शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

सवाल

पहले मैं एक सवाल पर खड़ी थी 
अब फिजा भर में एक सवाल है 
सारी कायनात जो 
एक वक़्त 
जुट गई थी मिलन
की साजिश में 
आज उसने 
बिछोह का जाल रचा है 
और मैं पूछना चाहती हूँ 
क्यों 
क्यों 
और क्यों 
शायद हवाओं से लेकर 
उस एक कोने तक 
आज यही एक सवाल है
जहाँ हवा का एहसास भी नही पहुचता 
शायद 
बारिश की हर एक बूँद के साथ से लेकर
आज हर उस तालाब तक
यही सवाल है जो बरसों से सुखा पड़ा है 



रविवार, 21 नवंबर 2010

आज चाँद पूरा है फलक पर



चाँद 
हर दिन के साथ बढ़ता हुआ 
हर दिन के साथ घटता हुआ  
जिंदगी के उतार चढावो को 
अपनी चांदनी से सराबोर कर 
तीस दिनों में एक बार आकर ही 
महीने भर की हर 
टीस को सहला जाता हो जैसे
हर दाग के पीछे छिपी ख़ूबसूरती को 
दिखा जाता हो जैसे 
जैसे कहता हो कि
रात कि ख़ूबसूरती को पहचान 
ऐ राही 
ये रात ही जिंदगी के हर दिन का फलसफा है 


जाने क्यों चाँद देखते वक़्त शब्दों के अकाल आयर भावनाओ का एक आलोडन सा उमड़ पड़ा है 
एक एक शब्द कहना सागर से मोती चुनने सरीखा लग रहा है 
फिलहाल इतना ही 
उस चाँद के लिए जो आज फिर से पूरा है फलक पर 



शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

खोल दो (पुरस्कृत कविता)


खोल दो का आग्रह
फिर मेरे सामने  है
क्योंकि अब वो मुझे
अपनी जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं
मेरी उड़ान मंजूर है उन्हें
मगर वो उसकी दिशा बदलना चाहते है
मेरी आहटों का जिक्र भी भाता है उन्हें
और मेरे कदम बढ़ाने पर भी वो ऐतराज जताते है
उनकी मीठी सी बातों में एक तीखा सा पन है
छलकती सी आँखें छल का दर्पण है
सब कुछ छिपा कर जाने क्या बताना चाहते हैं
मेरे जवान दिल में बैठे बचपने को
वो हर रोज बहकाना चाहते है
मेरी बातों की तफसील से मतलब नहीं उन्हें
मेरे बदन की तासीर को आजमाना चाहते हैं
जो नाम हिमानी है
उसमे वो क्या आग जलाएंगे
बर्फ की इस नदी को कितना पिघलायेंगे
बारिश तो ठीक है मगर
बाढ़ का कहर क्या वो सह पाएंगे
सवाल उनके भी हैं सवाल मेरे भी
मैं विश्वास करने में यकीं रखती हूँ
उनके सवालों में है शक के घेरे भी
देखें अब हम
भाग खड़े होंगे वो
या इन हालातों को सुलझाएंगे???


गुरुवार, 11 नवंबर 2010

प्यार, दोस्ती, आकर्षण या अटैचमैंट


तैतीस करोड़ देवी देवता , चार धाम, चार पुराण, ग्यारह उपनिषद, और भी न जाने कितना कुछ. माने तो सब कुछ यही न माने तो कुछ भी नही.लेकिन मेरे ख्याल से ९० फिसद लोग मानते हैं और जो नही मानते वो कमसे कम इस ९० फिसद के शोर में काफी बातें जानते हैं. जानकारी हो भी क्यों न. धारावाहिक बन चुके हैं, फिल्मे बन चुकी है. किताबे तो है ही. एक नाम आप ने भी जरूर सुना होगा  दरअसल  नाम तो दो हैं लेकिन दोनों इस तरह जुड़े हैं की उन्हें एक ही कहा जाता हैं ..... राधाकृष्ण. मेरा मुद्दा भगवान् या उनके अस्तित्व पर चर्चा करने का नही था लेकिन कुछ दिन पहले बातों बातों में एक ऐसी बात निकाली की उसने बात करने के लिए उत्साहित किया ... राधा कृष्ण का नाम एक अमर प्रेम कहानी की पहचान है. दो लोग जो एक ही थे, जो मिलकर भी जुदा रहे. जो एक दुसरे के बिना अधूरे है जो अलग है लेकिन जिन्हें सब एक दुसरे के साथ से ही जानते हैं. आज के ज़माने में तो ऐसी हकीकत की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ..और अगर ये कल्पना कही सच होती नजर आये तो यक़ीनन इबादते गौर है ...लेकिन इबादत के इस रिश्ते पर  एक जवान दिल ने सवाल उठाया है. जाने क्यों मुझे ये अजीब भी लगा, नागवार भी फिरभी लग रहा है की इस समय के किसी जवान दिल का ये सबसे जमीनी सवाल है ..सवाल था 
राधा कृष्ण का ये रिश्ता 
प्यार था 
???????
दोस्ती थी 
????????
आकर्षण था
या फिर
????????
अटैचमैंट
????????

प्रश्न चिन्ह लग चूका है ?
जवाब आप भी दे सकते है और आप भी यानि वो भी जो मानते है और वो भी जो सिर्फ जानते है 
लेकिन  जवाब दीजियेगा जरूर. बहुत सारे जवान दिलों का सवाल है ........जवाब के इन्तजार में ....हिमानी
 

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

एक चुप सौ सुख

एक चुप सौ सुख
मगर इतना आसान भी नही है 
यूँ चुप रह जाना 
कितना भी हो 
थोडा या ज्यादा
लेकिन , मुश्किल तो है ही 
शब्दों को पी जाना 
होंटों को सी जाना 
कशमकश है कि
कह दूं तो 
शायद 
रातें खफा हो जाएँगी
ख़ामोशी से भी वैसी दोस्ती नही है मेरी
रहूंगी खामोश गर तो 
बातें जुदा हो जाएँगी
कैसे चुप रहूँ
इस मौन को तोड़ने के शोर के बीच
कैसे रहूँ स्तब्ध 
झंझावातों के इस दौर के बीच
मैं बोलती हूँ तो 
बोलने को वो मेरा कसूर बताता है
चुप रहने पर
चुप चाप ही जाने कौन
चुप रहने की सजा सुना जाता है
मैं अपनी जनम  कुंडली में 
खुद जो बना रही हूँ जिंदगी के निशाँ 
तो जमाना जिरह पाले है मुझसे 
मेरी हर बात ही पर एतराज जताता है 

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

परख

परख 
पलक झपकते ही जो बादल देते हैं कारवां
उनकी परख
प्रेम नाम के पर्यायवाची
भरे पड़े हैं जिनके शब्दकोष में
जान, जानम, जानेमन और  जिंदगी
जो कहते हैं अपनी हर महबूबा को 
उनकी परख
हर रात होना चाहते हैं 
जो हम बिस्तर 
चोरी छिपे
हर उस लड़की के साथ
जिसने मान लिया हैं
उनके शब्दों को पर ब्रह्म
या फिर वो 
जिसे नही है कोई परवाह लोकलाज की
जो खुद भी मिटाना चाहती हैं महज जिस्मानी भूख
इस जगमगाहट के जरिये
उनकी परख
रोजी रोटी और मकान के बाद
या इन तीनो से पहले एक और 
मूलभूत जरुरत है हमारे बीच
देह
देह की भूख
देह की मुक्ति
देह का समर्पण
जो देते हैं इस तरह के प्रवचन
उनकी परख
जो स्त्री को करना चाहते है स्वतंत्र समाज की  बेड़ियों से
और वही 
जो नही देख सकते 
अपनी बहिन, बेटी या माँ को 
किसी पुरुष के ख्वाब ख्याल
संजोते हुए भी
उनकी परख
जस्बातों के दरम्यान पनपती
जरुरत से प्रेम को बचाने के लिए
शायद  परख जरुरी है 


शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

मासूम सी मुश्किलें

कदम दर कदम मेरे साथ रहती है
कुछ मासूम सी मुश्किलें
जैसे जानती हो
वो मुझे हमेशा से
मालूम चल जाता हो उन्हें मेरी हर आहट  का पता
मेरे हर मकसद की वजह

सुकून के एक छोटे से पल में
भी इनके आने का ही शोर रहता है
हर ख़ुशी से हो जाती हूँ मैं अनमनी   सी
मुश्किलों की उस सनसनी में 
फिर कौन साथ देता है 

अपना पराया तो महज दो शब्द हैं विरोधाभास के 
आखिर तो हर आदमी में एक आदमी रहता है
प्यार, वफा, नफरत, धोखा 
कहने को तो किस्से हजारों है 
मगर सब एक इन्तजार में हैं
चुप है यहाँ
की देखे कौन पहले कहता है 

जिक्र हो उठा कहीं उनकी कहानी का पहले तो फिर होगा ये सितम
की शब्द ढाएँगे जुलम
कहेंगे देखो भई 
उस शराफत के पैमाने में ही तो नशे का सारा चिलम रहता है 

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...