शनिवार, 6 अप्रैल 2013

तुम्हारी अनुपस्थिति


तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे वो लकीर
जिस तक पहुंचकर
एक-दूसरे में सिमट जाते हैं
धरती और आसमान।

तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे वो अंधेरा
जिसमें गुम हो जाता है
हर चेहरा और
मैं बना सकती हूं अपनी
कल्पना के घेरे में उस
उस वक्त तुम्हारा अक्स।

तुम्हारी अनुपस्थिति ऐसे है
जैसे पानी का रंग
जो दिखता नहीं है
या होता नहीं है
यह अब तक तय होना बाकी है।

रविवार, 17 मार्च 2013

कुछ छोटी कविताएं

दुख
तुम एक घना जंगल हो कविताओं का।


आंसू
मैं चाहती हूं कि तुम मेरे जेहन में जाकर कहीं छिप जाओ
और भीतर से इतना गिला कर दो मुझे कि कोई गम
सोख न पाए।


शिकार
मैं नहीं करना चाहती तुमसे प्यारमुझे डर है कि तुम मेरी नफरतों का शिकार हो जाओगे।


धोखा
हम थक चुके हैं
प्यार कर-कर के
और उसके बाद
दिल में नफरत भर-भर के
आओ, एक-दूसरे को धोखा देने के लिए
हम एक-दूसरे के करीब आएं अब।


मैं
पतंग भी मैं
डोर भी मेरे हाथ में
उड़ान भी मेरी
आकाश भी मेरा
और अब कट-कट कर
गिर भी रही हूं मैं।

गुरुवार, 14 मार्च 2013

11 मिनट और बेइंतहा मोहब्बत के अनंत पल

“प्यार”
को जिंदगी में कितनी जगह दे पाई हूं, ये तो मैं खुद भी नहीं जानती। लेकिन बातों में प्यार का मुद्दा अक्सर शामिल रहता है। एक दिन यूं ही जब प्यार बातों के बीच आया (ये भी कह सकती हूं कि प्यार के बीच में बातों को लाया गया) ,,,,, तब एक किताब का नाम सामने आया, “11 मिनट्स”।


दुनिया भर में मशहूर ब्राजील के लेखक पाओलो कोहेलो की सच्ची घटना पर लिखी गई एक किताब।
अल्केमिस्ट को पढ़ने के बाद पाओलो कोहेलो की शैली से ठीक-ठाक जान-पहचान हो गई थी। फिर भी इस किताब को सुनते ही, ढूंढने, खरीदने और जल्द से जल्द पूरा करने की वजह थी, वो एक लाइन जो इस किताब का जिक्र करते हुए मुझे बताई गई-
“ये एक लड़की की कहानी है, जो वेश्या बन जाती है (साथ में परिस्थितिवश लिखना जरूरी नहीं लगा, क्योंकि शौक से शायद ही कोई लड़की वेश्या बनना चाहती होगी) लेकिन जिदंगी में कई लोगों से शारीरिक संबंध बनाने के बाद भी उसे वह सुख और संतुष्टि नहीं मिल पाती, जो एक चित्रकार से प्यार करके उसके बिना छुए मिल जाती है।“


सुनने में यह काफी दिलचस्प और रहस्यमयी लगता है और खास बात ये है कि पढ़ने के बाद भी यह कहानी उतनी ही दिलचस्प और रहस्यमयी है। इसमें एक लड़की मारिया का बचपन है। उसका पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और ....... वां प्यार है। उसके सपने हैं। उसकी एडवेंचर की दुनिया है। उसकी किताबें हैं। उसकी डायरी है। उसका अकेलापन है और फिर एक ऐसा सफर है, जिसमें उसे वेश्या बनना पड़ता है। इसी सफर में आने वाले उतार-चढ़ाव और ज्वार भाटे को मारिया अपनी डायरी में दर्ज करती है। उसी डायरी से कुछ बातें ---


“सबसे दिलचस्प लोग आखिरकार साथ छोड़ ही जाते हैं।“

“प्यार एक खतरनाक वस्तु का नाम है।“

“इलाज, दर्द से भी अधिक पीड़ादायक है।“

“जब हम किसी से मिलते हैं और उसे चाहने लगते हैं, तो लगता है जैसे सारी कायनात हमारे साथ है। आज सूरज डूबते वक्त मैंने ऐसा ही कुछ देखा।
और अगर कहीं कुछ गड़बड़ हो जाए तो फिर कुछ भी बाकी नहीं रहता। न कोई पंछी, न दूर से आती संगीत की आवाज और न ही उसके होंठों का स्वाद। ऐसा कैसे संभव है कि जो खूबसूरती कुछ पल पहले थी, अचानक गायब हो जाए... “

“हर चीज मुझे यह अहसास दिला रही है कि जो निर्णय मैं लेने जा रही हूं वह सही नहीं है, लेकिन गलतियां करना तो जिंदगी का हिस्सा है। यह दुनिया पता नहीं मुझसे क्या चाहती है। क्या यह चाहती है कि मैं कोई जोखिम न उठाऊं और वहीं लौट जाऊं, जहां से आई हूं केवल इसलिए कि जिंदगी को हां कह देने की मुझमे हिम्मत नहीं है।“

“मैंने जिंदगी में, उन चीजों को अस्वीकृत करने में बहुत समय गंवा दिया था, जिन्हें मैं हां कहना चाहती थी।“

‘’मैं तुमसे प्यार करता हूं’’ ...हालांकि यह शब्द उसने अपनी 22 बरस की उम्र में कई बार सुने थे, और उसे लगता था कि इन शब्दों के पीछे सिर्फ खोखलापन है, क्योंकि इन शब्दों में उसे कभी गंभीरता या गहराई का आभास नहीं हुआ, ये शब्द कभी किसी अटूट रिश्ते में नही बदले।“

“सभी को एक जैसी चीजों की तलाश थी।“

“वो नियति की शिकार नहीं थी, वो अपने आप से यही कहती रही, वो अपने जोखिम खुद उठा रही थी, अपनी हद से गुजर रही थी। ऐसी चीजों का अनुभव कर रही थी, जिन्हें किसी रोज, अपने मन की खामोशी में बुढ़ापे की उकताहट के समय वो भावुक होकर याद कर लिया करेगी-बात इस समय चाहे कितनी भी बेहूदा लग रही हो।“

“क्या स्कूल में सिखाई गई बातों से दुनिया इतनी अलग थी।“

“कुछ लोग जिंदगी का सामना अकेले ही करने के लिए जन्म लेते हैं और इसमें अच्छाई और बुराई जैसी कोई बात नहीं है, यह तो बस जिदंगी है। मारिया ऐसे ही लोगों में से एक थी।“

“जिदंगी उसे सिखा रही थी बहुत तेजी से, कि सिर्फ ताकतवर ही जिंदा रहते हैं। ताकतवर होने के लिए उसे श्रेष्ठ बनना पड़ेगा, दूसरा कोई विकल्प नहीं था।“

“सभ्यता के साथ कुछ तो बहुत बड़ी गड़बड़ थी। यह अमेजन के वर्षा वनों का विनाश या ओजोन परत या पांडा, सिगरेट, घातक खाद्य पदार्थ या जल के हालातों की बात नहीं थी, इन विषयों को तो अखबार उठाते थे।“

“मनुष्य पानी के बिना एक सप्ताह रह सकता है, खाने के बिना दो सप्ताह और घर के बिना तो शायद बरसों, मगर अकेलेपन के साथ नहीं, यह सबसे भयानक यंत्रणा है, सबसे बुरी तकलीफ।“

“प्यार के प्रलोभन से बचने के लिए उसने अपना दिल अपनी डायरी के नाम कर दिया।“

“प्यार किसी प्रकार की स्वेच्छा से स्वीकार की गई दासता है। पर यह सच नहीं है। स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी है, जब प्यार की उपस्थिति हो। जो व्यक्ति को खुद को पूरी तरह दे देता है, जिसे सम्पूर्ण स्वतंत्रता का अहसास होता है, वही व्यक्ति भरपूर प्यार दे सकता है।“

“एक ऐसे मर्द की तलाश जो मुझे समझ तो सकेगा, लेकिन मुझे तकलीफ नहीं देगा।“

“मुझे बेहद तकलीफ हुई थी जब एक-एक करके मैंने उन मर्दों को खो दिया, जिन्हें मैंने प्यार किया था। अब हालांकि मुझे यकीन हो गया था कि कोई किसी को नहीं खोता क्योंकि कोई किसी का स्वामी नहीं होता।

स्वतंत्रता का यही सच्चा अनुभव है- संसार की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु का अपने पास होते हुए भी उसका मालिक न होना।“

“वो जो करती उसका उचित कारण देने की कोशिश करती, वो उस समय हिम्मत करने का बहाना करती जब वो कमजोर होती थी या जब हिम्मत से भरी होती तो कमजोर दिखने का प्रयत्न करती थी।“

मारिया अपने बारे में रैल्फ(चित्रकार) को बताते हुए
“मैं दरअसल एक नहीं, तीन हूं, सच कह रही हूं-यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किसके साथ हूं। एक तो मासूम लड़की है, जो मर्दों की शौर्य गाथाओं को सुनकर मंत्रमुग्ध हो उन्हें सराहनीय नजरों से देखने का बहाना करती है। फिर दूसरी एक कातिल हसीना, जो किसी को जरा भी असुरक्षित पाती है तो उस पर झपट पड़ती है और ऐसा करते ही वो स्थिति का नियंत्रण करने के साथ सामने वाले को उत्तरदायित्व से मुक्त कर देती है, क्योंकि फिर उन्हें किसी बात की चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। और आखिरकार मैं एक समझदार मां हूं, जो दूसरों की जरूरत के मुताबिक उन्हें राय देती है, जो सब कहानियों को तन्मयता से सुनती है और उन्हें एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकाल देती है। इन तीनों में से तुम किससे मिलना चाहोगे.. “
“तुमसे“

“मैं यह मानना चाहूंगी कि मुझे प्यार हो गया है। एक ऐसे व्यक्ति के साथ जिसे मैं नहीं जानती और जो कभी मेरी योजनाओं का हिस्सा नहीं था। आत्मनियंत्रण और प्यार से दूर भागते रहने के इतने महीनों बाद भी मुझे बिल्कुल विपरीत परिणाम मिला, मुझसे थोड़ा अलग सा व्यवहार करने वाले पहले व्यक्ति पर मैंने अपना दिल लुटा दिया।“

“यह दुनिया जिस तरह की है उसमें एक प्रसन्नता भरा दिन, एक चमत्कार ही तो है।“

रैल्फ ने जब मारिया से कहा-
“मैं तुम्हें हर उस रूप में चाहता हूं जिसमें तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें चाहूं।“
तब मारिया की डायरी से
“नहीं वो ऐसा नहीं कह सकता, क्योंकि ठीक यही बात तो वो सुनना चाहती थी। वो भूकंप, वो ज्वालामुखी, वो तूफान लौट आए। उसे अपने ही जाल से निकल पाना असंभव प्रतीत होने लगा था, वो इस आदमी को वास्तव में पाने से पहले ही खो देने वाली थी।“

मारिया, रैल्फ को उपहार देते हुए
“तुम्हारे पसंद की कोई खरीदकर तुम्हें देने की जगह, मैं तुम्हें वो वस्तु दे रही हूं जो मेरी है, सचमुच मेरी। उपहार।“
उपहार देना। अपना कुछ किसी को देना। मांगने के स्थान पर कुछ ऐसा देना जो अपने लिए महत्वपूर्ण हो। तुम्हारे पास मेरा खजाना है, वो पेन जिससे मैंने अपने कुछ सपनों को कागज पर उतारा। मेरे पास तुम्हारा खजाना है, रेलगाड़ी का डिब्बा, तुम्हारे उस बचपन का हिस्सा, जिसे तुम जी नहीं पाए।
मेरे साथ तुम्हारे अतीत का हिस्सा है और तुम्हारे पास मेरा एक छोटा सा उपहार कितनी सुंदर बात है न।“

“मैं जान गई हूं कि प्रतीक्षा करना बहुत कठिन होता है और मैं इस अहसास की आदत डालना चाहती हूं, यह जानते हुए कि तुम मेरे साथ तब भी हो जब तुम मेरे साथ नहीं हो।“

“गहरी इच्छा और सच्ची इच्छा है किसी के पास होने की इच्छा। पर इसके आगे सब बदल जाता है. मर्द और औरत सामने आ जाते हैं पर इससे पहले क्या होता है-जो आकर्षण दोनों को पास लेकर आया-उसे समझा पाना असंभव है, वर्तमान स्थिति में वो एक अनछुई इच्छा है।जब इच्छा अपनी इस शुद्ध अवस्था में होती है, तब औरत और मर्द को जिदंगी से प्यार हो जाता है। वो हर पल, श्रद्धापूर्वक सचेत रहकर जीते हैं और सदैव अगले पल के आर्शीवाद का उत्सव मनाते हैं।“

“सबसे महत्वपूर्ण अनुभव किसी व्यक्ति के लिए वो होता है जो उसे उसकी हद तक ले जाए। इसी एकमात्र तरीके से हम सीखते हैं, क्योंकि इसके लिए हमें अपनी सारी हिम्मत जुटानी पड़ती है।“



“मैं एक ही शरीर में दो औरते हूं-
एक जो उन सारी खुशियों, जुनूनों और साहसिक अनुभवों को जी लेना चाहती है, जो जिंदगी मुझे दे सकती है। दूसरी औरत नित्य के नियमों, पारिवारिक जीवन और उन चीजों की जिन्हें योजना के साथ पाया जा सकता है, सबकी गुलामी करना चाहती है।
इन दो औरतों का मिलन, गंभीर खतरों से भरा एक खेल है।“

“कुछ तकलीफें ऐसी होती हैं, जिन्हें तभी भुलाया जा सकता है जब हम अपने दर्द से ऊपर उठने मैं सफल हो सकें।“

क्या एक सिपाही युद्ध में दुश्मन को मारने जाता है?
“नहीं, वह जाता है अपने देश पर मर मिटने के लिए।

क्या एक पत्नी अपने पति को यह दिखाना चाहती है कि वो कितनी खुश है?
नहीं, वो चाहती है कि उसका पति देख सके कि वो कितनी समर्पित है. उसे खुश रखने के लिए वो कितनी तकलीफें उठा रही है।

क्या एक पति काम पर इसलिए जाता है कि वहां उसे निजी पूर्णता मिल जाएगी?
नहीं, वो अपना खून पसीना अपने परिवार की भलाई के लिए बहाता है।

यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है। कुछ लोग अपने मां-बाप की खुशी के लिए अपने सपने भुला देते हैं, मां-बाप, बच्चों को खुशहाल रखने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं। दर्द और तकलीफ का उपयोग केवल एक वस्तु को सत्य ठहराने के लिए होता है,
जिससे हमें केवल आनंद ही मिलना चाहिए-प्रेम।


“कुछ चीजें बांटी नहीं जा सकती। ना ही हमें उन सागरों से भय लग सकता है, जिनमें हम अपनी स्वेच्छा से डूबना चाहें, डर हर किसी की शैली को संकुचित कर देता है, यह समझने के लिए मनुष्य न जाने कितने नरक झेलता है। एक दूसरे से प्यार तो करें, परंतु हम एक दूसरे को पाने की कोशिश कभी न करें। “

“पैसा एक विशेष कागज का टुकडा, रंग-बिरंगी आकृतियों से सजा हुआ। सबके अनुसार जिसकी कोई न कोई कीमत थी। वह इस बात को मानती, सब मानते थे। जब तक कि आप ऐसे ही कागज के टुकड़ों का बड़ा सा ढेर लेकर किसी सम्मानित, परंपरागत, बहुत ही गोपनीय स्विस बैंक मैं जाकर कहें, क्या मैं इनसे अपने जीवन के कुछ क्षण वापस खरीद सकती हूं,
नहीं मैडम हम बेचते नहीं, केवल खरीदते हैं।“

“शायद यही कारण था कि वे एक-दूसरे से प्यार करते थे क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें एक दूसरे की आवश्यकता नहीं है।“

“आदमी हमेशा डर जाते हैं जब औरत कहती है, मुझे तुम्हारी जरूरत है।“

....

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

ऑटो में दो लड़कियां



लड़की-1
वही हरा वाला...। थोड़ा ट्रांसपेरेंट हैं न वो...। जैसे ही पहनने लगी, मम्मी ने टोक दिया।
"ये पहनकर बाहर नहीं जाना। ऑटो-वॉटो से जाना है, सही ढंग के कपड़े पहन लो।"

मेरा मूड ही खराब हो गया
फिर मैंने छोड ही दिया। ऐसे ही जींस कुर्ता पहनकर आ गई मैं।
तू बता, बड़ी स्मार्ट लग रही है.. आंटी ने कुछ नहीं कहा...

लड़की-2

हां यार
मेरी भी मम्मी कल से सवाल पूछे जा रही हैं।
"क्यों इतनी तैयारी कर रही है.."
"क्या बात है"
"कॉलेज ही जा रही हो न।"
मैंने बताया उनको कि आज कॉलेज में फेस्ट है...
मम्मी ने पूछा फेस्ट क्या होता है
मैंने कहा, मम्मी जैसे स्कूल में एनुयअल फंक्शन होता था न
ऐसे ही कॉलेज में फेस्ट होता है
फिर पता है मम्मी ने क्या कहा...
कहने लगी तो बेटा फिर वो दीवाली पर जो लाए थे वो सूट पहन ले या कोई साड़ी दूं अपनी निकालकर
मम्मी भी न .... समझती नहीं है
फेस्ट में कोई सूट या साड़ी थोड़ी पहनता है
फिर पूछने लगी "क्यों नहीं पहनता भला
एनुअल फंक्शन में भी तो तुम सब तैयार होकर जाते थे।"
मैंने बताया उन्हें, कॉलेज के फेस्ट बड़े ही धमाकेदार होते हैं
डांस  होता है, म्यूजिक होता है
दूसरे कॉलेज के भी लोग आते हैं
सब मस्ती करते हैं
सूट साड़ी में कैसे इंज्वाय करेंगे...
फिर तो मम्मी को औऱ ज्यादा लगने लगा कि मुझे ज्यादा तैयार नहीं होना चाहिए

लड़की-1
लेकिन यार मम्मी ठीक ही चिंता करती हैं
कल देखा नहीं था तूने टीवी पर
गाजियाबाद में ऑटो वाला ही
लड़की को भगाकर ले गया और
रेप कर दिया

लड़की-2
हां.... (अनमने से)



अब सिर्फ ऑटो की खड़खड़ की आवाज थी
संजी-संवरी सी वो दो लड़कियां बिलकुल सहमकर शांत हो गईं थी।
शायद मेरे ऑटो से उतरने के बाद उन्होंने किसी दूसरे विषय पर फिर से बात शुरू करने की हिम्मत जुटाई हो

-आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस था...

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला...

मां को एक बार कहते सुना था, ‘’जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं, या तो किसी के हो जाओ या किसी को अपना बना लो।‘’ 
 
फिर जब कविताएं पढ़ने का शौक जोश-खरोश से पूरा करने लगी तो मशहूर कवि पाश की एक कविता पढ़ी,
‘’बीच का रास्ता नहीं होता‘’

मां और पाश दोनों की ही बात से साफ है कि हम किसी एक ही तरफ होते हैं या तो ‘’हां ‘’ या तो ‘’ना‘’। या तो डूबना या तो तरना। मगर अफसोस मेरे अनुभव में इन दोनों अजीजों की यह सीख जिंदगी से बहुत मेल नहीं खा पाती। अक्सर ऐसा होता है कि न तो हम किसी को अपना बना पाते हैं पूरी तरह, न किसी के हो पाते हैं पूरी तरह। अक्सर ऐसा होता है कि जिंदगी बीच का ही कोई रास्ता अख्तियार कर लेती है और हम ना-ना करते हुए भी उसी बीच के रास्ते पर अपनी खुशियों की मंजिल बना लेते हैं। अक्सर यह फैसला करना काफी मुश्किल होता है कि हमें किसी एक तरफ जाना है या फिर बीच का ही कोई रास्ता निकालना है।





कई सालों पहले एक शाइर की जिंदगी में भी ऐसा ही मोड़ आया जब उसे किसी एक को चुनना था, या तो वो मतलब की दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल ले और मशहूर हो जाए या फिर ऐसी दुनिया को छोड़कर अपनी अलग एक गुमनाम दुनिया बसा ले। अबरार अल्वी चाहते थे कि वह शाइर दुनिया के हिसाब से ढल जाए और गुमनामी की बजाय दुनिया के इस बदलाव को स्वीकार करके मशहूर हो जाए। वो दुनिया जिसने उसकी नज्मों को कूड़ेदान में बिना पढ़े फेंक दिया। वो दुनिया जिसने उसकी बेकारी बेरोजगारी और मुफलिसी को देखा और उसे देखकर पहचानने तक से इनकार कर दिया। और वही दुनिया जिसने तब एकदम से अपना तौर-तरीका ही बदल दिया, जब देखा कि उसी बेकार, बेरोजगार और मुफलिसी से घिरे शाइर की नज्मों को लोग सीने से लगाए फिरते हैं। उसी दुनिया ने उस गुमनाम शाइर को अपना अजीज बताना शुरू कर दिया। उसके नाम के कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए।

अपनी सारी जिंदगी जो शाइर अपनी एक नज्म छपवाने के लिए अखबार और मैग्जीनों के चक्कर काटता रहा हो उसके लिए अपने नाम की किताबों के छपते देखने से बड़ा सुख क्या हो सकता था। लेकिन उसे यह सुख उस दुनिया के हाथों कबूल नहीं था, जिसने बुरे वक्त में उसे लात मारी थी। फैसला करना मुश्किल था,लेकिन जो फैसला लिया गया उसने मेरा ध्यान आज फिर मां और पाश की सीख की तरफ खींच दिया... 
-"जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं, या तो किसी के हो जाओ
या किसी को अपना बना लो।"
 


-"बीच का रास्ता नहीं होता"

शाइर ने बीच का रास्ता नहीं चुना,  उसने परायी और मतलबी दुनिया को तो अपना बना लिया, लेकिन उसका होना किसी भी सूरत में कबूल नहीं किया। उसने कबूल की गुमनामी की अपनी अलग दुनिया बसाना।
.....और इस तरह हिंदी सिनेमा की एक फिल्म ने इतिहास में हमेशा के लिए अपना नाम दर्ज करवा लिया।

प्यासा

निर्देशक-गुरुदत्त
निर्माता-गुरुदत्त
लेखक-अबरार अल्वी
अभिनय-गुरुदत्त, माला सिन्हा, वहीदा रहमान
...

फिल्में देखना या किताबें पढ़ना मेरे लिए एक नई दुनिया का सफर करने की तरह है। क्योंकि मैं अक्सर अपने घुमक्कड़ी के शौक को पूरा नहीं कर पाती इसलिए समय मिलते ही फिल्में देखती हूं या कोई नई किताब पढ़ना शुरू करती हूं। फिलहाल बात सिर्फ फिल्म की। यह शायद मेरी गलती रही कि अब तक मैंने सिर्फ अपने समय की ही फिल्में देखने पर गौर किया। पिछले कुछ वक्त से कुछ अच्छे लोगों की संगत और सोहबत का असर हुआ कि कुछ पुरानी फिल्में देखने लगी। पाकीजा, मुगल-ए-आजम, तीसरी कसम हाल के ही कुछ दिनों में मैंने देखी हैं। पाकीजा में राजकुमार-मीनाकुमारी की अदायगी और डायलॉग लुभाते हैं तो मुगल-ए-आजम की लंबाई के साथ उसके दर्शकों को बांधे रखने की अदा और तीसरी कसम में भोले-भाले प्यार की अधूरी कहानी। लेकिन इन सब फिल्मों में प्यासा को देखने के बाद लगा कि शायद फिल्में देखकर तृप्त होने की मेरी कोशिश प्यासा देखे बिना प्यासी ही रह जाती। 
इस खूबसूरत फिल्म के लिए गुरुदत्त साहब का शुक्रिया..

एक कबूलनामा
मुझे जानने वाले सभी लोग जानते हैं कि मैं शाहरुख खान को
लेकर थोड़ी दीवानी हूं। इसकी कोई खास वजह नहीं है...यूं भी किसी को पसंद या प्यार करने 
की कोई वजह होती नहीं है...लेकिन प्यासा देखने के बाद जो पहली प्रतिक्रिया मेरे लफ्जों में आई वो यही थी कि .... यार ... गुरुदत्त को मैंने आज तक कभी देखा क्यों नहीं था... ;)

शनिवार, 26 जनवरी 2013

''करियर, प्यार और सेक्स'' किसे इनकार करेंगे आप

इनकार (2013)

प्रोड्यूसर-प्रकाश झा

डायरेक्टर-सुधीर मिश्रा
अर्जुन रामपाल
चित्रांगदा सिंह

तुम और मेरे जैसे लोग, जो प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहते हैं...क्या उनके बीच कुछ मुमकिन है…?... इसका जवाब है ‘’इनकार’’
फिल्म शुरू होती है सेक्सुअल हैरेसमेंट से औऱ खत्म होती है लव कन्फेशन पर। कहानी शुरू होती है बचपन की एक सीख से और खत्म होती है, जवानी के एक सिलसिले पर। कुल मिलाकर देखें तो दो बातें कही जा सकती हैं। या तो कहानी, फिल्म के हिसाब से हल्की थी, या फिल्म ही कहानी पर भारी पड़ गई। इन दो बातों के बावजूद भी इस फिल्म को देखऩे से इनकार नहीं किया जा सकता। सुधीर मिश्रा का डायरेक्शन और अर्जुन-चित्रांगदा की सुपर एक्टिंग के साथ ही फ्रेश कांसेप्ट वाली इस फिल्म को एक बार देखना तो बनता है। अब जब एक बार आप इस फिल्म को देख रहे होते हैं, तो आपको लगता है कि यह फिल्म एक बॉस के अपनी फीमेल एंप्लाई को सेक्सुअल हैरेस करने की कहानी है। यानी ऐसी कहानी, जहां बॉस, एक महिला कर्मी को कॉफी पर मिलने के बहाने होटल में बुलाता है और जबरदस्ती उसके साथ संबंध बनाता है। इस सबके बदले महिला कर्मी को मिलता है प्रमोशन औऱ नौकरी के तयशुदा फायदों से कहीं ज्यादा लाभ। (नोट-हर ऑफिस में बॉस इस तरह की कुछ न कुछ हरकतें जरूर करते हैं वो शारीरिक भी हो सकती हैं, मौखिक भी और ऐसी भी, जिनकी कोई भाषा नहीं है, इसे मद्देनजर रखते हुए हर किसी को अलग-अलग लग सकता है) मगर फिल्म की कहानी में सेक्सुअल हैरेसमेंट का सिर्फ नाम होता है। फिल्म सेक्सुअल हैरेसमेंट के केस की सुनवाई के तीन दिनों में तीन घंटे पूरा करती है और खत्म होने पर पता चलता है कि जिन लोगों के बीच सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस चल रहा होता है, वो दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, हैं और शायद हमेशा करते रहेंगे। जहां प्यार हो फिर वहां कोई केस या कोई तीसरा कुछ नहीं कर सकता। यहीं पर फिल्म खत्म हो जाती है। इसके बावजूद भी लगभग तीन घंटे तक देखते रहने की कई वजह भी इस फिल्म में है। कहानी की लाइन से हटकर भी फिल्म में औरत और आदमी के बीच की अलग-अलग तरह की भावनात्मक कमजोरियों को बारीकी से दिखाया गया है। आज के समय में यह फिल्म हर उस लड़की और औरत को एक बार जरूर देखनी चाहिए, जो जिदंगी में सच में प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहती है। जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करना चाहती है। जो एक औरत होकर भी टीम लीडर बनना चाहती है। सदियों से चली आ रही उस सोच को बदलना चाहती है, जिसके मुताबिक औरतों में किसी बड़ी पोजीशन को संभालने की क्षमता ही नहीं होती। बेशक देश और दुनिया में कई औऱतों ने इस मानसिकता को बदला है, लेकिन आज भी कहीं न कहीं अपनी कुछ भावनात्मक कमजोरियों की वजह से औरत को अच्छी-खासी करियर ग्रोथ को पीछे छोड़ शुरू से शुरू करना पड़ता है। देसी-विदेशी खूबसूरत लोकेशंस की बजाए फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक एड कंपनी के कांफ्रेंस रूम में शूट हुआ है। फिर भी इसमें हिंदुस्तान से लेकर न्यूयॉर्क और लंदन तक बिखरे कुछ ऐसे रगं देखे जा सकते हैं, जो देश और वेश दोनों बदलने पर भी एक जैसे रहते हैं। चिंत्रागदा बार-बार यह कहकर कि ‘’उस वक्त मुझे उस पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसे जाने दिया’’   औऱत औऱ आदमी के बीच बनने वाले विश्वास की एक बहुत महीन लकीर की तरफ देखने को मजबूर करती हैं, जिसे बार-बार पार किया जाता है और प्यार का मामला, सेक्सुअल हैरेसमेंट में बदल जाता है या फिर जिसे आम भाषा में नफरत और ब्रेकअप कह दिया जाता है। क्योंकि यहां सब कुछ एक बॉस और एंप्लोई में हो रहा है, इसलिए कहानी थोड़ी अलग लगती है, लेकिन शायद सच्चाई हर तरह से कुछ इसी तरह की है कि उस वक्त का भरोसा, वक्त के साथ कमजोर क्यों होता जाता है। एक बात और इस पूरी फिल्म को देखने के बाद समझ आती है। जिस पर चाहें तो हंस भी सकते हैं। ज्यादातर फिल्मों मैं जो मैंने देखा है वो यही रहा है कि हीरो के हीरोइन को आई लव यू बोलने में ही इंटरवल हो जाता है और फिल्म के आखिरी सीन में दोनों एक बिस्तर पर होते हैं और लाइट बंद हो जाती है। इस फिल्म ने सोसाइटी के नए लव कल्चर को सामने रखा है। हीरो और हीरोइन एक-दूसरे के बहुत नजदीक आ जाते है। कई बार दोनों बिस्तर पर साथ होते हैं और बत्ती बुझ जाती है। लेकिन एक बार दोनों एक-दूसरे को आई लव यू नहीं बोलते। उनके बीच में प्यार का इजहार होता है आई लवड यू डैमिड...आई लवड यू जैसी भूतकाल की भाषा में। बस प्यार के इस इजहार के साथ सारी सजा, सारी दफा माफ औऱ फिल्म खत्म। रही बात बॉक्स ऑफिस रेटिंग की तो इसे रेटिंग के हिसाब से जज नहीं किया जा सकता। ये शायद हर तरह की ऑडियंस के लिए बनी भी नहीं है। कुछ फिल्मों को देखने के लिए एक समझ चाहिए होती है और कुछ फिल्में खुद-ब-खुद बहुत कुछ समझा देती हैं। इनकार इन दोनों परिस्थितियों को मिलाकर देखी जाने वाली फिल्म है। इसे देखने के लिए एक समझ चाहिए, अगर यह समझ एक दर्शक के तौर पर आपमें है तो फिल्म खुद-ब-खुद आपको राहुल वर्सेज माया के केस की सुनवाई के जरिये सपने और उनकी सीढ़ी वर्सेज प्यार और सेक्स का फर्क दिखा सकती है। इस फर्क को देखने के साथ ही अगर आप फिल्म देख चुके हैं तो उस फर्क को समझना भी जरूरी है जिसमें फिल्मों के हिट और फ्लॉप होने की वजहें बदल रही हैं। इन दिनों कुछ ऐसी भी बॉक्स ऑफिस हिट फिल्में आई हैं, जिनमें न स्टोरी है, न कांसेप्ट, न एक्टिंग। उनमें है सुपरस्टार हीरो, बेहतरीन लोकेशन, आइटम नंबर और तड़कते-भड़कते, नचाते-थिरकाते गाने। इस हिसाब से इनकार में एक कहानी है, जो बेशक अपने सब्जेक्ट के साथ पूरा इंसाफ नहीं कर पाई, लेकिन इसमें किरदार हैं, निर्देशन है, अभिनय है। इस सबसे बढ़कर घिसे-पिटे पुराने फार्मुले या सिक्वल नंबर पर बनने वाली फिल्मों से अलग ये एक नए सब्जेक्ट पर बनी फिल्म है। जहां तक म्यूजिक की बात है तो हजारों ख्वाहिशें ऐसी में सुधीर मिश्रा के साथ शुरुआत करने वाले और परिणिता जैसी फिल्मों के लिए म्यूजिक अवार्ड जीतने वाले शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की टीम का म्यूजिक और लिरिक्स भी इस फिल्म को एक अलग टच देने में कामयाब रहे हैं।






और अंत में
-लड़कों के लिए ध्यान देने वाली एक बात
फ्लर्टेशन जब औरत को पसंद न हो तो वो हैरेसमेंट बन जाता है
-लड़कियों को समझना चाहिए
इनकार करने से पहले ये न सोचें कि कहीं मैं ओवर रिएक्ट तो नहीं कर रही! क्योंकि बाद में इनकार करने पर उसे सचमुच में ओवर रिएक्शन समझकर दरकिनार कर दिया जाता है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

बलात्कार क्यों...


''बलात्कार, पुरुष कामुकता की न‌िरंतरता का एक चरम अंत है। पुरुषों में साथी तलाशने की चाहत मह‌िलाओं से ज्यादा प्रबल और अव‌िवेकी होती है। पुरुष इसके ल‌िए कई तरह से अपनी इच्छा को मह‌िलाओं के सामने रखते हैं। जब उनकी ये कामनाएं पूरी नहीं होती तो उनकी इच्छा पूर्त‌ि का एकमात्र साधन बलात्कार बचता है''
-स्टीवन प‌िंकर (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से ली गई टिप्पणी)
पिछले कई दिनों से बार-बार ये सवाल दिमाग में कौंध रहा था क‌ि कोई आदमी बलात्कार क्यों करता है? अगर इसका जवाब सिर्फ इतना है कि सेक्स इच्छा की पूर्त‌ि के लिए बलात्कार किया जाता है तो इसके सामने फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं। 
पहला सवाल ये कि यह इच्छा किसी खास तबके या व्यक्ति में तो नहीं होती। दुनिया के हर आदमी में यह इच्छा कभी न कभी पैदा होती है, हर कोई बलात्कार करने लग जाए तो?  
दूसरा यह कि क्या सिर्फ एक इच्छा को पूरा करने के ल‌िए कोई इस हद तक गिर सकता है
हार्वर्ड व‌िश्वव‌िद्यालय में मनोव‌िज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन प‌िंकर की हाल ही में सामने आई टिप्पणी जिस तरह से मेरे इन सवालों का जवाब देती है वो संतोषजनक तो नहीं है, लेकिन एक वजह को सामने जरूर रखती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि दरिंदगी को किसी का मनोवैज्ञानिक विकार समझकर किसी भी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है। जहां तक मेरी समझ की बात है तो
बिना ज्यादा पड़ताल किए और सोचे-समझे, मेरे लिए बलात्कार का जो पहला मतलब सामने आता है, वह है किसी के साथ अनैच्छिक या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की घटना। लेकिन कुछ लोगों से बातचीत के दौरान और कुछ चीजें पढ़ते हुए जो परतें खुल रही हैं, उनसे यह घटना सिर्फ इतनी सी है नहीं। 
कई दफा मुझे लगता था कि हमारे देश में बलात्कार के इतने मामले ‌सामने आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि यहां सेक्स नामक शब्द को जुबां पर लाने को भी बहुत बुरा माना जाता है। इसके बारे में सोचना और करना इतना गुप्त होता है कि किसका, कब, कहां और कितनी बार बलात्कार हो चुका है, इसके सही आंकड़ें शायद यहां कभी जुटाए ही न जा सकें। शरीर से जुड़ी इच्छा, भावना और जरूरत के इसी दमन की वजह हो सकता है बलात्कार। लेकिन एक दिन पहले बीबीसी पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट को पढ़कर ये भ्रम भी टूट गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन में बलात्कार के बढ़ते मामलों के बारे में है। रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में हर साल औसतन चार लाख 73 हज़ार सेक्स अपराध होते हैं। इनमें पुरूषों के साथ होनेवाले अपराध भी शामिल हैं, मगर बहुतायत महिलाओं के साथ हुए अपराध है। इनमें हर साल बलात्कार की संख्या 60 हज़ार से 95 हज़ार तक होती है। यानी आँकड़ों को मानें, तो इंग्लैंड-वेल्स में भारत से दोगुना से भी ज़्यादा बलात्कार होते हैं। इसका मतलब समाज में खुलापन और शारीरिक इच्छाओं की खुलेआम पूर्त‌ि भी इस समस्या का हल नहीं है। बलात्कार की घटनाओं को देखने-सुनने की इस कड़ी में मेरे बढ़ते कंफ्यूजन की एक वजह तमाम बुद्धिजीवियों और जाने-माने लोगों के बेतुके बयान भी हैं। छत्तीसगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बैस ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन अगर कोई इस तरह की हरकत नाबालिग के साथ करे तो उसे फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। इस बयान को सुनने के बाद बयानबाजी की जो राजनीति शुरू हुई वो तो अपने नियत कार्यक्रम के तहत जारी है ही। लेकिन मुद्दा यहां फिर सवालों पर आकर खड़ा हो जाता है कि औरतों के साथ बलात्कार अगर इतनी ही सामान्य घटना है तो फिर इस पर ‌इतना हो हल्ला क्यों? फिर सवाल ये भी है कि नाबालिग से बलात्कार के लिए आदमी की कौन सी प्रबल इच्छा जिम्मेदार है?
बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की। ''महिलाएं छोटे और भड़काऊ कपड़े न पहनें''  गोया पुराने जमाने में तो औरतें सिर से पैर तक ढकी होती थी। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि ''लड़कियों के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए'', गोया कि मोबाइल ही किसी आदमी को बलात्कार के सिग्नल प्रेषित करता है। ''उन्हें हमेशा किसी रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलना चाहिए'' गोया आज तक कभी रिश्तेदारी में किसी ने किसी का बलात्कार किया ही न हो। गोया इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले लोगों ने उन खबरों की तरफ कोई ध्यान ही न दिया हो, जब एक बाप अपनी बेटी की इज्जत लूटकर फरार पाया गया। घटनाएं चाहें कितनी ही सामने क्यों न आए। बहस का मुद्दा हमेशा आदमी की इच्छा और औरत की चरित्रहीनता पर खत्म होता है। 
क्या शरीर से जुड़ी कोई इच्छा, जरूरत या चाहत औरत के भीतर नहीं होती?
क्या कभी उसकी इच्छा और कामना अपने चरम पर नहीं पहुंचती?
क्या कभी औरत को पुरुष के ज्यादा अच्छे और स्मार्ट दिखने या हंस-बोलकर बात करने से गलत सिग्नल नहीं मिलते?
अगर ये सब औरत के साथ भी होता है। और अगर कुछ लोगों का सामना इस सच्चाई से भी हुआ है कि आदमियों का भी बलात्कार किया जाता है तो अंत में शायद बात प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के उस तर्क पर ही आकर खत्म होती है, जिसमें उन्होंने आदमियों में कमुकता के स्तर को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बताया है। 
लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर इच्छाओं का दमभर कर किसी अपराध और दरिंदगी को जायज ठहराया जा सकता तो अदालत, सजा और न्याय नाम के शब्द पैदा ही न हुए होते। यह मुद्दा अपराध,सजा और न्याय का तो है ही लेकिन भविष्य में इससे निपटने और इससे बचने के लिए ''आदमी, औरत और सेक्स'' की गुत्थी को भी सुलझाने की जरूरत होगी।




कमजोरी

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