख्स खिलाफ है इस दोगुली नीति के जो अपनी मूल पहचान से प्यार करता है औऱ चाहता है कि उसकी पहचान को उसी रूप में पहचान मिले जिस रूप में वो है। अमेरिका से लेकर चीन तक बोलचाल से लेकर कामकाज, यहां तक कि चीन में तो इंटरनेट विंडोज और तमाम सॉफ्टवेयर तक उनकी अपनी भाषा में बने हैं न अंग्रेजी न कोई और भाषा। मान लिया जाए कि भारत में सिर्फ हिंदी ही नहीं कई क्षेत्रीय भाषाएं हैं और कुछ प्रदेशों में लोग हिंदी को बिल्कुल नहीं समझते तो फिर मैं बात को यहीं खत्म करते हुए ये कहना चाहूंगी कि हिंदी दिवस मनाना या हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना बंद किया जाना चाहिए तुरंत प्रभाव से, क्योंकि हम भारत के युवा वही देखना चाहते हैं जो सच में है न कि वो जो कभी था ही नहीं और न ही कभी हो सकता है।
14 सितंबर 2012 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी के लड्डु खाकर पछता रही हूं मैं

इससे पहले भी जब कभी मैंने आजादी के दिन के बारे में कुछ लिखा है तो उन लड्डुओं का जिक्र जरूर किया है जो मैंने पूरे 12 साल हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर खाएं हैं। बेशक मैं कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं मगर एक सामान्य शख्स की तरह कुछ इंसानी कमजोरियां मेरे साथ भी  हैं। लड्डु उन्हीं कमजोरियों में से एक है।
इसलिए शायद पिछले इतने सालों में जब भी मैंने आजादी के सही मायने तलाशने और उनके बारे में संजीदगी से सोचने की कोशिश की तो लड्डु का स्वाद उस पर हावी हो गया। आप सोचेंगे मेरी जिंदगी के 12 साल बीते हुए तो  11 साल का वक्त निकल गया फिर.. 11 साल मैं क्या करती रही..दरअसल मेरी मां टीचर हैं तो मेरा स्कूल खत्म होने के बाद भी घर पर लड्डुओं का आना जारी रहा और इसलिए मुझ पर मेरी कमजोरी का हावी होना भी...
खैर
इस बार मैंने इस पर काबू किया है...बिल्कुल वैसे ही जैसे लड़कियां अपनी दूसरी तमाम कमजोरियों पर काबू करती रहती हैं न जाने कितनी बार....
लड्डु न खाने से पेट में जो स्पेस खाली छूटा है वहां एक सवाल घुड़मुड़-घुड़मुड़ कर रहा है। सवाल ये कि क्या ये दिन सच में इस तरह खुश होने का है कि स्कूलों में लड्डु बांटे जाएं। छतों पर पतंग उड़ाई जाए। फिल्म देखी जाए। बाहर घूमने जाया जाए। धानी और नांरगी रंग के कपड़े पहने जाएं। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया जाए। रंगारंग कार्यक्रम किए जाएं...?
आज इतने सालों बाद आजादी पर सोचते हुए मैंने अपनी एक कमजोरी को तो पीछे छोड़ दिया है मगर दूसरी फितरत मेरे साथ है और वो है मेरा स्वार्थ। स्वार्थ ये कि यहां मैं पूरे देश या देशवासियों की नहीं सिर्फ अपने लिए आजादी के मायनों की बात करुंगी। जानती हूं कि 65 साल बाद इन बातों का रोना रोकर कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन मैं इतने सालों तक खाए गए लड्डुओं का पश्चाताप करना चाहती हूं।
तो कहानी कुछ इस तरह है कि किताबों और किस्सों से इतर जब मैंने इस बार आजादी को समझा तो देखा कि
इस डिप्लोमेटिक आजादी की वजह से ही आज मेरे पास मेरे गांव का नाम नहीं है। वो गांव जहां शहर की आपाधापी से दूर जाकर कुछ दिन मैं सुस्ता सकूं। कोई जमीन नहीं है जिसके खेतों में मैं गर्मियों की छुट्टी में जाकर लहलहा सकूं। पुरखों की विरासत नहीं है। वो गली कूचे नहीं है जहां मेरे  दादा-परदादा रहे और पले-बढ़े। और जहां जाकर मैं उनके अस्तित्व को महसूस कर सकूं। उन पर किस्से कहानियां औऱ कविताएं लिख सकूं। विभाजन की वो टीस क्या होती है वो इस बार पहली बार मुझे महसूस हुई। शायद कहीं दबी तो पड़ी थी पर लड्डुओं ने उसे उबरने नहीं दिया।
कहां की हो तुम...ये सवाल न जाने कितने सालों से हर वक्त हर मोड़ पर पीछा करता रहता है। ... औऱ मैं कुछ ठीक-ठीक नहीं बता पाती। क्यों..क्योंकि हम मुलतानी हैं। मुलतान के रहने वाले मुलतानी.. इतना कह भर देने से ही मेरे दोस्त मुझे रिफ्यूजी कह कर चिढ़ाने लगते औऱ एक कुंठा मेरे अंदर दाखिल होती और फिर हवा के रास्ते बाहर निकल जाती। मुझे लगता रिफ्यूजी होना एक मजबूरी है कोई इतनी बुरी बात नहीं जिस पर संजीदा हुआ जाए।
लेकिन आज मैं बेहद संजीदा हूं क्योंकि इस रिफ्यूजी होने ने मुझसे मेरा इतिहास छीन लिया और इसलिए मैं अपने भूगोल को आज तक नहीं समझ पाई औऱ न ही समझा पाई....
अब आप ही बताइए कि मेरी मां का जन्म उत्तरप्रदेश के एक कस्बा नुमा शहर खुर्जा में हुआ उनका बचपन पंजाब के अबोहर में बीता। मेरे पिता जयपुर में पले-बढ़े। देहरादून में पढ़े-लिखे। हरिद्नार में बसे। और मेरा जन्म हुआ बुलंदशहर में और मैं बचपन से रही हूं गाजियाबाद में..............अगर आप मेरे इस भूगोल को समझ सकें हों तो मुझे भी एक शब्द में इस सवाल का जवाब दीजिएगा कि "मैं कहां की हूं..."सिवाए इस जवाब के जो मैंने अभी कुछ बरस पहले ही देना सीखा है.." हिंदुस्तान"
मगर फिलहाल मैं खुद ही एक कोशिश करती हूं अपने असल भूगोल को समझने की...
मुलतान, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, चेनाब नदी के किनारे।
मुलतान, जिसे सूफी और संतों का शहर कहा जाता है।
मुलतान, जो बाबा फरीद के नाम से मशहूर पंजाबी के बेहद शुरुआती दौर के कवि फरीदुद्दीन गंजशकर का जन्मस्थान है।
मुलतान, जो सिर्फ एशिया ही नहीं दुनिया के कुछ एक सबसे पुराने शहरों में से एक है।
औऱ
मुलतान, वही शहर जो आजादी के नाम पर अपनी पहचान लुटा बैठा। और मुलतानी कहे जाने वाले इसके बाशिंदे भारत का रुख कर गुमनाम हो गए क्योंकि मुस्लिम बहुल होने के कारण मुलतान को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया....।
ये ख्याल बहुत पाक नहीं लगते जो आज मन में यूं कुलाचे मार रहे हैं। क्योंकि इतना जानती हूं मैं कि उस वक्त ब्रिटिश रुल से आजाद होना ही सबसे बड़ी परिभाषा थी आजादी की..शायद रहनुमाओं  को ख्याल ही न आया हो किसी की पहचान और गांव घर के हमेशा के लिए दफन होने का।...मगर आज इन ख्यालों को रोकना नहीं चाहती मैं... बेशक नापाक ही सही लेकिन आज आजादी के इरादे मेरे मन में कुछ नेक नहीं लगते...आज मैं आजादी के इस दिन को बेदखल कर देना चाहती हूं अपनी जिंदगी से ...

रविवार, 18 दिसंबर 2011

एक जरुरी कवि


सुबह सुबह दफ्तर से फ़ोन आया अदम गोंडवी नही रहे. उनके लिए कुछ खास सामग्री इकठा करनी थी. ख़ास पेज के लिए. साहित्य मेरे लिए सांसों की तरह है और ये नाम बिलकुल अनजान. ये बात मेरे बॉस को भी शायद ठीक नही लगी जब उन्होंने मुझसे पूछा-जानती हो न अदम जी को, आज उन्ही पर काम करना है.. और मैंने अन्म्नाते हुए कहा, जान लुंगी सर जल्दी पहुँचती हू दफ्तर. लेकिन अनमनी से न मेरे भीतर कुल्बुका रही थी. कलाकार हैं या कवि. कौन है ये. मैं कैसे नही जानती इन्हें. कहाँ सूना है इनका नाम. एक दोस्त को फोन किया उन्होंने तुरंत एक ही बार में अदम जी का पूरा परिचय उनके अल्फाज मेरे सामने रख दिए और मेरी सोई हुई स्मृति अचानक जगी, बहुत साल पहले एक वाद विवाद प्रतियोगिता में मैंने शुरुआत ही इन पंक्तियों से की थी ...

 मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत

वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी

ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया

सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार

होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की. 



तब नही जानती थी कि किनके अल्फाजों को अपने पक्ष का हथियार बना रही हूँ...आज जानें क्यों उनके जाने पर ऐसे लग रहा है कि कोई अपना बिना मिले ही चला गया. अफ़सोस भी है और अपनी अन्जानियत का गहरा अहसास और आघात भी. एक मित्र या कहूँ कि वरिष्ठ मित्र और  आलोचक हैं मेरे जो अक्सर मेरी कवितायेँ पढ़कर  कहते है -ये क्या लिखती रहती हो चाँद, सूरज, आसमान और धरती. प्यार इश्क और फूल पत्ते, एक ऐसे कविता लिखो जो जरुरी हो तुम्हारे लिए नही सबके लिए आम इंसान और देश दुनिया के लिए. लेकिन आज उनकी ये बात मुझे फी याद आई और लगा एक जरुरी कवि चला गया जिसकी हर कविता जरुरी थी और हमारे लोगों कि जरुरत भी..
ये साल तमाम बड़े नाम हमें अलविदा कह चुके हैं सिलसिलेवार
मैं तो किसी के नीजी जीवन में शामिल नही थी
न ही किसी कि बहुत बड़ी प्रशंसक
मकबूल फ़िदा हुसैन के जाने पर लगा इन्हें क़तर जाने की बजाय इनकी कदर होनी चाहिए थी देश में ही
भूपेन हजारिका गए तो लगा कि एक समाज कि जलती हुई लौ से घी ख़त्म हो गया
देव साहब की जिन्दादिली और उनकी दिनचर्या से हमेशा अपनी सोच के अंधेरों में घिरा होने पर प्रेरणा ली है मैंने तो उनका जाना मेरे लिए मेरी एक उम्मीद का टूटना था
लेकिन अदम जी तो एक अनजान बनकर मेरे आस पास अपने शब्दों के रूप में  रहे और जाते जाते इतना परिचित कर गए कि मैं बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रही हूँ कि इतने जरुरी कवि को नही जानती थी मैं और कविता लिखती हूँ
क्या मैं लिख पाऊँगी कभी कोई जरुरी कविता ?
 

रविवार, 14 अगस्त 2011

इस आजादी पर

घुमकड़ी का अपना अलग मजा है आप अकेले होकर भी एक नए शहर में एक नई जगह पर अकेले नही होते क्योंकि वहां बहुत कुछ होता है आपके जानने समझने, देखने और महसूस करने के लिए... दिल्ली की दुनिया में रहकर पंजाब मेरे लिए सिर्फ फिल्मों में दिखने वाली एक ऐसी जगह थी जहाँ बेहद खूबसूरत सरसों के खेत होते है ..इससे ज्यादा कभी मैंने सोचा ही नही शायद ....या जरुरत ही नही पड़ी सोचने की
लेकिन जरूरतों से जुस्तजू के दरम्यान एक रात में ही मेरे रहने का ठिकाना बदला और ६ सितम्बर २०१० को मैं लुधियाना आ गई ....फिर एक सिलसिला शुरू हुआ घुमकड़ी के उस शौक को पूरा करने का जो दिल्ली में रहते हुए सिर्फ कनाट प्लेस, लाजपत नगर, साकेत या मंडी हाउस तक सीमित था...हालाँकि मैं अपना ये शौक बहुत बेहतरी से तो पूरा नही कर पाई ..लेकिन एक छोटी से अनजानी सी अनसोची सी यात्रा हुई ..


फिरोजपुर
का गाँव हुसैनीवाला, पाकिस्तान की सरहद से सटा...मेरी हमेशा से पाकिस्तान जाने की इच्छा रही है .....वजह है ये जानना कि आखिर कौन सी ऐसी खाई है जिसने एक देश को दो बना दिया और दो पड़ोसियों को कभी एक होने नही दिया..लेकिन जिदगी की दूसरी  और जरूरतों और दबावों के आगे ये इच्छा जरा साइड पर ही रहती थी ...दरसल मैं फिरोजपुर अखबार के लिए एक स्टोरी करने गई थी ...कुछ पता नही था कि जहाँ जाना है वो जगह कितनी दूर है , वहां जाने का साधन क्या है और हा रात से पहले घर भी लौटना था...मुझे मुहार जमशेर नाम के एक गाँव में जाना था जो फिरोजपुर से भी १२० किलोमीटर दूर था और दोपहर के  3 :३० बजे फिरोजपुर से इस गाँव के लिए निकलने का मतलब था वापसी में देरी और असुरक्षा... इसलिए एक जानने वाले से पूछा  कि यहाँ सरहद पर बना कौन सा गाँव सबसे नजदीक है ..तब उसने हुस्सैनिवाला के बारे में बताया.. तब नही सोचा था कि आज मेरी वो साइड की हुई इच्छा यूँ पूरी होने वाली है.. गाँव पहुंचकर वहां बने बोर्डर के बारे में पता चला तो सोचा कि यहाँ देखते है क्या होता है ..बस फिर रास्ता ही सब कुछ जानता  था और हम निरे अजनबी एक मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे ...जब पहुंचे तो दिखी
दो सरहदे...एक तरफ पाकिस्तान ....एक तरफ हिन्दुस्तान
एक तरफ पाकिस्तान के लोग ..दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के
इधर हमारे सिपाही ..उधर उनके
एक दूसरे के आगे पैर ठोकते हुए ...
एक दूसरे को अकड़ दिखाते हुए ..
अपने अपने झंडे को ऊँचा उठाते हुए ..
वहां से पाकिस्तान जिंदाबाद  के नारे लगा रहे कुछ लोग
तो यहाँ से हिन्दुस्तान की जयकार करते  नौजवान
.
.
.
.
एक साथ बहुत से सवाल उमड़ घुमड़ आये ये सब देख कर कि
ये सब क्यों हो रहा है ?
किसने बनवाया होगा ये बोर्डर ?
जब दुश्मनी है तो ये ठोक बजाने का दिखावा क्यों ?
 क्या मिल जाता है एक दूसरे के झंडे को निचा दिखाकर ?
क्या कभी मन नही करता होगा आपस में आम लोगों की तरह हसने बोलने का ?
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जब वहां एक सिपाही से इन सवालों के जवाब लेना चाहा तो उसने कहा हमें मीडिया वालों से बिना इजाजत बात करने की परमिशन नही है
जब तक वहां सेरेमनी चलती रही सिर्फ दुश्मनी दिखाई दी
जब वो सेरेमनी ख़त्म हुई और हम लोग बाहर आने लगे तब किसी को बातें करते सूना .." ये लोग सिर्फ आधे घंटे की इस सरेमोनी में ही ये ठोक बजाते है रात को साथ बैठकर दारु पीते है ..
फिर देखा की सीढियों से उतरते हुए पाकिस्तान के कुछ बच्चे हमें हाथ हिलाकर बाय कर रहे है
कुछ मुस्कुरा रहे हैं
कुछ नजरों में निगाहे डालकर कुछ ढूँढना चाह रहे है
ये वो बातें है जिन्हें लिखकर बयाँ नही किया जा सकता
हां आप चाहे तो पढ़कर महसूस जरुर कर सकते हैं ...
ये चिंदी चिंदी से एक दो पल जब आँखों के आगे दुबारा तैरते है तो लगता है यहाँ मैं रीट्रीट सेरेमनी नही
रीथिंक टू रीबिल्ड सरेमोनी देखने आई थी
यानि दुबारा से ये सोचना की हमें क्या बनाना है
दो दुश्मन देश??
दो दोस्त??
एक टुटा हुआ एक रूठा हुआ देश??
या फिर अगर हम ये सारी सरहदे ही मिटा दें !!!!! सिर्फ बातों में नही सच में ...सच में जाये और वो लोहे की तारें काट आये किसी औजार से
अब मिट जाना चाहिए इन सरहदों का अस्तित्व...हम दोनों देशवासी तो facebook पर कब से एक दूसरे के दोस्त हैं
हमारा दिल कब से धड़क रहा है विभाजन में अपने पीछे छुट चुके परिवारों के लिए

हम कहाँ चाहते है अब लड़ना झगड़ना हम तो चाहते है पाकिस्तान के खूबसूरत शहरों में जाकर छुट्टियाँ बिताना ...(इस आजादी दिवस पर पहली बार बेहद गुलाम अनुभव कर रही हूँ मैं खुद को)



शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

dnt just obey boss



सिर्फ घोटालों ही नहीं तमाम तरह के मोह और माया जालों में फंसे धंसे देश के बेदाग़ छवि वाले प्रधानमन्त्री कह रहे है कि मैं जॉब कर रहा हूँ. ये बात सुनकर एकबारगी तो प्रधानमन्त्री जैसे बड़े से पद की महिमा बेहद छोटी नजर आती है लेकिन वहीँ दूसरी दफा सोचने पर कीचड़ में कमल की तरह खिलते मनमोहन सिंह दिखाई देते है जो असल मायनो में पार्टी प्रधान के दिशानिर्देशों पर शिद्दत से काम कर रहे है बिलकुल जॉब के शाब्दिक अर्थ को चरितार्थ करते हुए ...just obey boss . लेकिन उनके पद की गरिमा और गुंजाईश को नौकरी नुमा घेरे में कैद करना उस मिशन के साथ नाइंसाफी है जिसके  आधार पर इस पद की अवधारणा बनाई गई थी. 
बात सिर्फ प्रधानमन्त्री के ब्यान पर टिप्पड़ी करने की नहीं है बल्कि ये भी है कि अगर हम सब लोग अपने काम को सिर्फ जॉब मानकर करें जिम्मेदारी और जवाबदेही समझकर नहीं तो क्या इस विकासशील देश के विकास का पहिया चल पायेगा ...जो सोच पहले से ही  संकुचित है अगर उसे नौकरी समझकर सीमित भी कर लिया गया तो 
किसी कंपनी में बतौर प्रशिक्षु शुरुआत करने वाली कोई महिला उसी कंपनी के सर्वोच्च पद पर पहुँच पाएगी...
क्या एक टी  वी प्रोग्राम से शुरुआत करने वाला व्यक्ति एक पुरे न्यूज़ चैनल को स्थापित कर पाता..
पेट्रोल पम्प  पर काम करने वाल एक अदना सा कर्मचारी aदेश के नामी अमीरों में शामिल होता 
ऐसे कई सवाल है जो मंत्री जी के एक जवाब पर खड़े हो गए हैं 

 

बुधवार, 29 सितंबर 2010

एक नूर से सब जग उपज्या



मुझे कल गाजिअबाद अपने घर आना है, लेकिन नही आ पाऊँगी शायद, कारण अयोध्या मुद्दे पर फैसला आने वाला  है. पता नही क्या फैसला होगा.फैसले के बाद क्या होगा. दंगे, शांति, सुलह या एक नए रस्ते की तलाश या फिर हमारी कल्पनाओ से परे कुछ. सब आपस में बतिया रहे है क्या होना चाहिए  ???
सब अपने अपने ख्याल जता रहे है , यहाँ किसी ने कहा की मेरे ख्याल से वहां एक स्कूल बना दिया जाना चाहिए. उसमे हिन्दू मुस्लिम दोनों के बच्चे पढ़ सकेंगे. दूसरी आवाज आई बेशक बाकी जगह कुछ भी हो रहा हो लेकिन इस वजह से कई दिनों  से घर में बेरोजगार बैठे यु पी के कुछ होम गार्ड  काम पाकर राहत  महसूस कर रहे है. बातों के बीच से टी वी पर नजर दौड़ाई तो अवध और अयोध्या से  भाईचारे की मिसाल पेश करती कहानिया दिखाई जा रही थी. जैसे वहां तो लोग हिन्दू मुस्लिम और कौम नाम की बातों को जानते ही नही है. सिर्फ अयोध्या और अवध ही क्यों देश भर में ऐसी कई मिसाले है जहाँ लोगों ने हिन्दू मुस्लिम के बीच की खाई को पाट कर अपनी अलग पहचान बनाई है.
हम आपस में बात करते हुए भी लोगो से यही सुनते है कि क्या रखा है मंदिर और मस्जिद में. कोई  कबूतर से पूछे कि कौमी एकता क्या है कभी मंदिर पे बैठा होगा कभी मस्जिद पे. ऐसे मिस्रो और मिसालों की कमी नही है जो हमें ऐसी सोच से दूर रहने के लिए कहते है जहाँ दो धर्मो के बीच दुश्मनी पनपे उनमे कोई भी बैर हो ...जहाँ तहां सून रही हूँ अधिकतर लोग चाहते है कि मामला सुलझ जाये और फिर जो आग बुझ सी गई है उसे अब चिंगारी दिखा कर राख लेने का क्या मतलब. 
पूरा देश डर के सायें में है और मुद्दा सिर्फ इतना है कि एक जगह पर मंदिर बनाया जाये या मस्जिद. मेरा एक मासूम सा सुझाव है अगर कोई पढ़ ले तो एक ऐसा निर्माण किया जाये जहाँ भगवान् के नाम का हर चिन्ह मौजूद हो. ईसामसीह, राम, कृष्ण, खुदा की इबादत, गुरबानी.
सवाल ये भी है कि जब कोई हम आप मैं चाहते ही नही कि कोई विवाद हो दंगा हो तो कौन लोग हैं हमारे ही बीच से जो खा म खा चिंगारियां भड़का  रहे है. क्या राजनीती  की लौ में तेल डालने के लिए महानुभाव देश को जला डालना चाहते है .
सवाल बहुत सारे है जवाब शायद एक कि

 एक नूर से सब जग उपज्या.............


 

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

कार्य प्रगति पर है ......!

   प्रधानमंत्री  
    उवाच.
      .... 

    भोपाल गैस त्रासदी मामले में सरकार कुछ नहीं छिपा रही है। एंडरसन की सुरक्षित रिहाई संबंधी दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं हैं। मेरा मानना है कि जीओएम ने इस संबंध में तमाम कागजात देखे हैं, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे बिल्कुल स्पष्ट रूप से पता लगता कि रिहाई का जिम्मेदार कौन था?

27 जून 2010



                पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ाई कीमतों में रोल बैक नहीं होगा। पेट्रोल की तरह अब डीजल की कीमतों को भी सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। ऐसा करना बहुत जरूरी है। सरकार पर मूल्य वृद्धि के लिए किसी तरह का कोई बाहरी दबाव नहीं था। केरोसिन तेल और रसोई गैस पर सब्सिडी उस स्तर पर पहुंच गई थी, जिसमें सुधार निहायत जरूरी हो गया था।

28 जून 2010 




                1984 के सिख विरोधी दंगे नहीं होने चाहिए थे। मैं देश से माफ़ी माँग चुका हूं। पीडि़तों के जख्मों को भरने के लिए हरसंभव क़दम उठाए जाएंगे। अब हमें इससे आगे बढऩे की ज़रूरत है।  लगातार 1984 के दंगों को याद करते रहने से सोच पर असर पड़ता है


29 जून 2010


                हमारी न्याय प्रक्रिया में वक्त ज्यादा लगता है। इसीलिए भोपाल गैस त्रासदी के अदालती फैसले में करीब 25 साल लग गए। यह हमारी न्यायपालिका की सबसे बड़ी समस्या है।Ó सिंह ने कहा, '1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में भी न्याय तंत्र से चूक हुई है। जिम्मेदार लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए। सरकार न्याय तंत्र की इन खामियों को दूर करने के प्रयास कर रही है।

29 जून 2010





 माननीय प्रधानमंत्री जी के ये शब्द भविष्य की सारी उम्मीदों को ठेठ हिंदुस्तानी अंदाज में मरहम लगा रहे हैं।  ऐसा लगता हैं मानो कह रहे हों जो हुआ उसे भूल जाओ, जो हो रहा है वह हमारी मजबूरी है, और हम अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।  ऐसे समय में जब पूरे देश की जनता मंहगाई की महामारी से जूझ रही है, सत्ता के गलियारों में जनता की सुध कम और स्वार्थ सिद्घी का शोर अधिक सुनाई दे रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक देश के हर कोने से व्यवस्था के चरमराने की आवाजें आ रही हैं, प्रधानमंत्री इस बयानबाजी से अपना बचाव कर रहे हैं या जनता को बेवकूफ बनाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं?


 कश्मीर में बढ़ती हिंसा, पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, झारखण्ड में लगातार हो रहे माओवादी हमले, मणिपुुर में अलगाव से पनप रहा उग्रवाद, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र , कर्नाटक और उड़ीसा में किसानों की आत्महत्या और बदहाली के बढ़ते मामलों के अलावा, इस समय देश के हर राज्य में किसी न किसी तरह का संघर्ष दम भर रहा है। गौर करने की बात ये है कि संघर्ष की वजह वर्षो पुरानी हैं और उनके समाधान के नाम पर आज भी 'कार्य प्रगति पर हैÓ सरीखी मीठी गोलियां दी जा रही हैं। पिछले दिनों लगातार हो रहे नक्सली हमलों में अब तक 175 जवान मारे जा चुके हैं और न जाने कितनी निर्दोष जाने गई हैं लेकिन 'सरकार कार्यवाही कर रही हैÓ और 'नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी समस्या हैÓ के बयान के अलावा अब तक कोई कदम नहीं उठाया जा सका। भोपाल की गैस त्रासदी जो पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है उस पर 25 साल बाद किस तरह का मरम लगाया गया है ये भी सभी देख रहे हैं। जिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हज़ार लोग मारे गए थे और मौतों का ये सिलसिला बरसों चलता रहा अब उसी सरकार ने ये बयान दिया है कि उस दोषी के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं मिल पाया जिसके दोषी होने की गवाही हर वो जख्म दे रहा है जो आज 25 साल बाद भी ताजा है। 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे जो बेगुनाह लोगों की मौत और विध्वंस का सबब बन गये थे। जिनमें दस हज़ार से भी अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भी केवल दिल्ली में ही 2733 लोगों को मार डाला गया था। देश की राजधानी में तीन दिनों तक चले इस ख़ूनी खेल में तब पुलिस और प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और सबसे हैरान करने वाली बात कि आज 25 साल बाद भी इस घटना को अंजाम देनेवाले और उनके राजनीतिक संरक्षकों में से 99.9 प्रतिशत सज़ा से साफ बच गए हैं। ऐसे में खुद एक सिख होते हुए प्रधानमंत्री इन बातों को भूल कर आगे बढऩे की सलाह दे रहे हैं, जैसे ये कोई सच्ची घटना नहीं महज एक बुरा ख्वाब हो। मंदी में आई बेरोजगारी से अभी जनता उबरी नहीं थी कि उसे मंहगाई के बोझ ने मार दिया। बोझ भी ऐसा जो हर हफ्ते की दर से बढ़ता ही जा रहा है। पहले खाने का सामान मंहगा हुआ और अब बनाने का साधन। जनता जवाब मांगे तो एक ऐसा बयान दिया जाता है जिससे लोकतंत्र में तानाशाही होने की बू आने लगती है। देश ने चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बहुत लड़ाईयां लड़ ली हैं और बहुत से संधि-समझौतों पर भी हस्ताक्षर हो चुके हैं लेकिन पानी को लेकर जो संग्राम छिडऩे वाला है वो शायद पानीपत की लड़ाई से भी ज्यादा खतरनाक होगा। मुद्दे कई है कुछ बहुत जोर-शोर से उठाए जा रहे है कुछ सतही स्तर पर हल्ला बोल रहे हैं, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश के कर्ता-धर्ता इस अवसर पर जो बोल रहे हैं क्या उससे समस्याओं के निदान का कोई सुराग मिलता है?

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...