सुख की तलाश में गई थी
दूर तलक मैं
जब
खाली हाथ
भारी मन
लौटना हुआ
तो देखा
दुःख अब भी वहीँ बैठा
मेरी राह तक रहा है
ज्यो का त्यों
जरा भी नही बदला
एक तरफ मेरी तलाश अधूरी थी
दूसरी तरफ
मुझसे जुदाई में
दुःख भी उदास सा दिखा मुझे
कुछ और तो न कर सकी
मैंने सुख की तलाश छोड़
दुःख में ही
सुकून को तराशना शुरू कर दिया
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4 टिप्पणियां:
दुःख में ही
सुकून को तराशना शुरू कर दिया
सार्थक पहल
वाकई सुख और दुख तो अन्योन्याश्रित है
सुन्दर रचना
सुख की तलाश में गई थी
दूर तलक मैं
जब
खाली हाथ
भारी मन
लौटना हुआ
तो देखा
दुःख अब भी वहीँ बैठा
मेरी राह तक रहा है
इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ........रचना....
kada parhar kiya hai
are pahle apni aadhi zindgi to jeelo phir sukh aur dukh mai fark karna
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