सोमवार, 19 अगस्त 2013

भावनाओं की अर्थव्यवस्था

मुझे कुछ मिलने वाला था
...नहीं मिला
मैं दुखी हूं।
.................

उसके पास कुछ था
...छिन गया
वह दुखी है।
...............

तुम्हारे पास सब कुछ है
तुम्हारी हर दुआ कुबूल है
तुम्हारा हर ख्वाब सच है
अब पाने को कुछ नहीं है
तुम दुखी हो।
..............

दुख भी अजीब चीज है
................

मांग शून्य है
और उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है
.................

भावनाओं की अर्थव्यवस्था डगमगाने वाली है
..................

किसी कवि से दुखों का विज्ञापन करवाना चाहिए।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जब शब्द मरते हैं

एक आदमी था
बिलकुल वैसा ही जैसा होता है एक आदमी
मगर उस आदमी को सही-सही याद था
अपने जन्म का समय, तारीख और जगह।

उसने सुना एक जाने-माने विद्वान पंडित के बारे में।

वह उसके पास गया अपनी
किस्मत और उसका हुनर आजमाने

आदमी के हाथ की रेखाओं को पढ़ते ही 
विद्वान ने बता दिया उसके परिवार, सेहत, दाम्पत्य और करियर का हाल। 

समझा दिया आने वाली 
हर विपदा से बचने का उपचार

वह कब तक जीएगा
और मरने से पहले क्या-2 हासिल करेगा, 
इस बात का भी हो गया उस आदमी को ज्ञान

मगर परेशान हैं वह आदमी 
पिछले कुछ दिनों से बहुत।

बहुत हंसता है
और रो पाने की हर कोशिश
जैसे नाकाम हो गई है।

बहुत चुप रहता है
और कह दे किसी से ये चाहत
जैसे श्मशान हो गई है।


आदमी की जिंदगी और मौत की तिथ‌ि
बताने वाले विद्वानों 
को शायद नहीं मालूम हो पाता है
शब्दों की मौत का समय

इसका अहसास खुद समय करवाता है
जैसे अभी-अभी उस आदमी को हुआ है अहसास...

उम्मीद नामक एक शब्द मर चुका है उसके जेहन में 

और अब परेशानी की वजह बन रही है
मर चुकी उम्मीदों की भटकती आत्मा


विद्वानों को थोड़ा और विद्वान होने की जरूरत है शायद

गुरुवार, 20 जून 2013

मुझे धूप चाहिए

मुझे धूप पसंद है, उसने कहा था।
और मैंने तपाक से उसके मुंह की बात छीनकर कर उसे भला-बुरा कहना शुरू कर दिया था, '' ‌छ‌ि तुम्हें धूप  पसंद है, मुझे तो बा‌र‌िश पसंद है'' 
और फिर उसने भी तुरंत मेरी बात को लपक कर कहा था, ‘’मुझे बारिश बिलकुल पसंद नहीं है।‘’
वैसे बातें करने में मैं खुद भी बहुत माहिर हूं, लेकिन उसके तर्कों के आगे जीतना अक्सर मेरे लिए मुश्किल हो जाता था। उस दिन भी उसने मुझे बारिश के सैकड़ों नुकसान और धूप के हजारों फायदे गिना दिए थे। जवाब में मेरे पास सिर्फ वही घिसी-पिटी नॉनसेंस बकवास थी, जिसमें बारिश के होने से दो दिलों का धड़कना, किसी के लिए तड़पना और तन-मन में कुछ-कुछ होना शामिल था। हमारी बहस में कौन जीता, ये बताने के लिए किसी जज की जरूरत नहीं थी, क्योंकि हर बार की तरह उसकी जीत तय थी।
हारना यूं तो किसी को भी पसंद नहीं होता, लेकिन मुझे हारने से सख्त चिढ़ है। मैं हार बर्दाश्त ही नहीं कर सकती। उससे बात करने की सबसे खास और दिलचस्प बात ही ये थी कि उससे बातों में हारकर भी मुझे बुरा नहीं लगता था। ऐसा इसलिए होता था कि मैं हार कर भी जीत जाती थी, आखिर बिना कोई किताब पढ़े, बिना घंटों इंटरनेट पर आंखें गड़ाए मुझे इतनी सारी बातें जो पता चल जाती थी। चलते-फिरते विकीपीडिया की तरह था वो। अब इससे पहले कि आपका ध्यान असल मुद्दे से ज्यादा इस बात पर जाए कि वो कौन था तो वो मेरा एक दोस्त था। जिससे अक्सर साहित्य, राजनीति, शहर, समाज, देश, दुनिया, प्यार और सपने जैसे विषयों पर घंटों चर्चा हुआ करती थी। अब काफी समय से बात नहीं हुई है इसलिए लिखते वक्त वाक्यों में भूतकाल का भावना आ गई। अब मुद्दा यहां हमारी बातें या दोस्ती नहीं है, मुद्दा है बारिश और धूप।

मुझे हमेशा से बारिश बहुत पसंद रही है। हालांकि ऐसा भारत में कई लोगों के साथ है और खासकर लड़कियों के साथ। हो सकता है कि बॉलीवुड की फिल्मों का असर हो। लेकिन ऐसा सच में है।
चलो, अब बारिश का पसंद होना या न होना अपनी जगह है, लेकिन किसी को धूप पसंद है, ये बात समझना मेरे लिए अब से पहले तक काफी मुश्किल था।
कहते हैं न वक्त बड़ी चीज है। सब समझा देता है। हर बात और हर जज्बात। पिछले कुछ दिनों में काफी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी सोच को या कहिए कि पसंद पर ही प्रश्नचिंह् सा लगा दिया है। अब ये सोचने से पहले कि मुझे बारिश पसंद है, खुद को भीतर से कई बार खंगालना पड़ता है।

हाल ही में हम वैष्णो देवी की यात्रा पर गए। वहीं से कुछ किमी की दूरी पर एक पहाड़ी एरिया है पटनीटॉप। हर तरफ पहाड़ और हरियाली। जरा सा सिर ऊपर उठाओ तो लगता है कि बादल आपको छूकर जा रहे हैं। कहीं लगता कि पेड़ों ने बादलों की टोपी पहन रखी है। कहीं लगता है कि पहाड़ बादलों का कंबल ओढ़कर सो गए हैं। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वहां मौसम बदल रहा था एक पल में बारिश होती थी, एक पल में रुक जाती थी। दिल्ली के 47 डिग्री टेम्परेचर के बाद वहां जाना किसी जन्नत से कम नहीं था। लेकिन सिर्फ एक दिन वो भी पूरा नहीं, समझ लीजिए एक दिन के सिर्फ कुछ घंटे वहां बिताकर, पूरा समय बारिश को महसूस कर उसमें रमकर अचानक मुझे धूप की कमी महसूस होने लगी। ऐसा लगा जैसे मुझे तुरंत एक धूप का टुकड़ा मिल जाए और मैं उसे अपने सिर पर रख लूं। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जब हम रात को तकरीबन 11 बजे वहां से लौटे तब बारिश और भी तेज हो चुकी थी। और मैं, जिसे हजार परेशानियों में भी अगर कोई चीज खुशी दे सकती है तो वो है बारिश, वो लड़की धूप के लिए तरसते हुए वापस लौटी थी। उस वक्त, वक्त शायद मुझे समझा रहा था कि धूप की अहमियत क्या है।

अहमियत तो शायद बारिश और धूप दोनों की है। लेकिन फर्क ये है कि बारिश सिर्फ अमीरों का मौसम है। गरीब और सड़क पर चलने वाले लोगों को जीने के लिए धूप चाहिए होती है। धूप में पसीना बहता है तो उनके घर-परिवार के लोगों की जिंदगी सुकून से चलती है, लेकिन बारिश में जब घर की छत से पानी टपकता है और कमजोर चप्पलें कीचड़ में फंसकर टूट जाती हैं तो जीना मुहाल हो जाता है। फिर बेशक इन सब बिंबों के बीच मुझ जैसा कोई व्यक्ति अपने किराये के मकान की बालकनी में बैठे-बैठे हाथों को जाली से बाहर निकालकर भिगोते हुए कितने ही बेमानी ख्वाब क्यों न सजा रहा हो...

और इन सब भावनात्मक बातों से ज्यादा अहम और बड़ी घटना उत्तराखंड में बारिश से हुई तबाही है, जिसके आगे ऊपर लिखे सारे कारण एकदम बौने हैं...

रविवार, 9 जून 2013

हर शहर में एक समंदर होना चाहिए...

मुझे नहीं मालूम...क्यों
लेकिन कुछ तो बात है इस शहर में
जो हमेशा से ये सपनों का हिस्सा रहा है।
और जब सपने सच
होकर सामने खड़े होते हैं
तो भावनाएं कहीं छूमंतर हो जाती हैं
शब्द कहीं लुप्त
और उस वक्त का
हर एक अहसास जैसे अमर हो जाता है।
ऐसा ही कुछ हुआ
बस अभी चंद घंटों पहले
जब मैंने मुंबई में कदम रखे।
एक अनजान शहर के बारे में
कुछ भी कहने के लिए
कुछ घंटे बेहद नाकाफी हैं
लेकिन यही इस शहर की खासियत है शायद
कि यहां सिर्फ कुछ पल बिताकर भी
शब्दों में अच्छा-खासा निवेश किया जा सकता है।
!!!
आसपास, चारों तरफ, दूर-दूर तक फैले अथाह पानी के बीच
भी जैसे... कोई जमीन तलाशकर अपने पैरों पर खड़ा हो...
...कुछ ऐसा ही शहर है मुंबई।
एक जगह
हर पल जमीन को अपनी आगोश में लेने की कोशिश करने वाला
समंदर है तो
दूसरी जगह
आसमान को अंगूठा दिखाती इमारतें।
जैसे पूरी कायनात से बैर पालकर ही ये शहर जिंदा है
और जिंदादिली की मिसाल भी
तभी तो यहां आने वाले किसी भी शख्स की जिंदगी
किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं होती है।
बेशक असल में हर कोई हीरो न
हीं बन पाता है
लेकिन यहां रहकर जिंदगी जीना किसी के लिए भी हीरोगिरी से कम नहीं है।
बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर लोग यहां आते हैं...
और ये उम्मीदें उन छोटी-छोटी खिड़कियों से बाहर झांकती दिखाई देती हैं
जो यहां बनीं
और टूटने के लिए बेताब होते हुए भी
कई सालों से जस की तस खड़ी इमारतों में
बिलकुल वैसा ही दर्जा रखती हैं,
जैसा कि किसी सिनेमाघर में बालकनी की सीट।
यहां रहने वालों की दुनिया एक दूसरे से काफी अलग है
लेकिन कुछ चीजें बिलकुल एक जैसी हैं...

यहां टैक्सी चलाने वाले भैय्या से लेकर बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले सेलिब्रिटी तक
हर किसी के लिए इस शहर की जिंदादिली एक मिसाल है
और यहां लगने वाला घंटों का लंबा ट्रैफिक जाम... एक कभी न खत्म होने वाली परेशानी।
इसके आगे कुछ भी कहने से पहले मुझे अंग्रेजी की एक कहावत का सहारा लेकर बात खत्म कर लेनी चाहिए क्योंकि अंग्रेजी में कहते हैं कि

 "The most amazing travellers were to humble to write about it"

यहां मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है शायद…
लेकिन एक बात जरूर है कि मुंबई से आने के बाद लगता है कि
हर शहर में एक समंदर होना चाहिए...

शनिवार, 11 मई 2013

भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए


वे कच्ची उम्र के नहीं थे।
जवानी को पार करके काफी आगे निकल चुके थे।
दो जवान बच्चों की शादी कर चुके थे।
अच्छे खासे बुजुर्ग व्यक्ति थे।
बातों ही बातों में कमिटमेंट की बात चली और उन्होंने तपाक से कहा-
कमिटमेंट तो होता ही तोड़ने के लिए है। फिर इतना क्या डरना!
अब मुद्दा यहां यह नहीं है कि किस मुद्दे पर उन्होंने यह बात कही।
मुद्दा यह है कि उन्होंने यह बात कही।
उन्होंने यानी 65 बरस के एक ऐसे व्यक्ति ने जो अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल जिंदगी में उम्र के इस पड़ाव पर भी पूरी तरह सक्रिय है।
मैं यहां सिर्फ यह सब इसलिए नहीं लिख रही कि
मुझे उनकी बात बुरी लगी
या
बुजुर्ग उम्र के व्यक्ति का ऐसी बात कहना शोभा नहीं देता।
मैं यहां यह सब इसलिए लिख रही हूं कि 
बच्चे, बूढ़े, जवान
अमीर गरीब
महिला पुरुष
हर उम्र, लिंग और वर्ग का व्यक्ति यह बात अच्छे से मान चुका है कि कमिटमेंट होता ही तोड़ने के लिए है।

कैसी मान्यता है ये!

कहां से आई है?
क्या हमारे ही दिए हुए धोखे, दगा और अविश्वास ने हमारे ही आसपास के लोगों को ऐसा बना दिया है।
या फिर एक रस्म शुरू हो गई है इनसानों के बीच 
उन बादलों की तरह जो जेठ की दोपहरी में गरज-गरज कर जी को जलाते हैं, मन को ललचाते हैं और बिना बरसे ही चले जाते हैं।
आसमान में बादल को देखकर भी धरती के सूखे रह जाने जैसा ही होता है वह पल
जब हम आप एक दूसरे को दिलाए गए भरोसे पर खरे नहीं उतरते।


भाषण देने का तात्पर्य बिलकुल नहीं है।

लेकिन एक टीस है
जिसे निकालने की शैली में भाषणनुमा वाक्य घुसपैठ करते जा रहे हैं
और मैं उन्हें रोक नहीं पा रही हूं। 


बात सिर्फ प्यार, मोहब्बत के कमिटमेंट की नहीं है।

बात उस बात की है
जब एक कामयाब बेटा अपने बूढ़े मां-बाप से हर‌ महीने मिलने और घर खर्च के पैसे देने का वादा करता है और किसी भी महीने मिलने नहीं आता।


बात उस बात की है 

जब आज की कामकाजी मां हर दिन अपने बेटे को यह विश्वास दिलाती है कि वह उसके साथ दफ्तर से आकर जरूर खेलेगी, लेकिन हर दिन वह घर आकर अपनी थकान को ज्यादा प्रमुखता देती है और बच्चे का भरोसा टूटता जाता है।


बात उस बात की है

जब एक लड़का एक लड़की को प्यार करने के साथ-साथ उस शादी के भी सपने दिखाता है, जिसका न हो पाना पहले से तय होता है।


बात उस बात की भी है

जब एक लड़की यह जानने के बावजूद कि वह अपने प्यार और मां-बाप में से हमेशा मां-बाप को ही चुनेगी, लड़के को अपने प्यार में बांधे रखती है, पिंजरे के पंछी की तरह।


बात उस मामूली सी बात की भी है

जब हम यूं ही अपने साथ काम करने वाले को विश्वास दिलाते रहते हैं, उसकी मदद जरूर कर देंगे। उसके काम की चीज जरूर लाकर दे देंगे।
और हफ्ते दर हफ्ते 
''ओह मैं तो भूल ही गई''
''अरे कल पक्का''
जैसे संबोधनों और खिलखिलाहट में सच को छिपाते रहते हैं।


आखिर में बात सिर्फ इतनी है कि आप मत कीजिए वह काम जो आप नहीं करना चाहते

नहीं कर सकते
चाह कर भी नहीं
लेकिन कम से कम भरोसे को तो बदनाम मत कीजिए।
माना कि उम्मीद पर दुनिया कायम है
लेकिन उम्मीद भी तो ऐसी हो, जिसे पचाने के लिए कायम चूर्ण की जरूरत न पड़े।

''

मैंने भाषणबाजी न करने का भरोसा नहीं दिलाया था। 
''
;)






शनिवार, 27 अप्रैल 2013

चुन्नी को लपेटने का फर्क था सिर्फ



बचपन में सजने-संवरने का बहुत शौक था। अक्सर मां की चुन्नी को साड़ी बनाकर पहना करती थी और शीशे के सामने घंटों खुद को देखा करती थी। फिर एक दिन यूं ही चुन्नी छोटी लगने लगी और सिर से लपेट कर नीचे लाते-लाते चुन्नी का बुर्का बनाना आ गया। फिर तो सहेलियों को भी सिखा दिया। उसके बाद अक्सर हमारे घर-घर के खेल में एक सहेली चुन्नी की साड़ी बनाकर पहनती तो एक चुन्नी का बुर्का बनाकर। जब तक घर-घर का खेल रहा, ये सिलसिला यूं ही चलता रहा।
जब खेलने की उम्र चली गई तो इस सिलसिले का सच सामने आया।
सच ये था कि -
चुन्नी एक ही थी।
लपेटने के तरीके दो थे।
दो तरीकों में दो धर्म घर कर बैठे थे,
ये बात घर-घर के उस खेल में कभी महसूस नहीं हुई थी।
आज भी महसूस नहीं होती,
बल्कि आंखों के सामने दिखाई देती है।
न मैंने आजादी की लड़ाई देखी है
न 84 के दंगे।
मैं अभी कुछ ही दिन पहले देख कर आई हूं पाकिस्तान से दिल्ली आए 480 हिंदू परिवारों को।
जो पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहते।
कहते हैं - पाकिस्तान में मुसलमान उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं, हिंदुस्तान में रहकर मर जाएंगे, लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे।
मैंने अभी-अभी देखी है हिंदु-मुस्लिम दंगों के गवाह और शिकार बने लोगों पर एक फिल्म-फिराक।
और मैं कई मरतबा पड़ी हूं इस बहस में कि क्यों मुझे शाहरुख खान पसंद है।
क्यों मैं तारीफ कर बैठती हूं मुसलमानी लड़कियों की तहजीब और नजाकत की।
क्यों गालिब से लेकर फराज तक की शायरी के ज्यादा से ज्यादा कसीदे मुंहजबानी याद कर लेने की जंग छिड़ी रहती हैं मेरे दिमाग में।
क्यों आखिरकार में हर साल कोशिश करती हूं उर्दू की क्लास में दाखिला लेने की, जो मेरे समय से मेल न खा पाने के कारण हर साल अधूरी रह जाती है।
ये महज इतेफाक है।
ये महज मेरे जज्बात हैं।
ये महज पसंद की बात है।
लेकिन मेरे आसपास के लोग इसे एक विद्रोही रंग दे देते हैं।
कहते हैं या चिढ़ाते हैं,
लेकिन मेरी हर बात पर अपनी यही बात दोहराते हैं कि
-तुम्हें तो मुसलमान ही पसंद हैं। पाकिस्तान चली जाओ।
मानो ये पसंद
पसंद नहीं
गुनाह है।
शुक्र है माहौल इतना भी गर्म नहीं है कि इस बात पर दंगे हो जाएं।
वरना शायद मैं भी कत्ल कर दी गई होती।
वैसे शायद कत्ल होने से ज्यादा खतरनाक होता होगा, कत्ल होते देखना।
जैसा कि पाकिस्तान से दिल्ली के बिजवासन में आए हिंदु लोगों के बीच बैठी एक पांच साल की बच्ची दिव्या भारती ने मुझे बताया था कत्ल का आंखों देखा हाल। उसकी मां उसे चुप रहने का इशारा कर रही थी। जो कत्ल उसने होते देखा था, उसकी वजह भी उसे मालूम थी, ये कत्ल होते देखने से भी ज्यादा खौफनाक था।
क्यों मारा तुम्हारे मामा के बेटे को।
वो मुसलमान था ने इसलिए।
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.
.
इस जवाब के बाद सवाल भी दफन होने से पहले ये पूछ रहे थे मुझसे
कि उन्हें कब्र दी जाएगी या उनकी चिता जलाई जाएगी...
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मेरा इतिहास बहुत कमजोर है
शायद गणित भी।
मगर जितनी भी तालीम है
उसे पूरा समझने-बूझने के बाद भी मुझे जाति और धर्म का भेद समझ नहीं आता।
इस बात का दुख मनाने से पहले कि कोई मुसलमान हिंदु को मार रहा है
या कोई हिंदु, एक नहीं हर मुसलमान से नफरत कर रहा है
मुझे इस बात का खौफ ज्यादा है कि
हम सब ही हिंदु मुसलमान से पहले
सिर्फ इन्सान हैं
और सिर्फ इन्सान ही हैं
इसके बाद में भी
ये बात कुछ लोग बिलकुल नहीं समझ रहे हैं।


काश कि इन लोगों की यादाश्त खो जाए और ये फिर से सिर्फ और सिर्फ इन्सान हो जाएं। 

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

तुम्हारी अनुपस्थिति


तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे वो लकीर
जिस तक पहुंचकर
एक-दूसरे में सिमट जाते हैं
धरती और आसमान।

तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे वो अंधेरा
जिसमें गुम हो जाता है
हर चेहरा और
मैं बना सकती हूं अपनी
कल्पना के घेरे में उस
उस वक्त तुम्हारा अक्स।

तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे पानी का रंग
जो दिखता नहीं है
या होता नहीं है
यह अब तक तय होना बाकी है।

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...