मंगलवार, 21 अगस्त 2012

मैं एक औरत हूं

1)

मैं उस पर
कभी नहीं कर पाई पलट कर वार
सिर्फ इसलिए नहीं कि औरत हूं
और
मेरे कमजोर अंगों में हिम्मत नहीं
उस जितनी,
मगर इसलिए कि
मुझ पर वार करने वाला
पहले मेरा पिता था
और फिर
पति।
पिता... जो जीवनदाता है
और पति.. जिसे परमेश्ववर कहा जाता है

2)

मेरा वजन लगातार
कम हो रहा है
और कंधे झुकते जा रहे हैं
संस्कारों का कैसा बोझ है ये

3)
एक औरत चांद पर    
कदम रख चुकी है
और मैं
मेरे कदम
मेरे कदम तो...
जमीन पर भी
लड़खड़ाते हैं
जब भी कोशिश करती हूं चलने की
अपनी तरफ।

4)

एक औरत देश चला चुकी हूं
और मैं ...
मैं तो अपना तथाकथित घर भी
हर रोज टूटते देखती हूं
हिंदु-मुस्लिम दंगों से भी बड़ी जंग
छिड़ती है हर रोज यहां
मंदिर टूटता है
जलता चूल्हा मेरे ऊपर फेंका जाता है
टूटे फूलदानों को हर सुबह फिर करीने से सजाती हूं मैं
मगर
यहां कभी
लागू नहीं होती एमरजेंसी।

5)

एक औरत कर चुकी है एवरेस्ट की चढ़ाई
और मैं नहीं चढ़ पाती
कचहरी, महिला आयोग या फिर किसी एनजीओ की
सीढियां भी।

6)
एक औरत की कलम ने
खोल दी है बड़े-बड़े सरकारी घोटालों की पोल
मगर
मैं नहीं खोल पाती अपने होंठ भी
जब एक कठपुतली की तरह मुझे
सिर्फ बेटी, पत्नी और
औरत हो जाना होता है
एक इनसान होने से भी पहले।

7)

कुछ औरतें सुना है..खेल रही हैं
कई तरह के खेल
हॉकी से लेकर कुश्ती तक
और
मैं...
मै...अभी तक
जिंदगी के खेल
में फिल्डिंग की कर रही हूं बस

8)
एक औरत ने कत्ल कर दिया है अपने पति का
एक औऱत दूसरे आदमी के साथ भाग गई है
एक औरत ..
एक औरत..
मैं इन औरतों में शामिल नहीं हूं
अब तक
मैं भी औरत हूं
लेकिन एक खालिस औरत।
अब भी हूं मैं इन औरतों के बीच
अपने जैसी कई सारी खालिस औरतों के साथ
चांद,देश,एवरेस्ट या ओलंपिक
एक और सिर्फ किसी एक-एक औरत की जिंदगी में ही है बस
कितनी ही तो हैं
अब भी बस बेबस।
मैं वही बेबस औरत हूं
इसलिए नहीं कि औरत हूं
इसलिए कि मैं खालिस औरत हूं।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

गाली, गोली और गैंग्स ऑफ सो मैनी रियल्टीज(2)

यार तू देखिओ इसका तीसरा पार्ट भी आएगा। 
...अबे तुझे कैसे पता
यार मैं कह रहा हूं न..
अभी रामाधीर सिंह का बेटा जिंदा है..
और डेफिनेट भी तो है...
अब वो राज करेगा वासेपुर में
..अबे हां यार ...तीसरे पार्ट में और भी मजा आएगा
अब डेफिनेट बताएगा...
.
.
.
गैंग्स ऑफ वासेपुर पार्ट-2 देखने के बाद लौटते हुए ऑटो में तीन 14-15 बरस के लड़कों की बातचीत  कुछ इसी तरह की थी। अब इसके बाद और वो भी फिल्म रिलीज होने के इतने दिन बाद समीक्षा लिखने का कोई बहुत ज्यादा औचित्य नहीं लगता। मगर ये फिल्म का ही असर है कि कह के लेना जरूरी लगता है...तो सोचा कुछ कह दिया जाए....

‌‌स‌िनेमा के इतिहास में ये फ‌‌िल्म ‌क‌ितना याद की जाएगी इस बारे में तो शायद वक्त ही बताएगा मगर ‌‌‌बॉलीवुड में ‌फ‌िल्मों के ‌‌स‌िक्वल की जब भी बात होगी तो गैंग्स ऑफ वासेपुर का ‌ज‌िक्र जरूर ‌क‌िया जाएगा। बॉलीवुड में, ‌फ‌िर हेरा-फेरी के बाद गैंग्स ऑफ वासेपुर-2 ही ऐसी ‌फ‌िल्म लगती है जो सच में स‌िक्वल के मायनों पर खरी उतरती है। ‌‌स‌िक्वल यानी जो पहली कहानी को पूरा करे ...और गैंग्स इस परख को पूरा करती है

सरदार खान को ‌क‌िसने मारा? 
बंगालन ने ‌क‌िसे फोन ‌करके सरदार खान के बारे में बताया?
दान‌िश और फैजल में से कौन लेगा सरदार खान की मौत का बदला?
रामाधीर  क्या सेकेंड पार्ट में भी एक शांत शात‌िर नेता बना रहेगा या उसका खून भी खौल जाएगा और वो भी कह के लेने की ‌ह‌िम्मत जुटा पाएगा ?
गोली-गाली और बदले की इस लड़ाई के बीच कैसे ‌ख‌िलेगी मौसीना और फैजल की प्योर देहाती फ्लेवर से लैस प्रेम कहानी? 
नगमा खातून के रोल में ऋचा चड्डा बूढ़ी उम्र के साथ कैसे करेगी इंसाफ और फैजल के तौर पर नवाजुद्दीन ‌स‌िदद्की मनोज वाजपेयी की तुलना में ‌क‌ितना बेहतरी से ‌फ‌िल्म को संभाल पाएंगे?

इन सारे सवालों के जवाब बेहद धुआंधाड़ और चुटीले अंदाज में गैंग्स के पार्ट- 2 ने द‌िए। इसके अलावा एक टाइमलाइन की तरह ‌ज‌िस तरह इस फ‌िल्म में साल दर साल झारखंड और ‌ब‌िहार में लोहे और कोयले के काले धँधे की कलई खोली है उसे देखते हुए ही शायद असल में भी कोयले की धांधली पर कैग की ‌नई ‌रिपोर्ट सामने आ गई है। 

इस तरह के काले धंधों की राजनीत‌ि को ‌फ‌िल्म के ज‌‌रिए समझाने की सोचना और ऐसा करके ‌द‌िखाना एक ब़डा रिस्क है। इस ‌रिस्क को उठाकर अनुराग कश्यप ने क‌ितना गेन कमाया है ये तो इस ‌फ‌िल्म की चर्चा से ही मालूम हो जाता है।

इस ‌फ‌िल्म में एक आम दर्शक के ‌ह‌िसाब से तमाम ऐसी बाते हैं ज‌ो उसे ये फ‌िल्म न देखने की सलाह देती ‌द‌िखती हैं, मगर ‌फ‌िल्म रिलीज के एक हफ्ते बाद भी  इस ‌फ‌िल्म को देखने के ‌ल‌िए थ‌‌ियेटर में जुटी भीड़ इस बात का सबूत देती है क‌ि उन सारे सलाह-मशवरों को पीछे छोड़कर प‌‌ब्ल‌िक ने ये देखने में ‌द‌िलचस्पी द‌िखाई है ‌क‌ि आख‌िर तमाम आलोचनाओं के बावजूद इतनी गाल‌ियों और गोल‌ियों को फ‌‌िल्म में रखने की वजह क्या थी।
और जहां तक मुझे लगता है दर्शकों को वो वजह दिखाई भी दी और समझ भी आई।

बेशक ये फिल्म का सेकेंड पार्ट हो लेकिन इसके फसर्ट दर्शकों की भी कमी नहीं थी, ऐसे दर्शक जो जल्द से जल्द अब पहला पार्ट देखने की योजना बना रहे थे।

कहानी, अदाकारी और गाली-गोली को समझने के बाद इस फिल्म में एक और बेहतरीन चीज है। ऐसी चीज जो दर्शकों को गोली के अधाधुंध धमाकों के बाद भी सीट पर बैठे बैठे गर्दन मटकाने और शब्दों की समझ न होने के बाद भी गुनगुनाने का मौका देती है। वो चीज है इसका म्यूजिक ...
...सैंय्या काला रे...से लेकर फ्रस्टरेटियाओ नहीं मोडा तक स्नेहा खानवल्कर ने बॉलीवुड में गीतों का एक नया ट्रेंड शुरु किया है ...जहां हीरो-हीरोइन के पेड़ के आगे-पीछे घूमने या हाथ पैर हिलाकर अजीबो-गरीब डांस करने की जरूरत नहीं है। 
ये ऐसे गीत हैं जो सच में जिंदगी से जुड़ते हैं... असल जिंदगी में शायद ऐसे गीत सदियों से पत्नी और प्रेमिकाओं की जुबां पर रहे होंगे जिन्हें गुनगुना भर देना काफी है....

और फिर इस बार इस क्राइम थ्रिलर में जो एक औऱ सबसे अच्छी बात नजर आती है पहले पार्ट के मुकाबले  वो है इसमें इस्तेमाल किए गए ह्यूमर्स डॉयलॉग और हालात... जिनमें मर्डर के सीन में भी दर्शक हंसने पर मजबूर हो जाता है...

और आखिर में इस बात की चर्चा करना भी जरूरी है कि 180 रुपये खर्च करने के बाद दर्शक को मिलता क्या है..

1.
पहले पार्ट से उठे सवालों का जवाब
2.
झारखंड और बिहार में कोयला और लोहा माफिया की राजनीति का ब्योरा
3.
नायक की छवि से बिल्कुल भी मेल न खाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दकी जैसे अभिनेता में एक उभरते नायक को देखना
4.
तीसरी बात में बाकी के सारे कलाकारों को शामिल कर भी यही कहा जा सकता है कि इस फिल्म के जरिए ये बात फिर से साबित हुई कि शाहरुख,सलमान और कैटरीना के अलावा और भी चीजें हैं जो फिल्म चला सकती हैं...और जिन्हें देखना दर्शक पसंद भी करते हैं...
5.
हटके म्यूजिक का मजा 
6.
एक शिक्षा- सिर्फ सिनेमा देखने से ही नहीं (फिल्म में रामाधीर का एक डायलॉग भी इसी तरह है)  दूसरी औरत का लालच पालने से भी लोग चूतिया बनते रहे हैं इस देश में.....

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आजादी के लड्डु खाकर पछता रही हूं मैं

इससे पहले भी जब कभी मैंने आजादी के दिन के बारे में कुछ लिखा है तो उन लड्डुओं का जिक्र जरूर किया है जो मैंने पूरे 12 साल हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर खाएं हैं। बेशक मैं कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं मगर एक सामान्य शख्स की तरह कुछ इंसानी कमजोरियां मेरे साथ भी  हैं। लड्डु उन्हीं कमजोरियों में से एक है।
इसलिए शायद पिछले इतने सालों में जब भी मैंने आजादी के सही मायने तलाशने और उनके बारे में संजीदगी से सोचने की कोशिश की तो लड्डु का स्वाद उस पर हावी हो गया। आप सोचेंगे मेरी जिंदगी के 12 साल बीते हुए तो  11 साल का वक्त निकल गया फिर.. 11 साल मैं क्या करती रही..दरअसल मेरी मां टीचर हैं तो मेरा स्कूल खत्म होने के बाद भी घर पर लड्डुओं का आना जारी रहा और इसलिए मुझ पर मेरी कमजोरी का हावी होना भी...
खैर
इस बार मैंने इस पर काबू किया है...बिल्कुल वैसे ही जैसे लड़कियां अपनी दूसरी तमाम कमजोरियों पर काबू करती रहती हैं न जाने कितनी बार....
लड्डु न खाने से पेट में जो स्पेस खाली छूटा है वहां एक सवाल घुड़मुड़-घुड़मुड़ कर रहा है। सवाल ये कि क्या ये दिन सच में इस तरह खुश होने का है कि स्कूलों में लड्डु बांटे जाएं। छतों पर पतंग उड़ाई जाए। फिल्म देखी जाए। बाहर घूमने जाया जाए। धानी और नांरगी रंग के कपड़े पहने जाएं। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया जाए। रंगारंग कार्यक्रम किए जाएं...?
आज इतने सालों बाद आजादी पर सोचते हुए मैंने अपनी एक कमजोरी को तो पीछे छोड़ दिया है मगर दूसरी फितरत मेरे साथ है और वो है मेरा स्वार्थ। स्वार्थ ये कि यहां मैं पूरे देश या देशवासियों की नहीं सिर्फ अपने लिए आजादी के मायनों की बात करुंगी। जानती हूं कि 65 साल बाद इन बातों का रोना रोकर कुछ हासिल नहीं होगा, लेकिन मैं इतने सालों तक खाए गए लड्डुओं का पश्चाताप करना चाहती हूं।
तो कहानी कुछ इस तरह है कि किताबों और किस्सों से इतर जब मैंने इस बार आजादी को समझा तो देखा कि
इस डिप्लोमेटिक आजादी की वजह से ही आज मेरे पास मेरे गांव का नाम नहीं है। वो गांव जहां शहर की आपाधापी से दूर जाकर कुछ दिन मैं सुस्ता सकूं। कोई जमीन नहीं है जिसके खेतों में मैं गर्मियों की छुट्टी में जाकर लहलहा सकूं। पुरखों की विरासत नहीं है। वो गली कूचे नहीं है जहां मेरे  दादा-परदादा रहे और पले-बढ़े। और जहां जाकर मैं उनके अस्तित्व को महसूस कर सकूं। उन पर किस्से कहानियां औऱ कविताएं लिख सकूं। विभाजन की वो टीस क्या होती है वो इस बार पहली बार मुझे महसूस हुई। शायद कहीं दबी तो पड़ी थी पर लड्डुओं ने उसे उबरने नहीं दिया।
कहां की हो तुम...ये सवाल न जाने कितने सालों से हर वक्त हर मोड़ पर पीछा करता रहता है। ... औऱ मैं कुछ ठीक-ठीक नहीं बता पाती। क्यों..क्योंकि हम मुलतानी हैं। मुलतान के रहने वाले मुलतानी.. इतना कह भर देने से ही मेरे दोस्त मुझे रिफ्यूजी कह कर चिढ़ाने लगते औऱ एक कुंठा मेरे अंदर दाखिल होती और फिर हवा के रास्ते बाहर निकल जाती। मुझे लगता रिफ्यूजी होना एक मजबूरी है कोई इतनी बुरी बात नहीं जिस पर संजीदा हुआ जाए।
लेकिन आज मैं बेहद संजीदा हूं क्योंकि इस रिफ्यूजी होने ने मुझसे मेरा इतिहास छीन लिया और इसलिए मैं अपने भूगोल को आज तक नहीं समझ पाई औऱ न ही समझा पाई....
अब आप ही बताइए कि मेरी मां का जन्म उत्तरप्रदेश के एक कस्बा नुमा शहर खुर्जा में हुआ उनका बचपन पंजाब के अबोहर में बीता। मेरे पिता जयपुर में पले-बढ़े। देहरादून में पढ़े-लिखे। हरिद्नार में बसे। और मेरा जन्म हुआ बुलंदशहर में और मैं बचपन से रही हूं गाजियाबाद में..............अगर आप मेरे इस भूगोल को समझ सकें हों तो मुझे भी एक शब्द में इस सवाल का जवाब दीजिएगा कि "मैं कहां की हूं..."सिवाए इस जवाब के जो मैंने अभी कुछ बरस पहले ही देना सीखा है.." हिंदुस्तान"
मगर फिलहाल मैं खुद ही एक कोशिश करती हूं अपने असल भूगोल को समझने की...
मुलतान, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है, चेनाब नदी के किनारे।
मुलतान, जिसे सूफी और संतों का शहर कहा जाता है।
मुलतान, जो बाबा फरीद के नाम से मशहूर पंजाबी के बेहद शुरुआती दौर के कवि फरीदुद्दीन गंजशकर का जन्मस्थान है।
मुलतान, जो सिर्फ एशिया ही नहीं दुनिया के कुछ एक सबसे पुराने शहरों में से एक है।
औऱ
मुलतान, वही शहर जो आजादी के नाम पर अपनी पहचान लुटा बैठा। और मुलतानी कहे जाने वाले इसके बाशिंदे भारत का रुख कर गुमनाम हो गए क्योंकि मुस्लिम बहुल होने के कारण मुलतान को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया....।
ये ख्याल बहुत पाक नहीं लगते जो आज मन में यूं कुलाचे मार रहे हैं। क्योंकि इतना जानती हूं मैं कि उस वक्त ब्रिटिश रुल से आजाद होना ही सबसे बड़ी परिभाषा थी आजादी की..शायद रहनुमाओं  को ख्याल ही न आया हो किसी की पहचान और गांव घर के हमेशा के लिए दफन होने का।...मगर आज इन ख्यालों को रोकना नहीं चाहती मैं... बेशक नापाक ही सही लेकिन आज आजादी के इरादे मेरे मन में कुछ नेक नहीं लगते...आज मैं आजादी के इस दिन को बेदखल कर देना चाहती हूं अपनी जिंदगी से ...

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

बिछड़ने का दिन



उस तेज बारिश वाली एक शाम हम दोनों


बिछड़ने का दिन तय करने के लिए


मिलने का दिन तय कर रहे थे


कल आखिरी बार मिलेंगे


मैंने मन में सोचा था


उसे भी बताया था


और फिर हम मिले


उस दिन


और उसके बाद


बार-बार मिलते रहे


यूं ही


बिछड़ने का दिन तय करने के लिए

रविवार, 24 जून 2012

गाली, गोली और ....गैंग ऑफ सो मेनी रियल्टीज



न लूट खसोट करने वाले गुंडों के गैंग पहली बार पर्दे पर दिख रहे थे, न ही मार-धाड़ वाली फिल्म देखना कोई नई बात थी। 
न गालियां अजनबी थीं, न आदमी की वो जात... जो वो अक्सर दूसरी औऱतों के सामने दिखाते नजर आते हैं। मगर इन सब जानी पहचानी चीजों को एक बड़े से कमरे में सौ लोगों के बीच देखना बहुत अजीब था। 
शायद खुद से आंखें मिलाने जैसा या फिर उस दुनिया से आंखें चुराने जैसा, जिसका हिस्सा हम आज भी थे...। 


ये फिल्म 1940 के जिन हालातों से शुरू होकर आज में लौटती है...उस बीच में दुनिया कितनी बदल गई है ...ये सवाल इस फिल्म को देखने से पहले पूछा जाता तो हम कहते .. बहुत ज्यादा...मगर फिल्म देखने के बाद समझ में आता है कि ...बहुत कम बदली है।


हां.. इतने समय में जो कुछ तरक्की हुई है उसे फिल्म में बखूबी दिखाया गया है। अब घर वैक्यूम क्लीनर से साफ होने लगे हैं बेशक दिमागों में गंदगी भरी पड़ी हो। फल सब्जियां ठंडी रखने के लिए घर में फ्रिज आ गए हैं बेशक शरीर की गर्मी को शांत करने के लिए आज भी आदमी अपनी बीवियों को छोड़कर किसी दूसरी औरत को धँधे वाली बना रहे हो।
शहर में मोहल्लों में... आज भी तो कई तरह के गैंग हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जैसा फिल्म में दिखाया गया है वैसे बम बनाने के लिए सल्फर और पोटेशियम खाने के डिब्बे में नहीं मंगाना पड़ता..अब बड़े-बड़े खतरनाक हथियार सीधा सप्लाई हो जाते हैं।


जिस तरह शाहिद खान की मौत का बदला लेने के लिए एक सुंदर और शांत बच्चा, सरदार खान बन जाता है और सरदार खान की रंजिशों को देखते हुए उसके बेटे दानिश और फैजल की मानसिक स्थिति अलग-अलग तरह से आकार लेती है.....हो सकता है शायद आज इस हद तक का कुछ न होता हो। मगर आज भी बाप की करनी का असर बच्चे भुगतते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि भुगतने के लिए उन्हें महंगे कांवेंट बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जाता है, एक ही घर में रहकर बच्चे को उस रात का गवाह नहीं बनना पड़ता शायद जब उसकी मां इतनी कमजोर पड़ गई थी कि दादा की उम्र के आदमी के साथ सोने पर मजबूर हो रही थी क्योंकि वो टूट चुकी थी ये सुनकर कि उसका पति यानी बच्चे का बाप किसी दूसरी औऱत के साथ सो रहा है।


गंदी गालियों, बिस्तर के रूमानी, बॉलीवुडिया सीनों से हटकर फिल्माएं गए ठेठ गंवई सीनों और  अधाधुंध मार कुटाई के अलावा इस फिल्म में कई ऐसी खिड़किया हैं जहां से देखने पर अब तक की दुनिया की कई तरह की शक्ल सामने आती है। फिल्में में दिखाया गया सालों का बदलाव एक बार को तो ऐसे लगता है जैसे कोई समय की सुइयों को पीछे घुमाकर हमें पहले की दुनिया दिखा रहा है। 


उस दुनिया में एक शाहिद खान है जो सस्ता अनाज देने के लिए ट्रेन लूट रहा है। उसका बेटा सरदार खान है जो बाप की मौत का बदला ले रहा है...कहके ले रहा है....ये फिल्म की पंचलाइन भी है तेरी कह के लूंगा....शायद ये हीरो का हुनर है कि वो कहके वार कर रहा है। सरदार खान की बीवी है नगमा। जो उसी हद तक गालियां दे सकती है जिस हद तक कोई भी सरदार खान देता है। जो भीड़ भरे रास्ते में उस सरदार खान को मार-मार कर घर ला सकती है जो सरदार खान भरे बाजार में आदमी को बेहिसाब काट डालता है और रौब से आगे चला जाता है। वही औरत नगमा अपने पति को दूसरी औरतों के पास जाने से नहीं रोक पाती। अनकहे तौर पर समझौता कर लेती है। गुरुराती है चिल्लाती है चाकू भी दिखाती है मगर किसी भी हालत में ऐसे आदमी की बेगम बनकर रहना उसे मंजूर है जो कब कहां कौन सी औरत के पास है उसे खुद नहीं पता। बेशक वो घर न आता हो पैसे न भेजता हो उसने दूसरा परिवार बना लिया हो मगर अपने बेवफा शौहर के लिए वो पूरी तरह वफादार रहना चाहती है। एक बंगालन है जो सरदार खान की दूसरी औरत है। पहली औरत नगमा से ज्यादा खूबसूरत ज्यादा कमसीन ज्यादा नकचढ़ी है। जो सरदार खान से पैसे भी लेती है, उसे गालियां भी देती है और अंत में मरवा भी देती है....


सरदार खान की जिंदगी का मकसद ...उसकी रंजिश.. कितनी पूरी हुई है.. ये फिल्म का दूसरा भाग बताएगा मगर वक्त सरदार खान के हाथ से बंदूक गिरने के बाद भी उसका जयघोष करता है ...जीया हो बिहार के लाला....फिल्म के आखिर में ये जयघोष फिल्म की शुरुआत में आए उन सपनों की टीस को महसूस करवाता है जब शाहिद खान हमेशा के लिए गांव छोड़कर धनबाद में बसने जा रहा होता है वो गाता है....


एक बगल में चांद होगा एक बगल में रोटियां
एक बगल में नींद होगी एक बगल में लोरियां


अगर आप  बहुत सब्जेकिट्व होकर न देखें तो ये फिल्म आपको बहुत कुछ देखने और महसूस करने की आजादी देती हैं लेकिन अगर आपको सिर्फ वासेपुर के गैंग्स देखने हैं तो इस फिल्म में सिर्फ लूट-खसोट, बंदूक की आवाजें और मां-बहन की गालियां हैं जिसे देखना एक औसत दर्शक को रास नहीं आएगा...फिर भी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस की रेटिंग से ये कहीं आगे है और मनोज वाजपेयी के अभिनय को किसी ऑस्कर की जरूरत नहीं है।


सिर्फ मनोज वाजपेयी ही नहीं फिल्म का हर किरदार कहीं भी किरदार नहीं लगता ....बिल्कुल उसी दुनिया के असली चेहरे लगते हैं जहां कोयले की खदाने बंद तो हो चुकी हैं लेकिन उनकी कालक अब भी लोगों की जिंदगी में इस तरह शामिल है कि सुबह का उजाला भी मटमैला दिखता है.....


अनुराग कश्यप सिनेमा की अपनी एक अलग दुनिया बना रहे हैं जहां सिनेमा .... में सच है..... सिर्फ सच.....कड़वे वाला सच















रविवार, 17 जून 2012

पिता, एक टेंट की तरह होते हैं

मां, एक ब्लैंकेट की तरह होती है। नरम, कोमल और जिसका अहसास ही हर तकलीफ को भुला देता है।


पिता, एक टेंट की तरह होता है। तन कर खड़ा हुआ है। मगर जिसके गिरते ही जिंदगी की सारी सुरक्षा खत्म हो जाती है।


.... ये बातें बहुत पहले कहीं पढ़ी थी मैंने। आज फिर याद हो आईं। हालांकि ये अभी-अभी याद आया है कि ये सब मेरे साथ तब हो रहा है जब बच्चे फादर्स डे मना रहे हैं।


बेमन से घर से निकली थी। पता नहीं था क्यों जा रही हूं, लेकिन जा रही थी। फिल्म देखना एक ऐसा अवसर या कहें कि बहाना होता था जब हम (मैं और मेरे एक करीबी मित्र) मिल लेते थे वरना मिलने की कोई खास वजह नहीं थी।


इस बार सारा प्रोग्राम बिगड़ चुका था। सिंगल थियेटर में फिल्म देखना तय हुआ था,लेकिन मेरे देर से पहुंचने के कारण शो निकल चुका था। कुछ देर एक कॉफी हाउस की तलाश में घूमने के बाद जब गरमी का असर दिखने लगा तो तय हुआ कि कहीं दूसरे शो के लिए चला जाए। दौड़-धूप कर जहां पहुंचे, वहां शो बहुत देर से था। गुस्सा भी था, झुंझलाहट भी मगर कोई ऐसे शब्द नहीं थे हमारे पास कि ये गुस्सा निकाल पाते। हंसी और ठहाकों में सारी बेबसी कहीं बहती जा रही थी। बेबसी..हां बहुत बेबस और बेअदब से मूड में थे दोनों।


खैर इन सारी बातों को पीछे छोड़ एक नए मॉल में जाने का फैसला हुआ। यहां पहुंचकर थोड़ी तसल्ली मिली। सबसे पहला शो कौन सा है....देखने पर पता चला कि फरारी की सवारी। हमारे मित्र शंघाई देख चुके थे मैंने नहीं देखी थी, लेकिन फिर भी काफी थके होने की वजह से यही तय हुआ कि फरारी की सवारी ही देख लेते हैं।


फिल्म शुरू होने से पहले ही हॉल में बच्चों की भीड़ देखकर अंदाजा लग गया था कि हम यहां गलत टाइप की ऑडियंस हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई एडल्ट फिल्म देखने 14 साल का बच्चा पहुंच जाए। लेकिन अब यहां तीन घंटे बैठना था।
....................................




फिल्म शुरू होती है....एक बाप (शरमन जोशी) पूरी तरह अपने बेटे(ऋत्विक) के ‌ल‌िए मां की भूमिका में है। बच्चे के लिए नाश्ता बनाना, स्कूल के लिए तैयार करना और उसके मन की बातें करना। अक्सर ये काम मां किया करती है, मगर इस बच्चे की मां नहीं है। जो पिता है वहीं बहुत कुछ मां सा है। बच्चे की पढ़ाई से लेकर उसके शौक तक हर चीज का ख्याल रखता है। बच्चे का सिर्फ एक ही शौक हैं और एक ही सपना, क्रिकेट। पूरी फिल्म इस सपने को पूरा करने के इर्द-गिर्द घूमती है। क्रिकेट के बीच में फरारी कहां से आती है इसी सस्पेंस के जवाब लिए कुछ देर ये फिल्म बहुत ही स्लो स्पीड के साथ दर्शकों को बांधे रखती है। बहुत अच्छी स्क्रिप्ट और डायरेक्शन न होने पर भी इस फिल्म में बाप और बच्चे के रिश्ते को दिखाने वाली कई कहानियां हैं।


बेशक हमें ये कायो ((ऋत्विक) ) और उसके पापा रुस्तम(शरमन जोशी) की कहानी लगे। लेकिन इसमें रुस्तम और उसके पापा यानी कायो के दादा (बोमन ईरानी) भी शामिल हैं। ये उन दो बाप-बेटों की भी कहानी हैं जहां बाप अपने सपनों की टूटन को अपने बेटे की जिंदगी में शामिल नहीं होने देना चाहता और उसे क्रिकेटर की बजाए आईटीओ में क्लर्क बना देता है।


फिर इसमें वो दो बाप-बेटे भी शामिल हैं जहां बाप अपना पॉलिटीकल करियर जमाने के लिए बेटे को पूरी जिंदगी बंदूक दिखाकर अपना हुक्म चलाता रहता है। और आखिर में वो बेटा ही बाप पर बंदूक तानकर उसकी पॉलीटिक्स की असलियत सबके सामने लाता है।


तीन घंटे से कम की ‌इस फिल्म में तो तीन तरह के बाप दिखाना काफी है लेकिन असल जिंदगी में इसके अलावा भी कई तरह के बाप होते हैं।
कुछ ऐसे बाप भी हैं जिनके बच्चों ने उनसे सालों से बात नहीं की।
कुछ बाप ऐसे भी हैं जिनका होना ही उनके बच्चों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल है और कुछ ऐसे भी जिनके लिए बच्चे पालना सिर्फ एक सोशल फॉरमेलिटी है।




विधु विनोद चोपड़ा बेशक इस फिल्म के जरिए थ्री इडियट को मिली सफलता के रिकार्ड न तोड़ पाए, लेकिन बेटे के सपनों के लिए की जा रही बाप की जी-तोड़ कोशिशें हम जैसे उन बच्चों को उस भरे हॉल में जरूर तोड़ देती हैं जिन्होंने अपने बाप को मजबूर होते देखा है। बिल्कुल उस बाप की तरह जो बेटे के सपनों के लिए लोन लेना चाहता है, लेकिन उसे कोई लोन नहीं देता, क्योंकि उसकी तनख्वाह इतनी कम है कि उस पर लोन मिल ही नहीं सकता।


नियम कानूनों का पालन करने वाला एक शांत, सीधा-सादा इंसान नियम भी तोड़ता है और उस इंसान की गर्दन भी पकड़ता है जिसकी वजह से उसका बेटा लापता हो गया था। अचानक एक कैरेक्टर में ये शिफ्ट देखना हल्का सा हैरान करता है और ये हैरानी तब खुद ही फना हो जाती है जब याद आता है कि इस वक्त ये इंसान एक बाप है सिर्फ और सिर्फ एक बाप।




न चाहते हुए भी देखी गई ये फिल्म.. खत्म होते-होते मन को‌ फिर से उस चाहत से लबरेज कर देती है जो चाहत बरसों से जमी पड़ी है.. एक ऐसे फ्रिज में जिसका दरवाजा ही नहीं खोला किसी ने। एक पिता को समझने और प्यार करने की चाहत।



















सोमवार, 11 जून 2012

जिदंगी में एक दुनिया रहती है



दीवार में एक खिड़की रहती है-विनोद कुमार शुक्ल।


काश.. जिंदगी का होना.. जिदंगी में जिंदगी का होना भी होता। अजीब सी है न ये लाइन। लेकिन विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास दीवार में खिड़की रहती है ....पढ़ने के बाद... आपको धीरे धीरे इस तरह की अजीब लाइनें भी समझ आने लगती हैं... और साथ में समझ आने लगता है.. जिंदगी का एक नया चेहरा।


सच में समझ नहीं आता कि कहां उलझी है जिंदगी... ऐसी कितनी ख्वाहिशें हैं.. जिन्हें पूरा करने के दौरान खुद से ही मिलने का वक्त नहीं मिल पा रहा। खुद को पीछे छोड़कर कैसे आगे बढ़ रहे हैं हम। क्या ये आगे बढ़ना सही में वो आगे बढ़ना है जिस तरह हम आगे बढ़ना चाहते थे।


जानती हूं कि ये सारी बातें किसी भी वक्त.. कोई भी लिखने वाला इंसान लिख सकता है। मैं कुछ नया नहीं लिख रही। सही मायनों में कहूं तो ..बहुत ही घिसी पिटी बकवास लिख रही हूं।


लेकिन हमारी बहुत ही तमीजदार जिंदगी में इस तरह की एक बकवास की जगह होना भी जरूरी है। ये बकवास कई बार वजह दे देती है.. जिंदगी में.. जिंदगी को महसूस करने वाले कुछ पलों से मिलने की। ऐसे पल... जब बिन बात के हंसी आ जाती है ...और बिन बात के रोना। जब बिना पहचान के कोई मदद कर देता है और जान बूझकर किसी का परेशान करना भी अच्छा लगता है।




बीच में ही इम्तिहान आ जाने की वजह से कई दिन लग गए इस उपन्यास को पूरा पढ़ने में। आज.. अभी.. इसका आखिरी पन्ना पढ़कर पूरा किया इस उपन्यास को।


यकीन मानिए.. बड़ी तेज फीलिंग हो रही है कि काश एक ऐसी खिड़की मेरे पास भी होती.. जिसे जब चाहे लांघकर मैं अपने मन की दुनिया में जा सकती।


विनोद कुमार शुक्ल को पहली बार पढ़ा मैंने। काफी जगह लगा कि क्यों पढ़ रही हूं इस उपन्यास को मैं। न इसमें कोई हीरो टाइप का चरित्र है न कोई संघर्ष न कोई विशेष परिस्थिति..छोटे छोटे से कुछ ब्यौरे हैं बेहद छोटी छोटी बातों के। मगर इसका सार तब समझ आता है जब आप उपन्यास का आखिरी पन्ना पढ़ते हैं...पता चलता है कि


 जिंदगी में इस तरह की भी एक दुनिया रहती है जो दीवार की खिड़की से बाहर निकलकर ही दिख सकती है....ये दिखना दरवाजे से नहीं हो सकता...दरवाजा उस दुनिया में दाखिल ही नहीं होने देता कभी...




फिर वही ख्वाहिश कि काश ये  खिड़की मेरे घर की दीवार में भी होती
पर घर ही नहीं है
किराये का है तो खिड़की कैसे हो सकती है....

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...