मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला...

मां को एक बार कहते सुना था, ‘’जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं, या तो किसी के हो जाओ या किसी को अपना बना लो।‘’ 
 
फिर जब कविताएं पढ़ने का शौक जोश-खरोश से पूरा करने लगी तो मशहूर कवि पाश की एक कविता पढ़ी,
‘’बीच का रास्ता नहीं होता‘’

मां और पाश दोनों की ही बात से साफ है कि हम किसी एक ही तरफ होते हैं या तो ‘’हां ‘’ या तो ‘’ना‘’। या तो डूबना या तो तरना। मगर अफसोस मेरे अनुभव में इन दोनों अजीजों की यह सीख जिंदगी से बहुत मेल नहीं खा पाती। अक्सर ऐसा होता है कि न तो हम किसी को अपना बना पाते हैं पूरी तरह, न किसी के हो पाते हैं पूरी तरह। अक्सर ऐसा होता है कि जिंदगी बीच का ही कोई रास्ता अख्तियार कर लेती है और हम ना-ना करते हुए भी उसी बीच के रास्ते पर अपनी खुशियों की मंजिल बना लेते हैं। अक्सर यह फैसला करना काफी मुश्किल होता है कि हमें किसी एक तरफ जाना है या फिर बीच का ही कोई रास्ता निकालना है।





कई सालों पहले एक शाइर की जिंदगी में भी ऐसा ही मोड़ आया जब उसे किसी एक को चुनना था, या तो वो मतलब की दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल ले और मशहूर हो जाए या फिर ऐसी दुनिया को छोड़कर अपनी अलग एक गुमनाम दुनिया बसा ले। अबरार अल्वी चाहते थे कि वह शाइर दुनिया के हिसाब से ढल जाए और गुमनामी की बजाय दुनिया के इस बदलाव को स्वीकार करके मशहूर हो जाए। वो दुनिया जिसने उसकी नज्मों को कूड़ेदान में बिना पढ़े फेंक दिया। वो दुनिया जिसने उसकी बेकारी बेरोजगारी और मुफलिसी को देखा और उसे देखकर पहचानने तक से इनकार कर दिया। और वही दुनिया जिसने तब एकदम से अपना तौर-तरीका ही बदल दिया, जब देखा कि उसी बेकार, बेरोजगार और मुफलिसी से घिरे शाइर की नज्मों को लोग सीने से लगाए फिरते हैं। उसी दुनिया ने उस गुमनाम शाइर को अपना अजीज बताना शुरू कर दिया। उसके नाम के कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए।

अपनी सारी जिंदगी जो शाइर अपनी एक नज्म छपवाने के लिए अखबार और मैग्जीनों के चक्कर काटता रहा हो उसके लिए अपने नाम की किताबों के छपते देखने से बड़ा सुख क्या हो सकता था। लेकिन उसे यह सुख उस दुनिया के हाथों कबूल नहीं था, जिसने बुरे वक्त में उसे लात मारी थी। फैसला करना मुश्किल था,लेकिन जो फैसला लिया गया उसने मेरा ध्यान आज फिर मां और पाश की सीख की तरफ खींच दिया... 
-"जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं, या तो किसी के हो जाओ
या किसी को अपना बना लो।"
 


-"बीच का रास्ता नहीं होता"

शाइर ने बीच का रास्ता नहीं चुना,  उसने परायी और मतलबी दुनिया को तो अपना बना लिया, लेकिन उसका होना किसी भी सूरत में कबूल नहीं किया। उसने कबूल की गुमनामी की अपनी अलग दुनिया बसाना।
.....और इस तरह हिंदी सिनेमा की एक फिल्म ने इतिहास में हमेशा के लिए अपना नाम दर्ज करवा लिया।

प्यासा

निर्देशक-गुरुदत्त
निर्माता-गुरुदत्त
लेखक-अबरार अल्वी
अभिनय-गुरुदत्त, माला सिन्हा, वहीदा रहमान
...

फिल्में देखना या किताबें पढ़ना मेरे लिए एक नई दुनिया का सफर करने की तरह है। क्योंकि मैं अक्सर अपने घुमक्कड़ी के शौक को पूरा नहीं कर पाती इसलिए समय मिलते ही फिल्में देखती हूं या कोई नई किताब पढ़ना शुरू करती हूं। फिलहाल बात सिर्फ फिल्म की। यह शायद मेरी गलती रही कि अब तक मैंने सिर्फ अपने समय की ही फिल्में देखने पर गौर किया। पिछले कुछ वक्त से कुछ अच्छे लोगों की संगत और सोहबत का असर हुआ कि कुछ पुरानी फिल्में देखने लगी। पाकीजा, मुगल-ए-आजम, तीसरी कसम हाल के ही कुछ दिनों में मैंने देखी हैं। पाकीजा में राजकुमार-मीनाकुमारी की अदायगी और डायलॉग लुभाते हैं तो मुगल-ए-आजम की लंबाई के साथ उसके दर्शकों को बांधे रखने की अदा और तीसरी कसम में भोले-भाले प्यार की अधूरी कहानी। लेकिन इन सब फिल्मों में प्यासा को देखने के बाद लगा कि शायद फिल्में देखकर तृप्त होने की मेरी कोशिश प्यासा देखे बिना प्यासी ही रह जाती। 
इस खूबसूरत फिल्म के लिए गुरुदत्त साहब का शुक्रिया..

एक कबूलनामा
मुझे जानने वाले सभी लोग जानते हैं कि मैं शाहरुख खान को
लेकर थोड़ी दीवानी हूं। इसकी कोई खास वजह नहीं है...यूं भी किसी को पसंद या प्यार करने 
की कोई वजह होती नहीं है...लेकिन प्यासा देखने के बाद जो पहली प्रतिक्रिया मेरे लफ्जों में आई वो यही थी कि .... यार ... गुरुदत्त को मैंने आज तक कभी देखा क्यों नहीं था... ;)

शनिवार, 26 जनवरी 2013

''करियर, प्यार और सेक्स'' किसे इनकार करेंगे आप

इनकार (2013)

प्रोड्यूसर-प्रकाश झा

डायरेक्टर-सुधीर मिश्रा
अर्जुन रामपाल
चित्रांगदा सिंह

तुम और मेरे जैसे लोग, जो प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहते हैं...क्या उनके बीच कुछ मुमकिन है…?... इसका जवाब है ‘’इनकार’’
फिल्म शुरू होती है सेक्सुअल हैरेसमेंट से औऱ खत्म होती है लव कन्फेशन पर। कहानी शुरू होती है बचपन की एक सीख से और खत्म होती है, जवानी के एक सिलसिले पर। कुल मिलाकर देखें तो दो बातें कही जा सकती हैं। या तो कहानी, फिल्म के हिसाब से हल्की थी, या फिल्म ही कहानी पर भारी पड़ गई। इन दो बातों के बावजूद भी इस फिल्म को देखऩे से इनकार नहीं किया जा सकता। सुधीर मिश्रा का डायरेक्शन और अर्जुन-चित्रांगदा की सुपर एक्टिंग के साथ ही फ्रेश कांसेप्ट वाली इस फिल्म को एक बार देखना तो बनता है। अब जब एक बार आप इस फिल्म को देख रहे होते हैं, तो आपको लगता है कि यह फिल्म एक बॉस के अपनी फीमेल एंप्लाई को सेक्सुअल हैरेस करने की कहानी है। यानी ऐसी कहानी, जहां बॉस, एक महिला कर्मी को कॉफी पर मिलने के बहाने होटल में बुलाता है और जबरदस्ती उसके साथ संबंध बनाता है। इस सबके बदले महिला कर्मी को मिलता है प्रमोशन औऱ नौकरी के तयशुदा फायदों से कहीं ज्यादा लाभ। (नोट-हर ऑफिस में बॉस इस तरह की कुछ न कुछ हरकतें जरूर करते हैं वो शारीरिक भी हो सकती हैं, मौखिक भी और ऐसी भी, जिनकी कोई भाषा नहीं है, इसे मद्देनजर रखते हुए हर किसी को अलग-अलग लग सकता है) मगर फिल्म की कहानी में सेक्सुअल हैरेसमेंट का सिर्फ नाम होता है। फिल्म सेक्सुअल हैरेसमेंट के केस की सुनवाई के तीन दिनों में तीन घंटे पूरा करती है और खत्म होने पर पता चलता है कि जिन लोगों के बीच सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस चल रहा होता है, वो दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, हैं और शायद हमेशा करते रहेंगे। जहां प्यार हो फिर वहां कोई केस या कोई तीसरा कुछ नहीं कर सकता। यहीं पर फिल्म खत्म हो जाती है। इसके बावजूद भी लगभग तीन घंटे तक देखते रहने की कई वजह भी इस फिल्म में है। कहानी की लाइन से हटकर भी फिल्म में औरत और आदमी के बीच की अलग-अलग तरह की भावनात्मक कमजोरियों को बारीकी से दिखाया गया है। आज के समय में यह फिल्म हर उस लड़की और औरत को एक बार जरूर देखनी चाहिए, जो जिदंगी में सच में प्यार के अलावा और भी बहुत कुछ चाहती है। जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करना चाहती है। जो एक औरत होकर भी टीम लीडर बनना चाहती है। सदियों से चली आ रही उस सोच को बदलना चाहती है, जिसके मुताबिक औरतों में किसी बड़ी पोजीशन को संभालने की क्षमता ही नहीं होती। बेशक देश और दुनिया में कई औऱतों ने इस मानसिकता को बदला है, लेकिन आज भी कहीं न कहीं अपनी कुछ भावनात्मक कमजोरियों की वजह से औरत को अच्छी-खासी करियर ग्रोथ को पीछे छोड़ शुरू से शुरू करना पड़ता है। देसी-विदेशी खूबसूरत लोकेशंस की बजाए फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक एड कंपनी के कांफ्रेंस रूम में शूट हुआ है। फिर भी इसमें हिंदुस्तान से लेकर न्यूयॉर्क और लंदन तक बिखरे कुछ ऐसे रगं देखे जा सकते हैं, जो देश और वेश दोनों बदलने पर भी एक जैसे रहते हैं। चिंत्रागदा बार-बार यह कहकर कि ‘’उस वक्त मुझे उस पर भरोसा था, इसलिए मैंने उसे जाने दिया’’   औऱत औऱ आदमी के बीच बनने वाले विश्वास की एक बहुत महीन लकीर की तरफ देखने को मजबूर करती हैं, जिसे बार-बार पार किया जाता है और प्यार का मामला, सेक्सुअल हैरेसमेंट में बदल जाता है या फिर जिसे आम भाषा में नफरत और ब्रेकअप कह दिया जाता है। क्योंकि यहां सब कुछ एक बॉस और एंप्लोई में हो रहा है, इसलिए कहानी थोड़ी अलग लगती है, लेकिन शायद सच्चाई हर तरह से कुछ इसी तरह की है कि उस वक्त का भरोसा, वक्त के साथ कमजोर क्यों होता जाता है। एक बात और इस पूरी फिल्म को देखने के बाद समझ आती है। जिस पर चाहें तो हंस भी सकते हैं। ज्यादातर फिल्मों मैं जो मैंने देखा है वो यही रहा है कि हीरो के हीरोइन को आई लव यू बोलने में ही इंटरवल हो जाता है और फिल्म के आखिरी सीन में दोनों एक बिस्तर पर होते हैं और लाइट बंद हो जाती है। इस फिल्म ने सोसाइटी के नए लव कल्चर को सामने रखा है। हीरो और हीरोइन एक-दूसरे के बहुत नजदीक आ जाते है। कई बार दोनों बिस्तर पर साथ होते हैं और बत्ती बुझ जाती है। लेकिन एक बार दोनों एक-दूसरे को आई लव यू नहीं बोलते। उनके बीच में प्यार का इजहार होता है आई लवड यू डैमिड...आई लवड यू जैसी भूतकाल की भाषा में। बस प्यार के इस इजहार के साथ सारी सजा, सारी दफा माफ औऱ फिल्म खत्म। रही बात बॉक्स ऑफिस रेटिंग की तो इसे रेटिंग के हिसाब से जज नहीं किया जा सकता। ये शायद हर तरह की ऑडियंस के लिए बनी भी नहीं है। कुछ फिल्मों को देखने के लिए एक समझ चाहिए होती है और कुछ फिल्में खुद-ब-खुद बहुत कुछ समझा देती हैं। इनकार इन दोनों परिस्थितियों को मिलाकर देखी जाने वाली फिल्म है। इसे देखने के लिए एक समझ चाहिए, अगर यह समझ एक दर्शक के तौर पर आपमें है तो फिल्म खुद-ब-खुद आपको राहुल वर्सेज माया के केस की सुनवाई के जरिये सपने और उनकी सीढ़ी वर्सेज प्यार और सेक्स का फर्क दिखा सकती है। इस फर्क को देखने के साथ ही अगर आप फिल्म देख चुके हैं तो उस फर्क को समझना भी जरूरी है जिसमें फिल्मों के हिट और फ्लॉप होने की वजहें बदल रही हैं। इन दिनों कुछ ऐसी भी बॉक्स ऑफिस हिट फिल्में आई हैं, जिनमें न स्टोरी है, न कांसेप्ट, न एक्टिंग। उनमें है सुपरस्टार हीरो, बेहतरीन लोकेशन, आइटम नंबर और तड़कते-भड़कते, नचाते-थिरकाते गाने। इस हिसाब से इनकार में एक कहानी है, जो बेशक अपने सब्जेक्ट के साथ पूरा इंसाफ नहीं कर पाई, लेकिन इसमें किरदार हैं, निर्देशन है, अभिनय है। इस सबसे बढ़कर घिसे-पिटे पुराने फार्मुले या सिक्वल नंबर पर बनने वाली फिल्मों से अलग ये एक नए सब्जेक्ट पर बनी फिल्म है। जहां तक म्यूजिक की बात है तो हजारों ख्वाहिशें ऐसी में सुधीर मिश्रा के साथ शुरुआत करने वाले और परिणिता जैसी फिल्मों के लिए म्यूजिक अवार्ड जीतने वाले शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की टीम का म्यूजिक और लिरिक्स भी इस फिल्म को एक अलग टच देने में कामयाब रहे हैं।






और अंत में
-लड़कों के लिए ध्यान देने वाली एक बात
फ्लर्टेशन जब औरत को पसंद न हो तो वो हैरेसमेंट बन जाता है
-लड़कियों को समझना चाहिए
इनकार करने से पहले ये न सोचें कि कहीं मैं ओवर रिएक्ट तो नहीं कर रही! क्योंकि बाद में इनकार करने पर उसे सचमुच में ओवर रिएक्शन समझकर दरकिनार कर दिया जाता है।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

बलात्कार क्यों...


''बलात्कार, पुरुष कामुकता की न‌िरंतरता का एक चरम अंत है। पुरुषों में साथी तलाशने की चाहत मह‌िलाओं से ज्यादा प्रबल और अव‌िवेकी होती है। पुरुष इसके ल‌िए कई तरह से अपनी इच्छा को मह‌िलाओं के सामने रखते हैं। जब उनकी ये कामनाएं पूरी नहीं होती तो उनकी इच्छा पूर्त‌ि का एकमात्र साधन बलात्कार बचता है''
-स्टीवन प‌िंकर (नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक लेख से ली गई टिप्पणी)
पिछले कई दिनों से बार-बार ये सवाल दिमाग में कौंध रहा था क‌ि कोई आदमी बलात्कार क्यों करता है? अगर इसका जवाब सिर्फ इतना है कि सेक्स इच्छा की पूर्त‌ि के लिए बलात्कार किया जाता है तो इसके सामने फिर कुछ सवाल खड़े हो जाते हैं। 
पहला सवाल ये कि यह इच्छा किसी खास तबके या व्यक्ति में तो नहीं होती। दुनिया के हर आदमी में यह इच्छा कभी न कभी पैदा होती है, हर कोई बलात्कार करने लग जाए तो?  
दूसरा यह कि क्या सिर्फ एक इच्छा को पूरा करने के ल‌िए कोई इस हद तक गिर सकता है
हार्वर्ड व‌िश्वव‌िद्यालय में मनोव‌िज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन प‌िंकर की हाल ही में सामने आई टिप्पणी जिस तरह से मेरे इन सवालों का जवाब देती है वो संतोषजनक तो नहीं है, लेकिन एक वजह को सामने जरूर रखती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि दरिंदगी को किसी का मनोवैज्ञानिक विकार समझकर किसी भी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है। जहां तक मेरी समझ की बात है तो
बिना ज्यादा पड़ताल किए और सोचे-समझे, मेरे लिए बलात्कार का जो पहला मतलब सामने आता है, वह है किसी के साथ अनैच्छिक या जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए जाने की घटना। लेकिन कुछ लोगों से बातचीत के दौरान और कुछ चीजें पढ़ते हुए जो परतें खुल रही हैं, उनसे यह घटना सिर्फ इतनी सी है नहीं। 
कई दफा मुझे लगता था कि हमारे देश में बलात्कार के इतने मामले ‌सामने आने की एक वजह ये भी हो सकती है कि यहां सेक्स नामक शब्द को जुबां पर लाने को भी बहुत बुरा माना जाता है। इसके बारे में सोचना और करना इतना गुप्त होता है कि किसका, कब, कहां और कितनी बार बलात्कार हो चुका है, इसके सही आंकड़ें शायद यहां कभी जुटाए ही न जा सकें। शरीर से जुड़ी इच्छा, भावना और जरूरत के इसी दमन की वजह हो सकता है बलात्कार। लेकिन एक दिन पहले बीबीसी पर प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट को पढ़कर ये भ्रम भी टूट गया। यह रिपोर्ट ब्रिटेन में बलात्कार के बढ़ते मामलों के बारे में है। रिपोर्ट के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में हर साल औसतन चार लाख 73 हज़ार सेक्स अपराध होते हैं। इनमें पुरूषों के साथ होनेवाले अपराध भी शामिल हैं, मगर बहुतायत महिलाओं के साथ हुए अपराध है। इनमें हर साल बलात्कार की संख्या 60 हज़ार से 95 हज़ार तक होती है। यानी आँकड़ों को मानें, तो इंग्लैंड-वेल्स में भारत से दोगुना से भी ज़्यादा बलात्कार होते हैं। इसका मतलब समाज में खुलापन और शारीरिक इच्छाओं की खुलेआम पूर्त‌ि भी इस समस्या का हल नहीं है। बलात्कार की घटनाओं को देखने-सुनने की इस कड़ी में मेरे बढ़ते कंफ्यूजन की एक वजह तमाम बुद्धिजीवियों और जाने-माने लोगों के बेतुके बयान भी हैं। छत्तीसगढ़ से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रमेश बैस ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी लड़कियों या औरतों के साथ बलात्कार समझ में आता है, लेकिन अगर कोई इस तरह की हरकत नाबालिग के साथ करे तो उसे फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। इस बयान को सुनने के बाद बयानबाजी की जो राजनीति शुरू हुई वो तो अपने नियत कार्यक्रम के तहत जारी है ही। लेकिन मुद्दा यहां फिर सवालों पर आकर खड़ा हो जाता है कि औरतों के साथ बलात्कार अगर इतनी ही सामान्य घटना है तो फिर इस पर ‌इतना हो हल्ला क्यों? फिर सवाल ये भी है कि नाबालिग से बलात्कार के लिए आदमी की कौन सी प्रबल इच्छा जिम्मेदार है?
बलात्कार की घटनाओं के बाद लोगों ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर भी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जाहिर की। ''महिलाएं छोटे और भड़काऊ कपड़े न पहनें''  गोया पुराने जमाने में तो औरतें सिर से पैर तक ढकी होती थी। किसी ने तो यहां तक कह दिया कि ''लड़कियों के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए'', गोया कि मोबाइल ही किसी आदमी को बलात्कार के सिग्नल प्रेषित करता है। ''उन्हें हमेशा किसी रिश्तेदार के साथ ही बाहर निकलना चाहिए'' गोया आज तक कभी रिश्तेदारी में किसी ने किसी का बलात्कार किया ही न हो। गोया इस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले लोगों ने उन खबरों की तरफ कोई ध्यान ही न दिया हो, जब एक बाप अपनी बेटी की इज्जत लूटकर फरार पाया गया। घटनाएं चाहें कितनी ही सामने क्यों न आए। बहस का मुद्दा हमेशा आदमी की इच्छा और औरत की चरित्रहीनता पर खत्म होता है। 
क्या शरीर से जुड़ी कोई इच्छा, जरूरत या चाहत औरत के भीतर नहीं होती?
क्या कभी उसकी इच्छा और कामना अपने चरम पर नहीं पहुंचती?
क्या कभी औरत को पुरुष के ज्यादा अच्छे और स्मार्ट दिखने या हंस-बोलकर बात करने से गलत सिग्नल नहीं मिलते?
अगर ये सब औरत के साथ भी होता है। और अगर कुछ लोगों का सामना इस सच्चाई से भी हुआ है कि आदमियों का भी बलात्कार किया जाता है तो अंत में शायद बात प्रोफेसर स्टीवन पिंकर के उस तर्क पर ही आकर खत्म होती है, जिसमें उन्होंने आदमियों में कमुकता के स्तर को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बताया है। 
लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक स्तर पर इच्छाओं का दमभर कर किसी अपराध और दरिंदगी को जायज ठहराया जा सकता तो अदालत, सजा और न्याय नाम के शब्द पैदा ही न हुए होते। यह मुद्दा अपराध,सजा और न्याय का तो है ही लेकिन भविष्य में इससे निपटने और इससे बचने के लिए ''आदमी, औरत और सेक्स'' की गुत्थी को भी सुलझाने की जरूरत होगी।




शनिवार, 29 दिसंबर 2012

लड़की 'हो' ना

जब इस बात का अहसास होना शुरू हुआ कि मैं लड़की हूं, तब सब कुछ इतना बुरा नहीं था। मगर जिन दिनों से उन नियमों ने मेरे दिमाग में जगह बनाई, जिन पर चलने की सीख मुझे दी जाने लगी, क्योंकि मैं एक लड़की थी, तब से सब कुछ काफी बुरा लगने लगा। यहां तक कि तब से मुझे अपना लड़की होना ही बुरा लगने लगा। उन दिनों के बाद से दुनिया भर के हसीन ख्वाबों और ख्यालों के बीच एक ख्वाहिश मेरे दिल में हमेशा कसमसाती रहती थी कि काश! मैं लड़का होती।
लड़का होती तो दादी ने मां के साथ बुरा व्यवहार न किया होता।
लड़का होती तो घर वालों के मन में एक अजीब सी असुरक्षा की भावना न होती।
लड़का होती तो मां को भविष्य इतना धुंधला और कमजोर न दिखता।
लड़का होती तो देर तक बाहर घूमती।
लड़का होती तो बिना बताए घर से चली जाती।
लड़का होती तो शराब के हर एक घुंट के साथ जिंदगी को आसान बना लेती।
लड़का होती तो सिगरेट के कश भरती और हर फिक्र को धुएं में उड़ा देती।
लड़का होती तो ऑफिस से घर जाने की जल्दी न करनी पड़ती।
लड़का होती तो नाइट रिपोर्टिंग करती।
लड़का होती तो रेड लाइट एरिया में जाकर उनकी जिंदगी करीब से देख सकती।
लड़का होती तो इस बात का इंतजार न करना पड़ता कि कोई लड़का आएगा और मेरी जिदंगी की हर तकलीफ को कम कर देगा हर पहेली को सुलझा देगा।
लड़का होती तो ये.... लड़का होती तो वो....
आज भी बेशक मैं लड़की होने पर फक्र नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे अंदर की लड़की कहीं घुट रही है।
मगर मैं अब कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर लड़का होने का मतलब लड़की होने के असित्त्व को बार-बार तार-तार करना रह गया है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
अगर कभी बाप, कभी भाई, कभी बेटे और कभी किसी मनचले के रूप में लड़कों की मर्दानगी का मतलब लड़कियों की मौत के तौर पर ही सामने आता है तो मैं कभी लड़का नहीं होना चाहती।
और  ये जानते-समझते हुए भी कि हर शख्स एक जैसा नहीं होता, हालात बार-बार मुझे झकझोर रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं कि मैं किसी मर्द पर भरोसा न करूं और अपने विश्वास को फौरन हर आदमी पर से चलता कर दूं.......
या फिर मैं नहीं समझ पा रही कि उसकी कुर्बानी का मोल किस तरह अदा करूं
आखिर में मैं एक लड़की हूं औऱ नहीं चाहती कि अपनी जिंदगी में फिर कभी किसी लड़की की ऐसी कुर्बानी की साक्षी बनूं। 

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

फांसी फांसी फांसी


 24 साल के इस सफर में ज‌िंदगी ने कई बार उलझाया। कई बार हालात के दलदल में फंसाया। कई मरतबा ऐसा हुआ ‌क‌ि सोचने और समझने की ताकत नहीं रही। ‌फ‌िर भी बीते कुछ द‌िनों में मेरे सामने आने वाली चीजें न जाने क्यों मुझे हर बीती हुई मुश्क‌िल से भी ज्यादा कठ‌िन लगी। हाथ में कागज, कलम, लेपटॉप कुछ नहीं था और मन में शब्दों का तेज ज्वार भाटा। मैंने क‌िसी दोस्त का फोन नहीं ल‌िया, क‌िसी से बात नहीं की। न टीवी, न रेड‌ियो, न अखबार कुछ नहीं था पास। कुछ मालूम नहीं था क‌ि दुन‌िया में हो क्या रहा है। द‌िख रहा था तो बस इतना क‌ि ज‌िंदगी में जो हो रहा है वो नहीं होना चाह‌िए। हो रहा है तो उसका हल म‌िलना चाह‌िए। मगर कुछ नहीं म‌िला। ज‌िस पटरी पर चलते-चलते गाड़ी रुक गई थी, उस पर बहुत देर रुकी रहने के बाद फ‌िर से घ‌िसटने लगी। अब कोई सोचे क‌ि ऐसा भी क्या मामला था तो इस बारे में मैं कुछ नहीं ल‌िख सकती। मुझे हमेशा से लगता आया है क‌ि अपनी न‌िजी ज‌िंदगी और पार‌िवार‌िक मसलों के बारे में दूसरों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाह‌िए। लगता आया है या मां की सीख का असर है शायद। मैं इतना सब भी नहीं ल‌िखती... अगर तीन बाद अखबार देखते ही मेरे सामने दर‌िंदगी की वो घटना न आई होती। 
मैं स्तब्ध थी पढ़कर। 
नहीं महसूस कर सकती क‌ि वो कैसी होगी सहकर।  
मैं बहुत भावुक हूं। बहुत कुछ ल‌िखती व‌िखती रहती हूं, ले‌क‌िन मेरे अंदर उठ रहा शब्दों का सारा ज्वार भाटा अचानक आकाश और धरती के बीच ही कहीं अपनी जगह बनाकर रुक गया है। 
जैसे बचपन में हम दोस्तों को स्टेच्यू बोलकर कई देर के ल‌िए ज्यों का त्यों छोड़ देते थे। 
मेरी भावनाएं ऐसे सूख गई हैं जैसे उड़ीसा के कालाहांडी का अकाल। 
न मैं कैंडल मार्च कर सकती हूं। 
न हाथ में पोस्टर लेकर च‌िल्ला सकती हूं। 

मेरा कुछ भी ल‌िखना या करना इस स्थ‌ित‌ि के ल‌िए शायद क‌िसी काम का नहीं है। 
मगर इतना कहना जरूरी लगता है क‌ि 
प्रताड़ना के इस शोर के बीच क्या अपराध‌ियों को सजा की मांग या उससे जु़ड़ी क‌िसी च‌िल्लाहट की गुंजाइश बचती है?
क्या चोट पहुंचाने वाले से पूछने के बाद उसे मारा जाता है?
क्या इस देश में ज‌िसे भारत कहते हैं स‌िर्फ खोखली भावनाओं का लबादा ओढ़ने की ताकत है या फ‌िर वो ह‌िम्मत भी ज‌िसके दम पर क‌िसी को इंसाफ म‌िल सके और दु्न‌िया को सबक।
मेरी आंखों के सामने ऐसे कई सवालों का बहुत बड़ा घेरा है। ऐसे सवाल, ‌ज‌िनके जवाबों पर पुल‌िस, पार्टी, पॉल‌‌िट‌िक्स और प्रशासन की न जाने क‌ितनी मकड़‌ियां बैठी हैं।
मगर मैं अब स‌िर्फ एक लाइव सीन देखना चाहती हूं। 
ज‌िसमें लाइट कैमरा और एक्शन बोलेत ही अपराधी के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली जाए। फंदा उसके गले के ऊपरी छोर को छूकर बाहर न‌िकलने की कोश‌िश करे, मगर न‌िकल न पाए।  

रविवार, 2 दिसंबर 2012

दो रूठे हुए मुल्कों की हंसी ठ‌िठोली


21 नवंबर की जिस सुबह पूना की जेल में कसाब ने खुदा से अंतिम माफी मांगी,ठीक उसी दोपहर दिल्ली में प्रगति मैदान के व्यापार मेले में पाकिस्तान के उस्मान रियाज ने कहा,'' हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं'' एक मुल्क, एक मजहब लेकिन मकसद बदलते हैं तो जिंदगी का रवैय्या भी बदल जाता है। कसाब आतंक का व्यापारी था,उस्मान रियाज रेशमी रूमाल लेकर व्यापार मेले में आया था। एक के पास नफरत की पूंजी और दूसरे के पास महीन कारीगरी की एक ऐसी मिसाल, जिसे चाहने वाले उधर भी हैं और इधर भी। दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में पाकिस्तान के सौदागरों के चेहरे पर एक दर्द था तो उनसे सौदा खरीदने आए कई लोगों पर भी उसी दर्द की छाप थी। दो मुल्कों के एक से दर्द की यह कहानी नई तो नहीं, लेकिन 65 साल पहले दुनिया के भूगोल पर खिंची गई रेखा बीतते वक्त के साथ मिट नहीं रही, और पुख्ता हो रही है-"क्या अलग है, मैडम? एक जैसा कल्चर है। एक जैसी भाषा है। नेताओं ने दूर कर दिया है बस। दोनों मुल्क एक ही हैं, क्या हिंदुस्तान और क्या पाकिस्तान।"पाकिस्तानी से आए रफीक लखानी ने बिभाजन का वक्त तो नहीं देखा, लेकिन बाद की पीड़ा को जरूर महसूस किया है। कुछ दिन पहले ही हिंदुस्तान आए रफीक ने कराची से सटे अपने गांव में लोगों को अपने रिश्तेदारों के लिए रोते देखा है, जो बिभाजन में इधर आ गए। अपने सामानों को वेचते हुए वे व्यापारी जिस गर्मजोशी से मिल रहे थे, उससे कहीं नहीं लगता था कि ये सौदेबाजी ऐसे लोगों के बीच हो रही है, जिनके मुल्कों के बीच लंबे समय से तनाव है। युद्ध हो चुके हैं और जब भी संबंध सामान्य होने की बात आती है, कसाब जैसा आतंक का कोई न कोई सौदागर रंजिश की आग को भड़का देता है। कसाब को हिंदुस्तान में फांसी दी गई तो यह तल्खी और बढ़ गई। ठीक ऐसे वक्त में पाकिस्तान से आए 25 साल के उस्मान रियाज से पूछा था कि यहां के लोगों से मिलकर कैसा लगता है तो जवाब हैरान नहीं, परेशान करने वाला था। "हिंदुस्तान के लोग पाकिस्तान के लोगों के मुकाबले ज्यादा जहीन हैं। अब सवाल अपने ही मन में उठने लगे थे कि आखिर ये कैसे पाकिस्तानी हैं? क्या ये उसी मुल्क से आए हैं, जिसके नाम के साथ
आतंकपर्यायवाची की तरह जुड़ चुका है। अगर उस तरफ अदब की तारीफ अफजाई हो रही थी, तो इस तरफ भी अपनापे का जोर कम असरदार नहीं था। इसका असर 50 की उम्र पार कर चुकी दिल्ली के लाजपत नगर की मीना जैसवाल में नजर आया। मीना ने बताया हर साल यहां जरूर आती हूं। पाकिस्तान की गोटा-पत्ती, नक्काशी, क्रोशिए, काजल और सुरमें का कोई सानी नहीं है।मीना के पति इस बात पर थोड़े खफा से थे। बोले, दिल्ली की चांदनी चौक में क्या नहीं मिलता, लेकिन इन्हें तो लाहौर और कराची के आगे कुछ नहीं भाता।मियां-बीवी की नोंक-झोंक में दो रूठे हुए मुल्क जैसे हंसी-ठिठोली कर रहे थे। फिर मुस्कुराते हुए जब कराची से आए तकरीबन 70 साल के लईक अहमद ने अपनी बात कही तो कई और सरहदें टूटीं। बोले, मैं तो यहीं रामपुर का हूं। विभाजन के बाद सब कराची जाकर बस गए, मगर मिट्टी से रिश्ता थोड़े ही टूटता है।" लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ने का दर्द बहुत गहरा होता है। इस वेदना को या तो डाल से टूटा पत्ता समझ सकता है या नीड से बेदखल कोई परिंदा लईक हर साल यहां आते हैं और अपनी मिट्टी के अहसास को साथ लेकर जाते हैं।ब्लूचिस्तान में निकलने वाले एक खास तरह के ओनेक्स पत्थर से बनी चीजों के बीच बैठे थे लईक। पत्थर की खासियत पूछने पर उन्होंने एक फूलदान की तरफ इशारा करते हुए बताया, "इस पत्थर पर जो भी रोशनी पड़ती है वो आर-पार होकर दिखाई देती है। बिल्कुल पारदर्शी पत्थर है, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।" पत्थर के उस फूलदान से रोशनी कुछ इस तरह आरपार हो रही थी जैसे कह रही हो कि तिरे चिराग अलग हो और मेरे चिराग अलग, मगर उजाला कभी जुदा नहीं होता।यह जगह थी दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे व्यापार मेले का हॉल नंबर 22। हॉल के बाहर बेशक पाकिस्तान के नाम का बोर्ड लगा था, लेकिन यहां कोई सरहद नहीं थी। था तो सिर्फ प्यार, अपनापा और एक चाहत। 

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...