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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

कोट और पुतली की प्रेम कहानी


एक शहर का नाम है कोट और नजदीक में एक गांव है, जिसका नाम है पुतली। 

अक्सर आस-पास रहते हुए आपस में काफी अंतर होते हुए भी साथ चलने और साथ होने की इतनी आदत हो जाती है कि उस अंतर को खत्म करके एक हो जाने का अहसास हर पल दिलो-दिमाग में हावी होने लगता है।
शायद कोट और पुतली के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा और वो एक होकर कोटपुतली बन गए।
शायद ये लवस्टोरीज को लेकर मेरा अतिरेक ही है कि मैंने अपनी कल्पना से ये कहानी गढ़ दी है...मुझे गढ़ते हुए अच्छा लगा और उम्मीद पाल चुकी हूं कि पढ़ने वालों को पढ़ते हुए अच्छा लगेगा...इसके आगे की कहानी ये है कि कोटपुतली दिल्ली से 175 किमी दूर है, गुड़गांव से 128 किमी, जयपुर से 105 किमी और अलवर से 70 किमी। कोटपुतली की लवस्टोरी जो मैंने अपने मन से गढ़ दी है उसे आप अपनी आंखों से देख सकते हैं वहां जाकर जहां मेरी इमेजिनेशन में कोट और पुतली की शादी हुई थी। उस जगह का नाम है जस्ट देसी। 
Just Desi एक ठौर है दिल्ली से जयपुर जाते वक्त सुस्ताने के लिए। शहर की आपाधापी के बीच खुद को एक 

ऐसा मौका देने के लिए जो कम से कम एक महीने के लिए आपको तरोताजा रख सकता है। यहां आपको खेतों की रौनक मिलेगी और चाहे तो एक-दो हाथ बुआई-कटाई में लगाकर खेती को समझ भी सकते हैं। ताजा और एकदम ऑर्गेनिक सब्जियां लेकर भी आ सकते हैं।

प्रकृति अपने आप में जादुई होती है और मिट्टी को आकार लेते देखना भी मुझे उस जादू का ही एक हिस्सा लगता है। यहां आप ये जादू सिर्फ होते हुए ही नहीं देखते खुद वो जादू कर भी सकते हैं। यहां क्ले मॉडलिंग का एक कॉर्नर बना है, जहां आप अपनी पसंद के बर्तन बना सकते हैं...ये बर्तन अपने घर ले जाकर हमेशा के लिए यादों को भी सहेज सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि चक्की पीसने का कनेक्शन सिर्फ जेल जाने से है, तो आप गलत हैं। एक जमाने में
जब हर घर में चक्की होती थी और महिलाएं अनाज हर रोज उसी चक्की पर पीसा करती थीं...वो जमाना जस्ट
देसी में फिर से जी उठता है, यहां बने चक्की कॉर्नर के साथ। बच्चों को उस जमाने की झलक दिखाने का ये अच्छा तरीका हो सकता है।

फिर चूल्हे की रोटी और बिना मशीन के दूध से मक्खन निकालने का तरीका, सूरज की परछाई से समय देखने की  ट्रिक जिस तरह आपके बच्चे यहां देखेंगे, शायद वो शहरों में देखने को ना ही मिले। 
ये ठौर मेन सड़क पर है, लेकिन इसके लिए सीढ़ियां उतरकर एक नई दुनिया में जाना पड़ता है, ये दुनिया सड़क पर तेज रफ्तार से जाती गाड़ियों से शायद नजर ना आए, इसलिए जीपीएस ऑन करके सही पते तक पहुंचना सही रहता है। मगर ज्यों-ज्यों आप सीढ़ियां उतरकर उस दुनिया में जाते हैं, उसके बाद के पल हमेशा के लिए यादगार बन जाते हैं।


ऐसे समय में जब नौकरी से छुट्टी मिलने का झंझट हो और एक ऑफ में ही दुनिया समेटनी पड़े, तब इस ठौर का 
रूख करके दुनिया बदलने का अनुभव लिया जा सकता है।








रविवार, 9 जून 2013

हर शहर में एक समंदर होना चाहिए...

मुझे नहीं मालूम...क्यों
लेकिन कुछ तो बात है इस शहर में
जो हमेशा से ये सपनों का हिस्सा रहा है।
और जब सपने सच
होकर सामने खड़े होते हैं
तो भावनाएं कहीं छूमंतर हो जाती हैं
शब्द कहीं लुप्त
और उस वक्त का
हर एक अहसास जैसे अमर हो जाता है।
ऐसा ही कुछ हुआ
बस अभी चंद घंटों पहले
जब मैंने मुंबई में कदम रखे।
एक अनजान शहर के बारे में
कुछ भी कहने के लिए
कुछ घंटे बेहद नाकाफी हैं
लेकिन यही इस शहर की खासियत है शायद
कि यहां सिर्फ कुछ पल बिताकर भी
शब्दों में अच्छा-खासा निवेश किया जा सकता है।
!!!
आसपास, चारों तरफ, दूर-दूर तक फैले अथाह पानी के बीच
भी जैसे... कोई जमीन तलाशकर अपने पैरों पर खड़ा हो...
...कुछ ऐसा ही शहर है मुंबई।
एक जगह
हर पल जमीन को अपनी आगोश में लेने की कोशिश करने वाला
समंदर है तो
दूसरी जगह
आसमान को अंगूठा दिखाती इमारतें।
जैसे पूरी कायनात से बैर पालकर ही ये शहर जिंदा है
और जिंदादिली की मिसाल भी
तभी तो यहां आने वाले किसी भी शख्स की जिंदगी
किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं होती है।
बेशक असल में हर कोई हीरो न
हीं बन पाता है
लेकिन यहां रहकर जिंदगी जीना किसी के लिए भी हीरोगिरी से कम नहीं है।
बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर लोग यहां आते हैं...
और ये उम्मीदें उन छोटी-छोटी खिड़कियों से बाहर झांकती दिखाई देती हैं
जो यहां बनीं
और टूटने के लिए बेताब होते हुए भी
कई सालों से जस की तस खड़ी इमारतों में
बिलकुल वैसा ही दर्जा रखती हैं,
जैसा कि किसी सिनेमाघर में बालकनी की सीट।
यहां रहने वालों की दुनिया एक दूसरे से काफी अलग है
लेकिन कुछ चीजें बिलकुल एक जैसी हैं...

यहां टैक्सी चलाने वाले भैय्या से लेकर बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले सेलिब्रिटी तक
हर किसी के लिए इस शहर की जिंदादिली एक मिसाल है
और यहां लगने वाला घंटों का लंबा ट्रैफिक जाम... एक कभी न खत्म होने वाली परेशानी।
इसके आगे कुछ भी कहने से पहले मुझे अंग्रेजी की एक कहावत का सहारा लेकर बात खत्म कर लेनी चाहिए क्योंकि अंग्रेजी में कहते हैं कि

 "The most amazing travellers were to humble to write about it"

यहां मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है शायद
लेकिन एक बात जरूर है कि मुंबई से आने के बाद लगता है कि
हर शहर में एक समंदर होना चाहिए...

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

गाली, गोली और गैंग्स ऑफ सो मैनी रियल्टीज(2)

यार तू देखिओ इसका तीसरा पार्ट भी आएगा। 
...अबे तुझे कैसे पता
यार मैं कह रहा हूं न..
अभी रामाधीर सिंह का बेटा जिंदा है..
और डेफिनेट भी तो है...
अब वो राज करेगा वासेपुर में
..अबे हां यार ...तीसरे पार्ट में और भी मजा आएगा
अब डेफिनेट बताएगा...
.
.
.
गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट-2 देखने के बाद लौटते हुए ऑटो में तीन 14-15 बरस के लड़कों की बातचीत  कुछ इसी तरह की थी। अब इसके बाद और वो भी फिल्म रिलीज होने के इतने दिन बाद समीक्षा लिखने का कोई बहुत ज्यादा औचित्य नहीं लगता। मगर ये फिल्म का ही असर है कि कह के लेना जरूरी लगता है...तो सोचा कुछ कह दिया जाए....

‌‌स‌िनेमा के इतिहास में ये फ‌‌िल्म ‌क‌ितना याद की जाएगी इस बारे में तो शायद वक्त ही बताएगा मगर ‌‌‌बॉलीवुड में ‌फ‌िल्मों के ‌‌स‌िक्वल की जब भी बात होगी तो गैंग्स ऑफ वासेपुर का ‌ज‌िक्र जरूर ‌क‌िया जाएगा। बॉलीवुड में, ‌फ‌िर हेरा-फेरी के बाद गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 ही ऐसी ‌फ‌िल्म लगती है जो सच में स‌िक्वल के मायनों पर खरी उतरती है। ‌‌स‌िक्वल यानी जो पहली कहानी को पूरा करे ...और गैंग्स इस परख को पूरा करती है

सरदार खान को ‌क‌िसने मारा? 
बंगालन ने ‌क‌िसे फोन ‌करके सरदार खान के बारे में बताया?
दान‌िश और फैजल में से कौन लेगा सरदार खान की मौत का बदला?
रामाधीर  क्या सेकेंड पार्ट में भी एक शांत शात‌िर नेता बना रहेगा या उसका खून भी खौल जाएगा और वो भी कह के लेने की ‌ह‌िम्मत जुटा पाएगा ?
गोली-गाली और बदले की इस लड़ाई के बीच कैसे ‌ख‌िलेगी मौसीना और फैजल की प्योर देहाती फ्लेवर से लैस प्रेम कहानी? 
नगमा खातून के रोल में ऋचा चड्डा बूढ़ी उम्र के साथ कैसे करेगी इंसाफ और फैजल के तौर पर नवाजुद्दीन ‌स‌िदद्की मनोज वाजपेयी की तुलना में ‌क‌ितना बेहतरी से ‌फ‌िल्म को संभाल पाएंगे?

इन सारे सवालों के जवाब बेहद धुआंधाड़ और चुटीले अंदाज में गैंग्स के पार्ट- 2 ने द‌िए। इसके अलावा एक टाइमलाइन की तरह ‌ज‌िस तरह इस फ‌िल्म में साल दर साल झारखंड और ‌ब‌िहार में लोहे और कोयले के काले धँधे की कलई खोली है उसे देखते हुए ही शायद असल में भी कोयले की धांधली पर कैग की ‌नई ‌रिपोर्ट सामने आ गई है। 

इस तरह के काले धंधों की राजनीत‌ि को ‌फ‌िल्म के ज‌‌रिए समझाने की सोचना और ऐसा करके ‌द‌िखाना एक ब़डा रिस्क है। इस ‌रिस्क को उठाकर अनुराग कश्यप ने क‌ितना गेन कमाया है ये तो इस ‌फ‌िल्म की चर्चा से ही मालूम हो जाता है।

इस ‌फ‌िल्म में एक आम दर्शक के ‌ह‌िसाब से तमाम ऐसी बाते हैं ज‌ो उसे ये फ‌िल्म न देखने की सलाह देती ‌द‌िखती हैं, मगर ‌फ‌िल्म रिलीज के एक हफ्ते बाद भी  इस ‌फ‌िल्म को देखने के ‌ल‌िए थ‌‌ियेटर में जुटी भीड़ इस बात का सबूत देती है क‌ि उन सारे सलाह-मशवरों को पीछे छोड़कर प‌‌ब्ल‌िक ने ये देखने में ‌द‌िलचस्पी द‌िखाई है ‌क‌ि आख‌िर तमाम आलोचनाओं के बावजूद इतनी गाल‌ियों और गोल‌ियों को फ‌‌िल्म में रखने की वजह क्या थी।
और जहां तक मुझे लगता है दर्शकों को वो वजह दिखाई भी दी और समझ भी आई।

बेशक ये फिल्म का सेकेंड पार्ट हो लेकिन इसके फसर्ट दर्शकों की भी कमी नहीं थी, ऐसे दर्शक जो जल्द से जल्द अब पहला पार्ट देखने की योजना बना रहे थे।

कहानी, अदाकारी और गाली-गोली को समझने के बाद इस फिल्म में एक और बेहतरीन चीज है। ऐसी चीज जो दर्शकों को गोली के अधाधुंध धमाकों के बाद भी सीट पर बैठे बैठे गर्दन मटकाने और शब्दों की समझ न होने के बाद भी गुनगुनाने का मौका देती है। वो चीज है इसका म्यूजिक ...
...सैंय्या काला रे...से लेकर फ्रस्टरेटियाओ नहीं मोडा तक स्नेहा खानवल्कर ने बॉलीवुड में गीतों का एक नया ट्रेंड शुरु किया है ...जहां हीरो-हीरोइन के पेड़ के आगे-पीछे घूमने या हाथ पैर हिलाकर अजीबो-गरीब डांस करने की जरूरत नहीं है। 
ये ऐसे गीत हैं जो सच में जिंदगी से जुड़ते हैं... असल जिंदगी में शायद ऐसे गीत सदियों से पत्नी और प्रेमिकाओं की जुबां पर रहे होंगे जिन्हें गुनगुना भर देना काफी है....

और फिर इस बार इस क्राइम थ्रिलर में जो एक औऱ सबसे अच्छी बात नजर आती है पहले पार्ट के मुकाबले  वो है इसमें इस्तेमाल किए गए ह्यूमर्स डॉयलॉग और हालात... जिनमें मर्डर के सीन में भी दर्शक हंसने पर मजबूर हो जाता है...

और आखिर में इस बात की चर्चा करना भी जरूरी है कि 180 रुपये खर्च करने के बाद दर्शक को मिलता क्या है..

1.
पहले पार्ट से उठे सवालों का जवाब
2.
झारखंड और बिहार में कोयला और लोहा माफिया की राजनीति का ब्योरा
3.
नायक की छवि से बिल्कुल भी मेल न खाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दकी जैसे अभिनेता में एक उभरते नायक को देखना
4.
तीसरी बात में बाकी के सारे कलाकारों को शामिल कर भी यही कहा जा सकता है कि इस फिल्म के जरिए ये बात फिर से साबित हुई कि शाहरुख,सलमान और कैटरीना के अलावा और भी चीजें हैं जो फिल्म चला सकती हैं...और जिन्हें देखना दर्शक पसंद भी करते हैं...
5.
हटके म्यूजिक का मजा 
6.
एक शिक्षा- सिर्फ सिनेमा देखने से ही नहीं (फिल्म में रामाधीर का एक डायलॉग भी इसी तरह है)  दूसरी औरत का लालच पालने से भी लोग चूतिया बनते रहे हैं इस देश में.....

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी के लड्डु खाकर पछता रही हूं मैं

इससे पहले भी जब कभी मैंने आजादी के दिन के बारे में कुछ लिखा है तो उन लड्डुओं का जिक्र जरूर किया है जो मैंने पूरे 12 साल हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर खाएं हैं। बेशक मैं कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं मगर एक सामान्य शख्स की तरह कुछ इंसानी कमजोरियां मेरे साथ भी  हैं। लड्डु उन्हीं कमजोरियों में से एक है।
इसलिए शायद पिछले इतने सालों में जब भी मैंने आजादी के सही मायने तलाशने और उनके बारे में संजीदगी से सोचने की कोशिश की तो लड्डु का स्वाद उस पर हावी हो गया। आप सोचेंगे मेरी जिंदगी के 12 साल बीते हुए तो  11 साल का वक्त निकल गया फिर.. 11 साल मैं क्या करती रही..दरअसल मेरी मां टीचर हैं तो मेरा स्कूल खत्म होने के बाद भी घर पर लड्डुओं का आना जारी रहा और इसलिए मुझ पर मेरी कमजोरी का हावी होना भी...
खैर
इस बार मैंने इस पर काबू किया है...बिल्कुल वैसे ही जैसे लड़कियां अपनी दूसरी तमाम कमजोरियों पर काबू करती रहती हैं न जाने कितनी बार....
लड्डु न खाने से पेट में जो स्पेस खाली छूटा है वहां एक सवाल घुड़मुड़-घुड़मुड़ कर रहा है। सवाल ये कि क्या ये दिन सच में इस तरह खुश होने का है कि स्कूलों में लड्डु बांटे जाएं। छतों पर पतंग उड़ाई जाए। फिल्म देखी जाए। बाहर घूमने जाया जाए। धानी और नांरगी रंग के कपड़े पहने जाएं। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया जाए। रंगारंग कार्यक्रम किए जाएं...?
आज इतने सालों बाद आजादी पर सोचते हुए मैंने अपनी एक कमजोरी को तो पीछे छोड़ दिया है मगर दूसरी फितरत मेरे साथ है और वो है मेरा स्वार्थ। स्वार्थ ये कि यहां मैं पूरे देश या देशवासियों की नहीं सिर्फ अपने लिए आजादी के मायनों की बात करुंगी। जानती हूं कि 65 साल बाद इन बातों का रोना रोकर कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन मैं इतने सालों तक खाए गए लड्डुओं का पश्चाताप करना चाहती हूं।
तो कहानी कुछ इस तरह है कि किताबों और किस्सों से इतर जब मैंने इस बार आजादी को समझा तो देखा कि
इस डिप्लोमेटिक आजादी की वजह से ही आज मेरे पास मेरे गांव का नाम नहीं है। वो गांव जहां शहर की आपाधापी से दूर जाकर कुछ दिन मैं सुस्ता सकूं। कोई जमीन नहीं है जिसके खेतों में मैं गर्मियों की छुट्टी में जाकर लहलहा सकूं। पुरखों की विरासत नहीं है। वो गली कूचे नहीं है जहां मेरे  दादा-परदादा रहे और पले-बढ़े। और जहां जाकर मैं उनके अस्तित्व को महसूस कर सकूं। उन पर किस्से कहानियां औऱ कविताएं लिख सकूं। विभाजन की वो टीस क्या होती है वो इस बार पहली बार मुझे महसूस हुई। शायद कहीं दबी तो पड़ी थी पर लड्डुओं ने उसे उबरने नहीं दिया।
कहां की हो तुम...ये सवाल न जाने कितने सालों से हर वक्त हर मोड़ पर पीछा करता रहता है। ... औऱ मैं कुछ ठीक-ठीक नहीं बता पाती। क्यों..क्योंकि हम मुलतानी हैं। मुलतान के रहने वाले मुलतानी.. इतना कह भर देने से ही मेरे दोस्त मुझे रिफ्यूजी कह कर चिढ़ाने लगते औऱ एक कुंठा मेरे अंदर दाखिल होती और फिर हवा के रास्ते बाहर निकल जाती। मुझे लगता रिफ्यूजी होना एक मजबूरी है कोई इतनी बुरी बात नहीं जिस पर संजीदा हुआ जाए।
लेकिन आज मैं बेहद संजीदा हूं क्योंकि इस रिफ्यूजी होने ने मुझसे मेरा इतिहास छीन लिया और इसलिए मैं अपने भूगोल को आज तक नहीं समझ पाई औऱ न ही समझा पाई....
अब आप ही बताइए कि मेरी मां का जन्म उत्तरप्रदेश के एक कस्बा नुमा शहर खुर्जा में हुआ उनका बचपन पंजाब के अबोहर में बीता। मेरे पिता जयपुर में पले-बढ़े। देहरादून में पढ़े-लिखे। हरिद्नार में बसे। और मेरा जन्म हुआ बुलंदशहर में और मैं बचपन से रही हूं गाजियाबाद में..............अगर आप मेरे इस भूगोल को समझ सकें हों तो मुझे भी एक शब्द में इस सवाल का जवाब दीजिएगा कि "मैं कहां की हूं..."सिवाए इस जवाब के जो मैंने अभी कुछ बरस पहले ही देना सीखा है.." हिंदुस्तान"
मगर फिलहाल मैं खुद ही एक कोशिश करती हूं अपने असल भूगोल को समझने की...
मुलतान, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, चेनाब नदी के किनारे।
मुलतान, जिसे सूफी और संतों का शहर कहा जाता है।
मुलतान, जो बाबा फरीद के नाम से मशहूर पंजाबी के बेहद शुरुआती दौर के कवि फरीदुद्दीन गंजशकर का जन्मस्थान है।
मुलतान, जो सिर्फ एशिया ही नहीं दुनिया के कुछ एक सबसे पुराने शहरों में से एक है।
औऱ
मुलतान, वही शहर जो आजादी के नाम पर अपनी पहचान लुटा बैठा। और मुलतानी कहे जाने वाले इसके बाशिंदे भारत का रुख कर गुमनाम हो गए क्योंकि मुस्लिम बहुल होने के कारण मुलतान को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया....।
ये ख्याल बहुत पाक नहीं लगते जो आज मन में यूं कुलाचे मार रहे हैं। क्योंकि इतना जानती हूं मैं कि उस वक्त ब्रिटिश रुल से आजाद होना ही सबसे बड़ी परिभाषा थी आजादी की..शायद रहनुमाओं  को ख्याल ही न आया हो किसी की पहचान और गांव घर के हमेशा के लिए दफन होने का।...मगर आज इन ख्यालों को रोकना नहीं चाहती मैं... बेशक नापाक ही सही लेकिन आज आजादी के इरादे मेरे मन में कुछ नेक नहीं लगते...आज मैं आजादी के इस दिन को बेदखल कर देना चाहती हूं अपनी जिंदगी से ...

मंगलवार, 7 जून 2011

ये नामुराद शहर

सपनो की अपनी एक दुनिया होती है लेकिन
मधय्वार्गिये लोगों की  दुनिया में सपनो की दुनिया का नाम कुछ  शहरों से जुडा है
जैसे लोग हनीमून मनाने के लिए स्विट्जर्लैंड  जाने का सपना देखते है
गर्मिया बिताने के लिए शिमला, मंसूरी या नैनीताल जाने का 
सपना देखते है
जीवन के आखिरी पड़ाव पर चारों धामों की यात्रा करने का सपना देखते है
और
युवा एक नई, बेहतर, शानदार, सितारों सरीखी जिंदगी जीने के लिए मुंबई जाने का सपना देखते हैं
क्या सपनो की दुनिया सिर्फ मुंबई है ....?
मैं मुंबई में रहने वाली ऐसी आँखों को भी जानती हूँ  जिनमे घर वापस लौटने का सपना पलता है
घर जो लखीम पुर खीरी में है , घर जो उज्जन में है , घर जो चित्रकूट में है...घर जो रांची में है
एक तरफ से देखें तो  घर वापसी का ये सपना गलत है, भावुकता है 
या कमजोरी है
दूसरी तरफ से देखे तो ये सपना प्यार है , लगाव है , खिंचाव है 
या जरुरत है
सपने सिर्फ वही तो नही होते न जो शाहरुख़ खान  बनने के लिए देखे जाते हैं..सपने वो भी होते हैं जो गरमी में बिना बिजली के सोती माँ के लिए इन्वेर्टर लगाने के लिए देखे जातें है...जो पापा की झुकती कमर को अपने हाथों के सहारा देने के लिए देखे जाते हैं  इसलिए बहुत से ऐसे सपने हैं जिनका शहर मुंबई नही है नॉएडा  है , गाज़ियाबाद है,  कलकाता है, बिहार भी है और ऐसे ही बहुत से नामुराद शहर जहाँ इन लोगों का घर बसता है
इस सब की जद्दोजहद में सिर्फ एक सपना होता हैं घर वापसी का


विस्थापन एक बेहद पीड़ादायक शब्द है और भविष्य बनाने के लिए घर बार को छोड़कर दूर किसी दूसरे शहर में जा बसना विस्थापन सरीखी ही पीड़ा देता है.. हाँ ये पीड़ा पथरीली नही होती मखमली होती है मगर पीड़ा तो होती है न


शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

पहले से ज्यादा जवां लगती है हर बार ये दिल्ली



लुधियाना में बैठकर दिल्ली की बात. बहुत नाइंसाफी है जनाब. हाँ है तो. लेकिन क्या करें कमबख्त दूरियों ने दिल में दिल्ली को और भी गहरे घुसा दिया है. चार दिन की छुट्टी के बाद लुधियाना लौटी हूँ तो दिल्ली में कई नए बने फ्लाई ओवर, पहले से कुछ ज्यादा फैशन परस्त हो गए लोगों और प्रेम के उन्माद में नियम तोड़ते( दरसल मेट्रो में अब महिलायों के लिए अलग से सीट अरक्षित कर दी गई है ऐसे में जो लोग जोड़े से मेट्रों में सफ़र करते है उनके लिए खासी परेशानी होती है जैसा की मुझे उस वक्त महसूस हुआ, मेट्रो कर्मचारी ने लड़के से वुमन कम्पार्टमेंट से जाने के लिए कहाँ तो वह उस कर्मचारी से ही झगड़ने लगा उसके साथ उसकी महिला मित्र ने अन्य महिला यात्रिओं के विरोध करने पर उनके साथ भी गलत तरह से बात की , मामला सिर्फ इतना था की वेह दोनों साथ खड़े होना चाहते थे और एक नियम उसमे बढा बन रहा था )  युवाओं के साथ पहले से कहीं ज्यादा जवां लगती दिल्ली कुछ भी सही लेकिन कुछ लिखने को मजबूर कर रही है. जैसे न जाने कितना कुछ समेटे है ये अपने गर्भ  में. जैसे किसी देवता के वरदान से मिले खजाने में धन ख़त्म ही नही होता उसी तरह दिल्ली के बारे में लिखने के लिए इतना कुछ है कि उसमे कुछ नया लिखने की शर्त कोई मायने ही नही रखती. अहसास तो शख्स बदलने के साथ खुद ब खुद नए हो ही  जाते है न . जैसे मेरा दिल्ली से नॉएडा जाने के लिए ३३ नंबर की बस पकड़ने और गंतव्य तक पहुँचने का अहसास आज भी मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देता है नही मुस्कान नही बड़ी सी हंसी. अगर आप इस बस से परिचित है और ये सब पढ़ रहे है तो अब तक मुस्कराहट आप के होटों को भी छु कर गुजर चुकी होगी अगर नही जानते तो माजरा ये है कि इस बस में सीट  तो दूर की बात है सांस लेने के लिए स्पेस मिलना भी मुश्किल होता है. अब शायद इस नंबर की बसों की संख्या बढा दी गई है तो कुछ सहूलियत हो लेकिन उस समय ३३ नंबर की बस में सफर करना और सुरक्षित लौटना जिंदगी की तमाम आपाधापियों के बीच जगह बना चुकी एक बड़ी चुनौती होतीं थी. मगर ये दिल्ली है और बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी बातें होती रहती है. इस शहर में आना भी बड़ी बात है रहना भी बड़ी बात है और अपनी जगह बनाना भी बड़ी बात है. और हाँ इस शहर का होकर भी इसे छोड़ जाना और फिर लौटकर अपना अस्तित्व बसाना ये सिर्फ बात ही बड़ी नही है ये काम भी बहुत बड़ा है ........आखिर बड़ा शहर है और हम छोटे लोग है वक़्त से भी और कद से भी ...हा हा हा. और फिर बड़ा बनने की न सही लेकिन बड़ा होने की ख्वाइशें अभी बाकी है ....

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

तन्हाई पर नहीं 'रजाई' पर लिखूं



 आज सोचा कि
जिंदगी की तन्हाई पर नही 
हर रात मुझे गुदगुदाता है जिसका अहसास 
अकेले से बिस्तर की उस रजाई पर लिखू 
उन बातों पर नहीं
जिनसे बेमानी हो गए थे रिश्ते 
उन मुलाकातों पर लिखूं 
जिन्होंने हर बार दे छोड़ी 
दोबारा मिलने की एक वजह
उन किस्सों को न फिर से आम करूँ आज 
जिन्होंने हर खास पल को बना दिया था खोखला
अब लिखूं वो कहानिया 
जिन्होंने राजा रानी की ख़त्म हो चुकी कहानी को भी 
आगे बढ़ाने का होंसला दिया 
करूँ कुछ ऐसा क़ि
चाँद शर्माए और शिद्दत भी शर्मिंदा हो जाए 
देश दुनिया से दूर किसी द्वीप पर '
कोई ताजमहल नहीं 
एक तस्वीर बन आऊं 
बस एक वो ही न जान पाए
उसकी बेकरारी का मुझ पर असर 
और सारी कायनात को खबर हो जाए
क्यूँ लिखूं मैं कुछ दिल पर
दिल की बातों पर 
या दिल के बारे में
आज जिक्र करना चाहिए मुझे धड़कन का 
जिसने दिल के हर बदलते रुख को दिया है 
आगे बढ़ने का रास्ता 
ख्वाइशों और खामोशियों पर जाने कितना कुछ लिखा गया है आज तलक 
आज सोचती हूँ लिखूं उन इशारों पर 
जिन्होंने हर बार किया था खबरदार 
दिल की बातों में बह जाने से
दिखाया था आईना कई बार 
मिलाया था 
मेरे ही अक्स में मेरी जिंदगी से जुड़े हर अफ़साने से
उसने नहीं लिखे थे कभी ख़त मुझे 
भेजे थे कुछ एस ऍम एस 
संक्षिप्त सन्देश सुविधा के तहत
आज रोक लूँ मैं किसी तरह खुद को 
न पढूं दोबारा से उन शब्दों को 
जिन्होंने हकीकत से रुसवा कर दिया मुझे 
आज याद करूँ उन इमारतों को
जहाँ बचपन में मैंने अनजाने ही लिख दीये थे 
दो नाम 
एक बेनाम प्रेम कहानी के
क्यों ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?
सही सोचा है न मैंने 
जिंदगी की तन्हाई पर नहीं 
अकेले से बिस्तर की रजाई पर लिखूं



बुधवार, 5 जनवरी 2011

मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा.. ?





कितने दिन हो गए इस शहर में आये...आज भी हर शाम अलसाई सी है और हर सुबह ललचाई सी है. हालाँकि  इस शहर की  आबोहवा में खुद को तबसे ही शामिल कर लिया था जब दिल्ली से आ रही बस की खिड़की से मैंने वो बोर्ड देखा था. .. वेलकम टू लुधियाना सिटी . ये कोई  टूरिस्ट स्पोट नही था न ही कोई हिल स्टेशन, ये मेरी जिंदगी का पहला destination है ,  जहाँ मैंने अपने सपनो की तरफ अपना पहला कदम रखा था. शहर को जाना.. देखा.. जहाँ तक देख सकती थी, फिर लिखा भी.. उन बातों को जो चुभी जिन्हें महसूस किया. लेकिन लगा और लगातार लग रहा है कि शहर ने मुझे नही अपनाया. एक अजीब सा अकेलापन है यहाँ. हालाँकि अकेलापन अजीब ही होता है लेकिन मैं ये कहूँगी  कि ये अकेलापन अजीबोगरीब है. अजीब इसलिए कि अकेलेपन को दूर करने के जो उपाय है उन पर अमल नही हो पा रहा और जिन उपायों को अपनाने का मन है उन्हें खरीदने की पहुँच अभी नही जुटा पाई हूँ.
सार संक्षेप ये है कि यहाँ मन लग रहा है रम नही रहा. कुछ लोग यहाँ आकर लुधियानवी हो गए और मैं अब तक वो वजह नही जुटा पाई जिससे लुधियाना के कुछ लम्हे बटोर पाऊ अपनी यादों के लिए. नाम के साथ सरनेम जोड़ना तो दूर की बात है.
लोग अच्छे नहीं है जब ये सोचती हूँ तो लगता है क़ि मैं खुद भी तो बहुत बुरी सी हो गई हूँ शायद. और फिर किसी ने कहा क़ि पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उसने छू कर नहीं देखा शायद इस शहर के साथ भी मेरी चाहतों का कुछ ऐसा ही सिलसिला  चल रहा है. मैं ही नहीं छू पाई हूँ यहाँ क़ि रूह को.. खैर आजकल तो धुंध भी बहुत है रूह को ढूँढ पाना फिर से एक मुश्किल भरा काम होगा. न जाने क्यों दिल चाहता है क़ि मैं उस रूह को न तलाश करू वो रूह खुद ब खुद मुझे दूंढ ले
 पहले से भी ज्यादा आलसी हो  गई हूँ यहाँ आकर ...............  

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...