सीले हुए से कुछ शब्द
सुखी हुई सी कुछ उम्मीदें
खालीपन से भरे इस दिल में
अब और बचा ही क्या है
सोचे बिन ही समझ लेने की भूल
और जाने बिन ही देख लेने का अपराध
सपनो के इस गुनाह की
बाकी सजा भी क्या है
जोप जुर्म किया था मैंने
वाही अज मुझ पर जुल्म ढा रहा है
बिन सबूत ...बिन गवाहों के
मुझे मुजरिम ठहरा रहा है
वो एक वजह थी जिससे
ख्वाबों का घरोंदा बना
ये आज जो हुआ एकाएक
दरार और फिर टूटन का एहसास
मैं नही जानती कि
इसकी वजह क्या है
5 टिप्पणियां:
मैं नही जानती कि
इसकी वजह क्या है
वजह चाहे कुछ भी हो टूटन और दरार को रोकना ही होगा.
बेहतरीन अभिव्यक्ति
bahut sundar rachna
SHEKHAR KUMAWAT
http://kavyawani.blogspot.com/
कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई
plz visit himani ji
http://yuvatimes.blogspot.com/2010/03/blog-post_30.html
शानदार प्रस्तुतीकरन,,,अच्छी रचना
विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com
एक टिप्पणी भेजें