रविवार, 25 नवंबर 2012

पहली पेज थ्री पार्टी

मधुर भंडारकर की फिल्म पेज थ्री कई दफा देखी थी। तब मालूम नहीं था कि पेज थ्री का मतलब क्या होता है। अगर मतलब जो होता है वो है भी तो फिल्म का नाम पेज थ्री क्यों रखा गया, ये समझने में भी वक्त लगा। बहरहाल अब कुछ एक साल बीतने के बाद पेज थ्री और मधुर की फिल्म के नाम दोनों की गुत्थी सुलझ चुकी थी। बाकी बचा था तो पेज थ्री पार्टी को लाइव देखने का अवसर। सो ये भी बीते दिनों मिला। मौका था जानी-मानी पत्रकार और लेखिका तवलीन सिंह की नई किताब दरबार की पब्लिशिंग के जश्न का। दोपहर भर हमने व्यापार मेले में दो मुल्कों के बीच के प्यार को ढूंढा और शाम को पहुंचे नई दिल्ली के जाकिर हुसैन मार्ग पर बने आलीशान फाइव स्टार होटल ओबरॉय में। दिन भर धूल मिट्टी में भाग-दौड़ के बाद खस्ता हालत को देखकर एक बार को मन ने धिक्कारा भी कि पांच सितारा होटल में इस हालत में जाना ठीक नहीं। फिर सेल्फ रेस्पेक्ट ओर सादा जीवन उच्च विचार का पाठ याद आया और जैसे हैं वैसे ही होटल में दाखिल होने की हिम्मत बंधी। गेट पर पहुंचे तो ये लंबी-लंबी गाड़ियों के बीच अपनी 11 नंबर( पैदल) की सवारी के साथ होटल में एंट्री लेते वक्त भी काफी लज्जा महसूस हुई, लेकिन स्वाभिमान ने उस लज्जा को हावी नहीं होने दिया और हम पैदल ही अंदर दाखिल हो गए। गार्ड से नीलगिरी जाने का रास्ता पूछा और आगे बढ़ चले। नीलगिरी, होटल ओबरॉय में एक पार्टी हॉल का नाम है। उस तक पहुंचने में रास्ते में लगे चमकते हुए बोर्ड्स ने भी मदद की। जैसे नीलगिरी में पहुंचे तो इस देसी नाम को सिर्फ खुद तवलीन सिंह ही निभाती दिखीं, जिन्होंने सिल्क की नीली साड़ी पहनी हुई थी और हाथ में शराब का गिलास पकड़े हुए भी बेहद शालीनता से आने वाले लोगों से बात कर रही थी। य़े मेरे लिए उनसे मिलने का पहला मौका था। इतने सारे अंग्रेजी लोग और विदेशी संस्कृति के माहौल के बीच भी अपने भारतीयपन को बचाए हुए वह देसी और विदेशी का एक बेहतरीन फ्यूजन प्रस्तुत कर रहीं थी। दाखिल होने के बाद पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या किया जाए। यहां आमतौर पर होने वाले किताबों के विमोचन से एकदम अलग माहौल था। तवलीन सिहं ने खुद भी बातचीत के दौरान बताया कि यहां किताब का रिलीज नहीं है बल्कि जश्न है। फिर जश्न का दूसरा नाम है जाम। तो नीलगिरी में हर तरफ लाल और पीले पानी वाले जाम खूब दिखाई भी दे रहे थे। कई अजीबो-गरीब चेहरों के बीच शशि थरूर और फारुख शेख जैसे कुछ राजनीतिज्ञ चेहरे भी नजर आए तो रजत शर्मा जैसे मीडिया के कुछ ब़ड़े नाम भी। इन बड़े लोगों और बड़ी-बड़ी हस्तियों के बीच अचानक पहुंचे हम ( मैं और मेरा सहकर्मी) बेहद अजीब लग रहे थे। ऐसा हमें खुद को भी लग रहा था और कोई शक नही ंकि दूसरे भी हमारे बारे में ऐसा ही सोच रहे थे। हमारे मन में चलने वाले इतने सारे विचारों और भावों के बीच सिर्फ एक ही बात अच्छी हो रही थी कि हमें तवलीन जी से उनकी किताब के बारे में बात करने का पूरा मौका मिल रहा था और इस तरह कम से कम हमारा वहां आने का मकसद पूरा हो रहा था। हां एक मकसद जरूर अधूरा रह गया था। इसके अधूरा रह जाने की वजह भी यही थी कि वह मकसद वास्तव में मकसद बन ही नहीं पाया था और वह था पेज थ्री पार्टियों के असल अहसास को महसूस करने का। हम वहां से बिना पानी की एक बूंद पीए वापस लौट आए। ..... टू भी कंटीन्यूड टिल द सेकेंड पेज थ्री पार्टी

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

शिक्षा फॉर लाइफ या सिर्फ सबक जिंदगी भर के लिए

लस्ट फॉर लाइफ
महान चित्रकार विंसेंट वॉन गॉग के जीवन पर आधारित विश्व प्रसिद्ध उपन्यास
लेखक-इरविंग स्टोन



इस किताब के आखिरी पन्नों को पलटते हुए मैं मन ही मन में कुछ फैसले कर चुकी थी। 

पहला और हास्यास्पद फैसला ये कि अब मैं किताबें नहीं पढ़ूंगी..।
दूसरा ये कि किसी भी बात की गहराई में जाने की कोशिश नहीं करुंगी।
तीसरा ये कि बार-बार अपने लिखे को सुधारने और एक अद्भुत, अकल्पनीय या उस उपमा वाला एक शब्द, जिसे अंग्रेजी में मास्टरपीस कहते हैं जैसी कोई कविता या कहानी लिखने की कोशिश भी नहीं करुंगी।

मुझे नहीं पता कि मैं इन फैसलों पर कितना अमल कर पाऊंगी। क्योंकि जो तीन बातें मैंने ऊपर लिखी हैं, मेरी 75 फीसद जिंदगी उन्हीं बातों के इर्द-गिर्द घूमती है। 463 पन्नों वाली इस किताब को मैंने घर से दफ्तर आने-जाने के रास्ते का इस्तेमाल करते हुए पढ़ा। लगभग एक महीने का समय लगा। एक दोस्त की सलाह मानकर मैंने ये किताब पढ़नी शुरू की थी। किताब पूरी पढ़ने के बाद समझ नहीं आ रहा कि ये सलाह मानना सही था या गलत। मेरे सामने दो विकल्प हैं एक है इस किताब से मिलने वाली शिक्षा और दूसरा इसे पढ़ने के बाद मेरे स्वार्थी और डरपोक मन को मिला एक सबक। किसे चुनूं ये दुविधा है। सुविधा ये है कि वक्त अपने विकल्प खुद चुन लेता है इसलिए फैसला उसी पर छोड़ दूं। बहरहाल एक नजर शिक्षा और सबक दोनों पर....


शिक्षा 
एक सच्चे कलाकार को अपनी कला के लिए पूरी जिंदगी दांव पर लगा देनी होती है। जैसा कि विंसेंट वॉन गॉग ने अपनी पूरी जिंदगी अपने भीतर से उस अद्भुत, अकल्पनीय और असल कला को बाहर लाने के लिए देश-देश भटकते हुए बिता दी। ऐसे हालातों का सामना किया जब उनके पास भूखमरी से मर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। ऐसा वक्त भी जब उनके हर एक रिश्तेदार ने उन्हें सिवाय तानों के कुछ नहीं दिया। ऐसा वक्त जब हर देखने वाले ने उन्हें पागल कहकर मुंह मोड़ लिया। 

सबक
अपनी कला के बारे में गंभीर होकर सोचना इंसान को पागल कर देता है और उसे पूरी जिंदगी कुछ नहीं मिलता। मरने के बाद अगर दुनिया किसी को महान बना दे तो फिर...। 


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इस किताब में लिखी कुछ बातें आपके लिए चुनकर यहां लिख रही हूं....“आप केवल साहस और शक्ति जुटा सकते हैं, वह करने के लिए, जो आप सही समझते हैं। यह गलत भी हो सकता है। ले‌क‌िन आप उसे कर चुके होंगे और यही महत्वपूर्ण है। हमें अपनी बुद्धि के श्रेष्ठ चुनाव के आधार पर काम करते हुए उसके अंतिम मूल्य का फैसला ईश्वर पर छोड़ देना चा‌हिए।“

“प्रेम जीवन का नमक था। जीवन में स्वाद लाने के ‌लिरए हर एक को उसकी जरूरत थी।““रोटी के लायक न बन पाना निस्संदेह एक अपराध है, क्योंकि  हर ईमानदार आदमी अपनी रोटी के लायक होता है। लेकिन उसे न कमा पाना उसके लायक होने के बावजूद एक बड़ा अपराध होता है, बहुत बड़ा।“

“आदमी का व्यवहार काफी कुछ ड्राइंग की तरह होता है। आंख का कोण बदलते ही सारा दृश्य बदल जाता है। यह बदलाव विषय पर नहीं, ब‌ल्क‌ि देखने वाले पर निर्भर करता है। “

“मृत्यु कितनी साधारण चीज होती है, शरद में गिरती हुई एक पत्ती जैसी।“
‌“जिंदगी एक अनंत खाली और हतोत्सा‌हित कर देने वाली निगाह से हमें घूरती रहती है, जैसे यह कैनवस करता है। ““अक्सर यातना ही किसी भी कलाकार की रचना को सबसे मुखर बनाती है।“

“आदमी प्रकृति का पीछा करने की हताश मशक्कत से शुरू करता है और सब कुछ गलत होता जाता है। अंततः आदमी अपने रंग खोज लेता है और सहमत होकर प्रकृति उसके पीछे आने लगती है।“


“मानवीय दिमाग दो तरह की बातें सोचता है छाया और रोशनी, मीठा और खट्टा,अच्छा और बुरा, प्रकृति में इन दोनों चीजों का असितत्व नहीं होता। दुनिया में न अच्छाई है न बुराई केवल होना है और करना। जब एक क्रिया का हम वर्णन करते हैं तो हम जीवन का वर्णन कर रहे होते हैं। जब हम उस क्रिया को कोई नाम दे देते हैं जैसे अश्लीलता तो हम व्यक्तिगत द्वेष की तरफ बढ़ रहे होते हैं।“

“आदमी या तो पेंटिंग कर सकता है या पेंटिंग के बारे में बात। वह इकट्ठे
दोनों काम नहीं कर सकता।“



“साधारण होना कितना मुश्किल है।“

“मेरा काम...मैंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाई उसके लिए...और मेरा दिमाग करीब-करीब भटक चुका है।“


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- ईश्ववर के बारे में

 “मैं ईश्वर के बारे में बहुत सोचा करता हूं। वह जैसे बीतते सालों के साथ फीका पड़ता गया है। मुझे लगता है कि हमें इस दुनिया में ईश्वर के बारे में कोई फैसला नहीं करना चाहिए। यह ऐसा चित्र था, जिसे वह बना नहीं पाया। अगर आप कलाकार को पसंद करते हैं तो उसके खराब चित्र के लिए क्या कर सकते हैं। आप आलोचना नहीं करते, अपनी जुबान रोक लेते हैं। पर आपको बेहतर चीज की मांग करने का अधिकार है। हमें फैसला करने से पहले उसकी बनी बाकी चीजों को भी देखना चाहिए। दुनिया को शायद एक बुरे दिन बनाया गया। जब ईश्वर को सारी चीजें साफ नजर नहीं आ रही थी।“


-वेश्याओं के बारे में 


“मैं किसानों के चित्र बनाता हूं। इन चित्रों को देखकर मुझे लग रहा है
जैसे ये भी किसान हैं। देह की खेती करने वाली, धरती और देह एक ही तत्व के दो अलग-अलग रूप हैं, है ना और ये औरते मानव देह पर काम करती हैं, जिस पर काम किया जाना चाहिए ताकि उससे जीवन पैदा हो सके।“


- चित्रकारों के लिए

 “चित्रकारों को सीखना चाहिए कि किसी चीज को नहीं बल्कि उसकी मूल प्रकृति को पकड़ने का प्रयास करें। यदि आप एक घोड़े का चित्र बना रहे हैं तो सड़क पर देखा गया कोई घोड़ा नहीं होना चाहिए उसमें। उसकी तसवीर तो कैमरे से भी खींची जा सकती है। हमें उससे आगे जाना चाहिए। घोड़े का चित्र बनाते समय मौश्ये हमें जो चीज पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए वह है प्लेटो का घोड़ापन यानी घोड़े की बाहरी आत्मा। जब हम एक आदमी का चित्र बनाते हैं वह किसी आदमी का चित्र नहीं होना चाहिए जिसकी नाक पर मस्सा है। वह सारे आदमियों
की आत्मा और उनकी मूल प्रकृति का चित्र होना चाहिए।“

-कला के बारे में

 “कला नैतिकता से परे है, जैसे जीवन। मेरे हिसाब से किताबें या चित्र
अश्लील नहीं होते केवल घटिया किताबें और चित्र हो सकते हैं।“



-‌कलाकार की न‌िजी ज‌िंदगी के बारे में

”किसी भी समीक्षक को कलाकार की निजी जिंदगी उघाड़ने का कोई अधिकार नहीं, अगर उसका काम उत्कृष्ट है। कलाकार का काम और उसकी ‌न‌िजी ‌ज‌िंदगी जन्म देती स्त्री और बच्चे की तरह होते हैं। आप बच्चे को देख सकते हैं, पर स्त्री की कमीज उघाड़कर यह तो नहीं देख सकते कि उसमें खून लगा है या नहीं। यह ‌क‌ितना असंवेदनशील होगा।“

- विंसेंट वॉन गॉग, अपनी पेंटिंग के बारे में

”मेरे चित्र का पेट आंतों से भरा हुआ है। इसे देखते ही आप समझ सकते हैं ‌कि  इसके भीतर से टनों खाना गुजर चुका है।“



-विंसेंट वॉन गॉग कला की कीमत के बारे में


“क्या यह मतलब होता है कलाकार होने का-बेचना? मैं समझता था इसका मतलब ब‌िना कुछ पाए लगातार खोजने रहना होता है। मुझे पता है जब मैं कहता हूं मैं कलाकार हूं तो मैं कह रहा होता हूं किे मैं खोज रहा हूं। मैं पूरे ‌द‌िल से मेहनत कर रहा हूं।“


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“यह जरूरी है ‌कि एक स्त्री आपके ऊपर बयार की तरह बहे ता‌कि आप पुरुष बन सकें। “

‌-मिशेले की एक लाइन


“ऐसा कैसे ‌क‌िया जा सकता है कित इस धरती पर कोई भी स्त्री अकेली रहती हो।“
- मिशेले का एक वाक्य

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

भगवान भी कहेंगे 'ओह माई गॉड'


भगवान से मेरा पहला परिचय तब हुआ था, जब बचपन में मां और नानी.. मुझे उनसे भाई मांगने के लिए कहती थी। शायद यही कारण भी था क‌ि भगवान के बारे में मेरी पहली समझ यही बनी थी कि जो भी चीज आप चाहों, उनसे मांगने पर मिल जाती है। इसके लिए आपको पूजा करनी होती है। कुछ धार्मिक किताबें पढ़नी होती हैं। व्रत रखने होते हैं। मंदिर जाना होता है। प्रसाद चढ़ाना होता है। ज्यादा बड़ी चीज हो तो वैष्णों देवी या गुरुद्वारे की यात्रा भी करनी होती है।अब के मुकाबले देखें तो बचपन जिंदगी का बहुत संतुष्ट पड़ाव था। लेकिन बचपन में जाकर याद करुं... तो उस वक्त भी बहुत सारी चीजें थी, जो चाहिए थी। जिन्हें पाने का रास्ता उन प्रार्थनाओं में दिखता था, जो मैं मां और नानी को सुबह शाम करते देखती थी। और यहीं से मेरी जिंदगी में शुरू हुई भगवान और मेरी कहानी। सबसे पहले शेरावाली माता के रूप में मुझे भगवान की छवि मिली। उनसे मैंने क्लास में फ्सर्ट आने से लेकर मां की सरकारी नौकरी लग जाने तक काफी सारी चीजें मांगी। पापा का एक्सीडेंट हुआ तो वो जल्दी ठीक हो जाएं, ये भी मांगा। मंदिर भी गई। व्रत भी रखे। प्रसाद भी चढ़ाया। वो सब कुछ किया, जो करते हुए देखा और सुना। कुछ चीजें भगवान ने मान लीं,  कुछ नहीं मानी ...। जैसे मैं क्लास में फ्सर्ट आई... पापा ठीक हुए... लेकिन मां की सरकारी नौकरी नहीं लगी। जिदंगी यूं ही चलती रही। कॉलेज में एडमिशन के बाद बाहर का खाना खाने और रुटीन बदलने की वजह से तबियत खराब रहने लगी तो मैं भगवान शिव की भक्ति करने लगी। कहा जाता है कि भगवान  शिव रोग व्याधि को दूर करने वाले हैं। जैसे-जैसे कर्म और फल की समझ आई तो... मुझे कृष्ण भगवान से प्रीति हुई। साईं बाबा और शनि देव पर भी श्रद्धा रही। कई बार जब हालातों ने मुझे कमजोर किया, हरा दिया, तोड़ दिया तो मैंने उन मूर्तियों से लड़ाई भी की, जिन्हें मैं भगवान मानती हूं। खुद को नास्तिक बनाने के लिए कविता भी लिखी और पूजा पाठ छोड़कर ऐसा करने की कोशिश भी की। कई सारे तर्क और वितर्कों में भगवान और अपनी भक्ति को रखकर तोला भी। मगर हमेशा ये विषय ऐसा रहा, जिसमें उलझकर और डरकर मैंने बीच में ही छोड़ दिया। पिछले कुछ दिनों से गीता और सुंदरकांड पढ़ रही हूं तो कुछ और बातें समझ आईं। सुंदरकांड में एक लाइन आती है "भय बिनु प्रीति न होई"। इसका मतलब है कि डर के बिना प्यार भी नहीं होता। इस लाइन को पढ़कर ये नतीजा निकालना काफी आसान हुआ कि भगवान से भी शायद हम डरते हैं, इसलिए उनसे प्यार या प्यार का दिखावा करते हैं।कुल मिलाकर अब तक मैंने कई बार खुद को तर्क के आधार पर भगवान को मानने या न मानने के लिए मजबूर किया, लेकिन शायद आस्था और अंधविश्वास दोनों ही तर्कों से परे होते हैं। जैसे मां-बाप पर विश्वास करने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं होती, वैसे ही भगवान को मानने के लिए भी उन्हें देखने या परखने की जरूरत नहीं होती। फिर अगर ज्यादा पढ़-लिख लेने पर ऐसी जरूरत महसूस हो भी जाए तो आखिर में नतीजा यही निकलता है कि कहीं कोई है, जो हमारे साथ है, हमसें बातें करता है, हमें समझता है, हमें अहसास दिलाता है कि जो हुआ उसमें कुछ न कुछ अच्छा था। जो देर से मिला, उसके देर होने में ही हमारी भलाई थी। जो नहीं मिला वो हमारा था ही नहीं।..हाल ही में अक्षय कुमार और परेश रावल के प्रोडक्शन और उमेश शुक्ला के निर्देशन में बनी फिल्म ओह माई गॉड की कहानी भी कुछ ऐसे ही तर्कों से शुरू होकर उस शक्ति की सत्ता को स्थापित करते हुए खत्म हो जाती है, ‌ज‌िसे लोग ईश्वर, अल्लाह और गॉड के नाम से जानते हैं। ये फिल्म एक गुजराती नाटक "कांजी वर्सेस कांजी" पर आधारित है। इसके अलावा इसे एक ऑस्ट्रेलियन फिल्म "मैन हू सूड गॉड" की नकल भी बताया जा रहा है। कहानी की प्रेरणा कुछ भी हो,  इस विषय को ऐसे संकीर्ण समाज में सामने लाना ही एक काबिले तारीफ कोशिश है। फिर रोमांस, फैमिली ड्रामा और स्टंट के तड़के से कुछ अलग देखने के लिहाज से भी बॉलीवुड कलेक्शन में ये फिल्म एक खास जगह बना चुकी है। हालांकि रिलीज के काफी दिन बाद मुझे इस फिल्म को देखने का मौका मिला, इसलिए अब ज्यादा कुछ कहना मायने नहीं रखता। पर कुछ बातों का जिक्र करने के लिए समय से पहले या समय के बाद से ज्यादा जरूरी ये होता है कि समय मिलते ही उन पर बात कर ली जाए। ‌एक्ट ऑफ गॉड नाम के जिस कानून को आधार बनाकर फिल्म का ताना-बाना बुना गया है वो कई लोगों के ल‌िए एक नई चीज है। ये देखना भी हैरानी और दिलचस्पी भरा है क‌ि कई लोगों की पॉलिसी का पैसा भगवान के नाम पर बने एक कानून की वजह से अटका पड़ा है। परेश रावल की अदाकारी को किसी भी उपमा की जरूरत नहीं है। लेकिन जहां तक पटकथा की बात है तो वह काफी बेहतरीन हैं क्योंकि धर्म और भक्ति जैसे मुद्दों पर बेजोड़ तर्क सामने लाना भी आसान काम नहीं है। गंगाजल की चिट वाली बोतल में टंकी का पानी भरकर बेचना, किसी भी सामान्य सी मूर्ति को धरती फटने पर निकली हुई बताना, मन्नत के नाम पर अपने बाल चढ़ाना, शिवलिंग पर हर सोमवार को लोटा भर-भर दूध चढ़ाना और उस दूध के नाले के रास्ते गटर में चले जाना ... ये कुछ ऐसी सच्चाइयां हैं, जिनसे हमारा सामना हर रोज होता है, लेकिन हम में से हर कोई इसे नजरअंदाज कर देता है। आम लोगों से लेकर तमाम बुद्धिजीवी और मीडिया तक इस पर स्पेशल रिपोर्ट तैयार कर सनसनी फैलाते हैं। बेशक ये सारी बातें कई बार पहले भी सामने आ चुकी हैं, लेकिन भगवान के खिलाफ मुकदमा दायर करने के दौरान जिस तरह फिल्म में ये सच्चाई सामने आई है उसे देखना ज्यादा चोट करने वाला है। साथ ही भगवान पर कॉपी राइट समझने वाले लोगों को कटघरे में खड़ा करना और आज के समय में लोगों पर चढ़ रहा बाबा और साध्वियों के नाम का बुखार उतारने के ल‌िए भी इस तरह की फिल्में जरूरी हैं। ओमपूरी का छोटा सा रोल भी भगवान को नोटिस भेजने के ल‌िए काफी अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा नेगेटिव शेड में होते हुए भी मिथुन चक्रवर्ती फिल्म के आखिर में एक डॉयलॉग से ही अपनी मौजूदगी की अहमियत को साबित कर देते हैं "ये आस्था श्रद्धा अफीम के नशे की तरह है कांजी। एक बार लत लग गई तो आसानी से नहीं छूटती। ये जो लोग देख रहे हो न these are not god loving people they are god fearing people। आज नहीं तो कल कहीं ये फिर से उन्हीं आश्रमों में न दिख जाएं। निर्भय भव:।
फिर पूरी फिल्म में भगवान का पक्ष सामने रखने के ल‌िए अक्षय कुमार भी अपनी भूमिका पर खरे उतरते हैं। इस फिल्म की सबसे ‌मजेदार बात जो सामने आती है, वह यह है कि भगवान खुद भी अपने दुष्प्रचार से दुखी हैं। अगर वह फिल्म में दिखाई गई कहानी की तरह खुद दुनिया में आ सकते तो अपने मन की बात कुछ इन्हीं शब्दों में कहते-
"मैं तो नहीं हूं इंसानों में
बिकता हूं इन दुकानों में
दुनिया बनाई मैंने हाथों से
मिट्टी से नहीं जज्बातों से
फिर रहा हूं ढूंढता 
मेरे निशां है कहां"

इसके अलावा एक शिक्षा जो इस फिल्म की कहानी से मुझे मिलती है और हम सबको मिलनी चाहिए... वो ये है कि किसी भी धर्म के प्रति अंधभक्ति शुरू करने, उसके नाम पर कर्मकांड करने और नियम बनाने से पहले अगर हम सिर्फ एक बार उस धर्म से जुड़े मुख्य ग्रंथ को पढ़ लें तो कई वहम और अंधविश्वास तो पहले ही दूर हो जाएंगे। हिंदू धर्म हो या इस्लाम इन्हें मानने वाले आधे से ज्यादा लोगों ने न तो गीता पढ़ी होगी न ही कुरान। फिर भी ये लोग धर्म के नाम पर अपने परसेप्सेशन के आधार पर कुछ बातों और नियमों को आधार बनाकर युद्ध जैसे हालात पैदा कर देते हैं।


और आखिर में 

गोंविदा आला रे में सोनाक्षी और प्रभुदेवा के लाजवाब डांस को भी नहीं भुलाया जा सकता है।

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

न जाने हम क्या कर रहे हैं



हम लिख रहे हैं
अतीत के अपराध
और वर्तमान के राग
कि
भविष्य बेहतर हो सके

हम दिख रहे हैं
इतिहास के भगत सिंह जैसे
21वीं सदी में क्रांति की मशाल लिए
कि
आने वाली सदियां हमें भी याद करें

हम खोल रहे हैं जुबां
चुप रहने की
त्रासदियों के बीच भी
कि
सच गूंगा न होने पाए
और झूठ भी सुन सके
उसकी गूंज को

हम शामिल हैं
हर उस विचार के साथ
कि
जिससे समाज को
समानता की सूरत मिल सके

हमने कुछ रास्ते अख्तियार किए हैं
दिखाने के लिए दूसरों को रास्ता
कि
हम गर मजबूर हो गए
कहीं अपनी अपनी मजदूरी के चलते तो
वो दूसरे उन रास्तों पर चल सकें।

मगर अब हमें बांध लेनी चाहिए
अपनी अंधी उम्मीदों की ये पोटली
कि
किसी दूसरे के कंधों को ये बोझ न सहना पड़े। 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

प्रेम प्रेम सब करें प्रेम करे न कोय....बर्फी की खामोशी के सुर


'वास्त‌व‌िक प्रेम मौन होता है'। अज्ञेय के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ में ये लाइन पढ़ने के बाद मैं फूली नहीं समाई थी। आत्ममुग्ध नाम का अगर कोई शब्द होता है, तो मैं आत्ममुग्ध हो गई थी। मुझे लगा कि मैंने भी वास्तविक प्रेम किया है। मुझे ऐसा इसलिए लगा था, क्योंकि तीसरी क्लास में मुझे अपनी क्लास का एक लड़का बहुत अच्छा लगता था। जिसे मैंने ये बात कभी बताई ही नहीं। अब तक नहीं बताई, कई दफा सामने होने के बाद भी नहीं बताई। मैं चुप रही और एक बड़े लेखक के मशहूर उपन्यास में ये बात पढ़ने के बाद वो अच्छा लगना..... मुझे प्रेम की तरह लगा और अपनी ये चुप्पी.... उसी महान मौन की तरह, जो प्रेम के वास्तविक होने का सबूत होता है। हालां‌क‌ि उपन्यास पढ़ने के बाद से लेकर अब तक उस फूले न समाने वाली फील‌िंग में कई सारे छेद हो चुके थे,  क्योंक‌ि जब क‌िताबों से बाहर की दुनिया देखी तो हर तरफ प्रेम-प्रेम का शोर ही दिखाई दिया, मौन कहीं नहीं। लेकिन मेरे मौन की इस कहानी में एक क्लाइमेक्स आया, हाल ही में......अभी एक दिन पहले। मुझे अचानक महसूस हुआ क‌ि वो सारे छेद भरने लगे हैं (माफ करना यहां मैं ब‌िंब बनाते हुए शायद अत‌िवादी हो रही हूं) जानते हैं ऐसा कब और क्यों हुआ.......................ये तब हुआ जब मैंने बर्फी देखी। बर्फी ......यानी अनुराग बासु की हाल ही में आई एक फ‌िल्म ज‌िसे ‌‌‌‌ प्रियंका चोपड़ा और रणबीर कपूर ने अपने शानदार नहीं जानदार अभ‌िनय से सजाया नहीं जमाया है और उनके साथ इलेना डीक्रूज के नरेशन ने कहानी को बेहतरीन फ्लो दिया है। 'बचपन से ही मेरे लिए प्यार का मतलब था किसी के साथ हर पल जीना और साथ में ही मर जाना' , जब इलेना इस लाइन के साथ कहानी की शुरुआत करती हैं तो लगता है कि ये कहानी श्रेया(इलेना) और बर्फी (रणबीर) की है जो एक दूसरे से प्यार करते थे और किसी वजह से साथ-साथ नहीं रह पाए। फिर जब बर्फी की पहली झलक मिलती है तो न जाने क्यों चार्ली चैप्लिन की छवि दिमाग में आने लगती है। अब जब चार्ली चै‌प्लिन की छवि दिमाग में आ गई हो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि रणबीर की अदाकारी में कुछ खास बात रही होगी। रॉकस्टार में उनकी आवाज की कहानी के बाद बर्फी में उनकी खामोशी की दास्तां को सुनना, देखना और महसूस करना उनके अभिनय के कई रंगों का साक्षी होने जैसा है। (बेशक मुझे निजी तौर पर रणबीर बहुत ज्यादा पसंद नहीं हैं)। काफी देर तक फिल्म में रणबीर और इलेन के परिवार, उनका मिलना, प्रेम करना और बिछड़ना देखते हुए ये सवाल उठता रहता है कि फिल्म में प्रियंका का क्या रोल होगा? क्या प्रियंका कोई साइड रोल प्ले कर रही हैं? रणबीर, इलेन के साथ हैं तो प्रियंका किसके साथ होंगी। बिल्कुल एक आम दर्शक की तरह ये सारे सवाल सामने आ ही रहे थे कि फिल्म में एक तसवीर के साथ ‌प्रियंका का नाम सामने आता है-झिलमिल। दार्जिलिंग के बेहद अमीर आदमी की नाती जिसे ऑटिस्टिक होने की वजह से उसके मां-बाप अनाथालय भेज देते हैं, लेकिन उसके नाना पूरी जायदाद उसके ही नाम करके मर जाते हैं और फिर शुरू होती है झिलमिल की असली कहानी। जिस तरह से झिलमिल का ‌रोल लिखा गया है बिल्कुल उसी तरह ‌इस फिल्म में बेहद सादगी के साथ प्रियंका के खूबसूरत फीचर्स का इस्तेमाल भी हुआ है। इसके‌ लिए मेकअप आर्टिस्ट को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। सच मानिए तो मेरे लिए फिल्म का असली मतलब तभी शुरू होता है जब ‌फिल्म में झिलमिल की एंट्री होती है। हालांकि काफी देर तक झिलमिल फिल्म के एक अलग हिस्से के रूप में ही रहती है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कहानी की पूरी बागडोर उस अलग हुए हिस्से पर ही आ जाती है। बर्फी के पिता की बीमारी, पैसों की तंगी में बर्फी का झिलमिल को किडनैप करना और फिर झिलमिल के पिता का उसे किडनैप करवाना और इस सस्पेंस, कॉमेडी और थ्रिल के बीच ‌धीरे से, चुपके से कहीं झिलमिल और बर्फी की लव स्टोरी की शुरू होना बिल्कुल मौन की तरह देखने वाले को धीरे-धीरे अपनी तरफ खींचने लगता है। इस बीच में रणबीर की खामोशी को म्यूजिक बीट्स के जरिए जिस तरह दिलों में उतारा गया है उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। झिलमिल और बर्फी की प्रेम कहानी दो लोगों की एक ऐसी कहानी है जो बोल और सुन नहीं सकते। इस मजबूरी की मिट्टी पर प्रेम को पनपाने के लिए जिस तरह के बिंब दिखाए गए हैं उन्हें बेहतरीन क्रिएटिविटी की श्रेणी में रखा जा सकता है। एक दूसरे को शीशे से परछाई बनाकर बुलाना, हाथ की कनी उंगली में उंगली डालकर एक दूसरे की नजदीकी को महसूस करना, दूसरे लोगों से अलग होते हुए भी एक आम जिंदगी जीने की सारी कोशिशों को अंजाम देना। जो झिलमिल टॉयलेट जाने से पहले नाड़ा बर्फी से खुलवाती है वो प्यार में होकर साड़ी बांधने की प्रेक्टिस करने लगती है, जो झिलमिल हर काम के लिए नौकरों पर निर्भर थी वो दिल से पति मान चुके बर्फी के लिए खाना बनाती है और खाने खाते हुए उसे एक आम देहाती औरत की तरह पंखे से हवा करती है। इन सारे छोटे-छोटे दृश्यों ने मिलकर कई बार कहानी के भीतर पैदा हो रहे सीलेपन को दर्शक की आंखों तक पहुंचाया और फिर अचानक ही बर्फी की खामोश कॉमेडी से होंठो पर सरका दिया। इस बीच इलेना का नरेशन कहानी में जारी रहा और साथ ही उसकी अपनी कहानी भी। बेशक कहानी में लव ट्राइंगल था, लेकिन यहां असल प्यार वहीं नजर आया जहां लोग सामान्य नहीं थे यानी झिलमिल और बर्फी। इलेना जो सामान्य लड़की थी औरबर्फी से प्यार करती थी कभी उस प्यार को चुन नहीं पाई। क्योंकि चुनने से पहले उसने काफी सोचा, मां को बताया, मां से पूछा और मां(रूपा गांगुली) ने एक आदर्श भारतीय नारी की तरह उसे अपने नक्शे कदम पर चलने के ल‌िए कहा। अपने नक्शे कदम यानी एक अच्छे खासे शरीर और पैसे वाले आदमी से शादी करने के ल‌िए। मां को मंजूर था कि जिस तरह वो बुढ़ापे तक अपने प्रेमी को ‌छुप-छुप कर देखती हैं उसके ख्याल पालती है उसकी बेटी भी इस तरह जिंदगी जी लेगी, लेकिन लोगों को दिखाने के ल‌िए, सो कॉल्ड सामान्य जिंदगी जीने के लिए उसे एक सामान्य ‌इनसान से ही शादी करनी चाहिए। यही होता भी है, लेकिन मां और बेटी की कहानी में एक टिवस्ट ये है कि इलेना छिप-छिप कर नहीं पूरी हिम्मत के साथ शादी के छह साल बाद अपने प्यार को चुनती हैं, लेकिन छह साल असामान्य कहे जाने वाले लोगों के लिए सामान्य नहीं होते। तब तक बर्फी झिलमिल का हो चुका होता है और जिस ख्वाहिश को मन में पाले हुए इलेना बड़ी होती हैं ('बचपन से ही मेरे लिए प्यार का मतलब था किसी के साथ हर पल जीना और साथ में ही मर जाना') वो ख्वाहिश झिलमिल और बर्फी की प्रेम कहानी में आकर पूरी होती है, बस जहां इलेना होना चाहती थी वहां झिलमिल होती है जिसने कभी कुछ नहीं सोचा था बस किया था, प्रेम। उसने होने के बाद किया था या करने के बाद हो गया था ये हम सब सामान्य कहे जाने वाले लोगों के अपने अपने सेंस ऑफ ह्यूमर पर निर्भर करता है। फिल्म पूरी तरह दर्शक को बांधे रहती है और अंत में शायद उन सारे सामान्य लोगों को शर्म‌िंदा कर जाती है जो हर वक्त प्रेम प्रेम का राग अलापते रहते हैं।

Moral of the Story for Me

  • सबसे पहली और जरूरी बात ये कि जिन लोगों को सामान्य कहा जाता है वही सबसे ज्यादा असामान्य हैं।
  • दूसरी बात ये कि आज के समय में अनुकूल माहौल न होने की वजह से प्रेम डायनासोर की तरह लुप्त हो सकता है। इस पर पाश का एक शेर भी आपके साथ बांटा जा सकता है जो मुझे भी किसी ने सुनाया था 'जिंदगी  ने जिन्हें बनिया बना दिया वो क्या इश्क फरमाएंगे'।
  • फिर ऑटिज्म जैसी बीमारी पर एक गरीब बाप को पूरी शिद्दत से अपने बच्चे को पालना और पूरी तरह से समृद्ध परिवार के लोगों को अपनी फूल सी बच्ची को समाज और सामाजिकता के चक्कर में अनाथालय भेज देना जैसे आधी भावनाओं का कत्ल अमीर होते ही हो जाता है। 
  • जाते-जाते इस फिल्म ने मेरी यादाश्त के एक और कोने पर रोशनी डाली और मुझे ख्याल आया संजीव कुमार और जया बहादुड़ी अभिनीत फिल्म कोशिश का जो एक गूंगे बहरे प्रेमी जोड़े की कहानी थी। काफी छोटी थी मैं जब टीवी पर ये फिल्म देखी थी। तब शायद बहुत सारे अहसासों की परिभाषा भी पता नहीं था लेकिन तब भी बिन बोली भावनाओं को देखना मुझे बहुत अच्छा लगा था। इस लिहाज से बेशक बर्फी बॉलीवुड का कोई नया अजूबा नहीं है, लेकिन संवेदनाओं का एक नया प्लेटफार्म जरूर है उन लोगों के लिए जो "कोशिश" तक नहीं पहुंच सकते "बर्फी " के स्वाद से ही समझ सकें शायद।
  • और सबसे आखिरी में - 'प्रेम के बारे में सोचना नहीं चाह‌िए..उसे सिर्फ करना चाह‌िए।'


शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

भाषा पर डिप्लोमेसी क्यों भाई


अपनी जेब से दस रुपये का नोट निकालिए (नोट 50 या 100 का भी चल सकता है, लेकिन बढ़ती महंगाई में ज्यादा दिल क्यों दुखाएं) अब इस नोट पर ढूंढिए कि कितनी भाषाओं में दस रुपये लिखा है। हिंदी और अंग्रेजी में लिखा दस रुपये तो आपको तुरंत दिख जाएगा। मगर जरा गौर करेंगे तो बांयी तरफ 15 अन्य भाषाओं में भी दस रुपये लिखा होगा। 15 अन्य भाषाएं बोले तो असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत‌, तमिल, तेलुगु और उर्दू। बात की शुरुआत ही इस बात से करने का मकसद ये है कि इस बात पर मैंने भी हाल ही में गौर किया है कि इंडियन करंसी शायद अपने आप में इकलौती ऐसी करंसी है, जिस पर 17 भाषाएं लिखी हुई हैं। एक देश और 17 भाषाएं। इस विविधता को ही भारत की पहचान माना जाता है, बेशक अब इसमें बसने वाली एकता धीरे-धीरे टूट रही हो। जिस देश में इतने सारे अलग-अलग तरह के लोग हों वहां इतनी सारी भाषाओं का होना हैरान नहीं करता। हैरान करती हैं हिदीं दिवस जैसी तारीखें और इन तारीखों के कर्ता-धर्ता यानी हमारे रहनुमाओं के लगातार अंग्रेजी में गिगियाते भाषण और घोषणाएं। डिप्लोमेसी के मामले में भारत भी पाकिस्तान से कुछ कम पीछे नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान आतंकवाद जैसे खतरनाक और गंभीर मुद्दे पर भी डिप्लोमेसी की चाल चलकर खुद को शातिर समझता है औऱ भारत भाषा जैसे सरल से विषय को भी अपनी डिप्लोमेसी में लपेटकर अपनी विश्व की उभरती ताकत बनने वाली छवि को मटमैला कर देता है। जब जिस देश के संविधान में बाकायदा एक भाषा को अपनी राष्ट्र भाषा बना लिया गया है लोगों को हिंदी वासी के तौर पर पहचान दी गई है वहां बात-बात पर हर काम-काज में अंग्रेजी क्यों हावी हो रही है। मैं यहां ये सब इसलिए नहीं लिख रही कि मैं अंग्रेजी के खिलाफ हूं बल्कि मैं इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मैं खिलाफ हूं ऐसी व्यवस्था के जहां कहा कुछ जाता है और किया कुछ औऱ जाता है। मैं खिलाफ हूं या शायद हर वो शख्स खिलाफ है इस दोगुली नीति के जो अपनी मूल पहचान से प्यार करता है औऱ चाहता है कि उसकी पहचान को उसी रूप में पहचान मिले जिस रूप में वो है। अमेरिका से लेकर चीन तक बोलचाल से लेकर कामकाज, यहां तक कि चीन में तो इंटरनेट विंडोज और तमाम सॉफ्टवेयर तक उनकी अपनी भाषा में बने हैं न अंग्रेजी न कोई और भाषा। मान लिया जाए कि भारत में सिर्फ हिंदी ही नहीं कई क्षेत्रीय भाषाएं हैं और कुछ प्रदेशों में लोग हिंदी को बिल्कुल नहीं समझते तो फिर मैं बात को यहीं खत्म करते हुए ये कहना चाहूंगी कि हिंदी दिवस मनाना या हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना बंद किया जाना चाहिए तुरंत प्रभाव से, क्योंकि हम भारत के युवा वही देखना चाहते हैं जो सच में है न कि वो जो कभी था ही नहीं और न ही कभी हो सकता है।
14 सितंबर 2012 

शनिवार, 8 सितंबर 2012

कविता में नयी प्रेम कहानियां

1)
मैं तुमसे प्यार करती हूं
.
मैं तुमसे प्यार करता हूं
.
.

कुछ कदम बाद
मुझे प्यार से नफरत है
.
मैं प्यार से नफरत करता हूं

2)
दो अजनबी
एक दूसरे को
पहचानना चाहते थे
प्यार करना चाहते थे
एक दूसरे से
हर ऐसी वजह को मिटा देना चाहते थे
जिससे
नफरत का निशान भी बने
रिश्ते की चादर पर
करीब दस साल बाद
आज के समय में
दो अजनबी
डरते हैं
एक दूसरे को पहचानने से
वो डरते हैं कि कहीं
प्यार न हो जाए
वो हर ऐसी वजह को
दूर हटाना चाहते हैं
जिससे मन की मिट्टी पर
प्यार के पौधे को पनपने का
मौका मिले।

3)
हम थक चुके हैं
प्यार कर-कर के
और उसके बाद
दिल में नफरत भर-भर के
आओ, एक-दूसरे से नफरत करने के लिए
और एक-दूसरे को धोखा देने के लिए
हम एक-दूसरे के करीब आएं अब।



कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...