उस शक्स को मोह है मंजिल का
और मंजिल
मोहताज है रास्तों की
रास्तों ने अपनी अलग ही राहें निकल ली है
और वो शक्स
ख्वाबों का बोझ लिए खड़ा है
बेहद दूर कहीं
रास्तें बेदर्द है है
और मंजिल बेक़सूर
न वक़्त ही मरहम है उसका
न उम्मीद ही दवा
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
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2 टिप्पणियां:
बेहतरीन भाव!!
bhaav gehre hai............
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