सोमवार, 5 सितंबर 2011

ये कैसा शिक्षक दिवस है आज

ऐसा सबका ही अनुभव होता होगा या फिर कुछ लोगों का तो होता ही है कि हमारा पहला क्रश हमारे कोई अध्यापक हो
इस अध्यापक दिवस पर इस बात को मैं भी स्वीकार करना चाहती हूँ कि मेरे साथ भी ऐसा हुआ.. एक नही दो बार जब मुझे अपने टीचर पर ही प्यार आ गया ...बेशक उस वक़्त भी नही पता था और आज भी नही कि प्यार के असल मायने क्या हैं ..उस प्यार में भी एक चाहत थी, इज्जत थी, जज्बा था ...और आज अगर किसी से होता है तो वो भी एक जज्बा है, चाहत है और थोड़ी  सी जरुरत है
खैर आज मुद्दा प्यार नही हमारे अध्यापक है ..जिनका हम माने या न माने हमारे जीवन में अहम् योगदान है ..कभी वो हमें अछे लगे तो हमने मन लगाकर सिखा, कभी उन्होंने हमें अच्छी शिक्षा दी तो हम अच्छे से आगे बढ़ पाए, उनकी सख्ती, उनकी नरमी, उनका अंदाज, उनकी बात
कब कहाँ कैसे जिंदगी की दिशासूचक रही है , ये अब धीरे धीरे पता चल रहा है...
लेकिन हैरानी होती है ये देखकर कि हमें स्कूल छोड़े अभी जमाना नही बीता है और स्कूलों के हालातों में एक ज़माने का बदलाव आने लगा है
अब यहाँ बैर बदलाव से नही उस बात से है  जिसमे भवरे को फूल से दूर रखने का, चकोर को चाँद के पास भी न फटकने जैसे बदलाव किये जा रहे है
यक़ीनन परिवर्तन प्रकर्ति का नियम है और ये मानने से भी कोई गुरेज नही कि हमें ज़माने के साथ चलना है ...लेकिन इतनी रौशनी भी ठीक नही कि सब अंधे हो जाएँ ...
ऐसे समय में शिक्षा और शिक्षकों के स्तर और शैली में कुछ अजीबोगरीब बदलाव होने लगे हैं ....
स्कूलों में टीचरों का बन ठन कर आना, ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी बोलना उनकी योग्यता का मापदंड हो गया है
जबकि हमने सीखा था और देखा था कि अध्यापक जितने सादगी में रहे उतना ही अच्छा है ताकि बच्चों का ध्यान उनके कपड़ों और शकल पर नही उनके पढ़ाने पर जाये ...और हां क्रश कि जो बात मैं कह रही थी उसमे उन टीचरों का अच्छा देखने से ज्यादा ये प्रभावित करता था कि वो कैसे हमारे दोस्त जैसे बनकर बेहतरीन तरीके से पढ़ा रहे है
अच्छा नही लगता ये देखकर कि वो अध्यापक जो हमारे आदर्श रहे आज अपना अस्तित्व बनाने के लिए जूझ रहे है.सिर्फ इसलिए कि वो कुछ दिखावा पसंद नही करते ...कि वो हिंदी को मरना नही चाहते अंग्रेजी को जिलाने कि कीमत पर
इधर लुधियाना या कहूँ के पंजाब के कई जिलों में शिक्षक दिवस को काला
दिवस के रूप में मनाया गया. कारण था सालों से लटकी पड़ी उनकी मांगे
तय वेतन न दिया जाना , रेगुलर होने कि योग्यता और रेगुलर कर दिए जाने के वायदे के बावजूद कोई कवायद न होना
...
कैसे ख़ुशी और शुभकामनाओं के साथ इस शिक्षक दिवस को मनाया जा सकता है जब एक तरफ शिक्षा अपने आयाम खोज रही है और शिक्षक अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे है ??
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फिर भी किसी अध्यापक कि असली दौलत उसके छात्र होते हैं
शिक्षक बनकर काम करना रोजी रोटी का मुद्ददा है और
इस ज़माने में रोजी रोटी इतनी आसान नही
 

मेरे उन अध्यापकों के लिए जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया
कहते है गुरु ज्ञान देते है
ज्ञान का वरदान देते है
पर मैंने तो देखा परखा और जाना
साक्षात् गुरु आपको मन
आदर्श स्वरुप हैं मेरे जीवन का आप
करती हूँ मैं आपको सादर प्रणाम

बुधवार, 24 अगस्त 2011

मन लोकपाल

( रामलीला मैदान में हर दिन भीड़  बढ़ रही है अब सरकार की गर्दन भी कुछ झुकने लगी है
लेकिन हम अन्ना के नाम की नेलपॉलिश लगाने, टोपी और टी शर्त पहनाने के अलावा क्या कर पाए है
एक दिन का अनशन क्यों न अपने भीतर के बदलाव के लिए करे ...आखिर व्यवस्था हम से ही है हम ही हैं कहीं क्लर्क कही वकील कहीं बाबु कहीं पोलिसे क्लार्मी और कहीं ..वो शख्स जो एक लालच को पूरा करने के लिए दूसरे लालच की भेंट चढ़ता आया है
ये मन लोकपाल की बात है जरा इसे भी समझने की कोशिश करें अपने मन को भी मनाये ...भ्रष्टता से बचने के लिए एक बिल से जो बात नही बनेगी वो आपके दिल से बन जाएगी )

वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढे चलो
सामने पहाड़ हो क्रांति की मशाल हो
तुम रुको नही थको नही
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दूसरी कक्षा में मैंने ऐसी ही एक कविता याद की थी प्रार्थना सभा में सुनाने के लिए..अब शायद कुछ एक लाइन गलत भी लिख दी हैं
लेकिन मैं बचपन से इतिहास के पाठ याद करते हुए सोचा करती थी काश ये क्रांतियाँ मैंने अपनी आँखों से देखी होती तब मुझे सब मालूम होता और कुछ भी याद या कहूँ की यूँ रटना न पड़ता ...बेशक बहुत से सपने अभी गर्त में है लेकिन अपनी आँखों से क्रांति देखने का ये मासूम सा ख्वाब यूँ सच होगा ....सोचा नहीं था
दिल्ली क्रांति के संक्रमण काल में है

  अन्ना और अरविन्द केजरीवाल की  सालों की  मेहनत का सिला जन सैलाब के रूप में सामने है मगर इस क्रांति का ये कैसा कडवा पहलू है क़ि लोगों ने रामलीला मैदान में जाने को एन्जॉय करने का नाम दे दिया है , वहां से अन्ना की  टोपी पहनकर वापस आने को वो अपनी शान समझ रहे है ..फिलहाल हर दिन भीड़ बढ़ रही है ..लेकिन इस भीड़ का हिस्सा कौन लोग हैं जरा अपनी छटनी करें ...इस आधार पर की वह  सिर्फ लोकपाल बिल पास करने की  मुहीम में नहीं खुद को बदलने की मुहीम में भी शामिल हो रहे हैं

बड़े बड़े स्कूलों का प्रबन्धन इस समर्थन में शामिल है
जरा वो अपने दामन  में झांके कितनी बार उन्होंने सस्ती कोपी किताबे महंगे दामों पर जबरदस्ती बच्चों को लेने को मजबूर किया है ...
जरा खोल के देखने उस रजिस्टर को जिसमे उनका स्टाफ हाथ में मिलने वाली तन्ख्वांह से कहीं ज्यादा पर दस्तखत करता है
बहुत से वकीलों ने भी रामलीला मैदान को ही अदालत बना डाला वो पूछे खुद से की क्या कभी बिना पैसे लिए  किसी गरीब को इन्साफ दिलाने में शामिल रहे हैं वो
बहुत से युवा इस आन्दोलन में जी जान से शामिल हुए झंडे लेकर सड़कों पर भागे नारे लगाये अन्ना की टोपी पहनी ..लेकिन फिर वापस लौट आये दरसल वास्तव में ये सब खुद को और अपने देखने जानने वालों को टोपी पहनाने जैसा है
बेहद चिड हो रही है मुझे ये लिखते हुए कि आजकल हर चीज हर बात हर जज्बात एक ट्रेंड या फैशन का रूप क्यों ले लेता है ?
क्यों चीजों का वास्तविक वजूद दिखावे की भेट चढ़ जाता है ?
हम किसी की पूंछ बनने की दौड़ में क्यों शामिल हो जाते है ?
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ये सारी बाते छोड़ भी दे ..सिर्फ मुद्दे की बात करें ..भ्रष्टाचार की बात करें तो क्या सिर्फ एक लोकपाल इस पर लगाम लगा सकता है
कानून तो कई हैं पर क्या कानून बनने से समस्या ख़त्म हो गई
तीन बार चलान होने पर लाइसेंसे रद हो जाना चाहिए
लेकिन नही होता
दहेज़ लेने और देने पर सजा का प्रावधान है
लेकिन धडल्ले से दहेज़ लिया और दिया जा रहा है
ये फेहरिस्त लम्बी है
समझने की बात ये है कि अनशन  और जन सैलाब से समस्या कितनी हल हो सकती है
अन्ना का अध्याय अभी जारी है ...
लेकिन इससे कुछ सिखने की शुरुआत हमें रामलीला मैदान पहुंचकर नही अपने भीतर झाँक कर  करनी होगी

बुधवार, 17 अगस्त 2011

एक उदास मन की टूटी फूटी बतियाँ

बहुत बड़ा बनने और बहुत कुछ पाने के ख्वाबों के बीच कुछ छोटी छोटी चीजें कितनी अहम् हो जाती है ...इतनी अहम् की ये चीजे ही हमारा अहम हो जाती हैं..
शायद जिंदगी कभी हमारी तरह नही होती
हमें हमेशा जिंदगी के जैसे होना होता है

जिसे पाना चाहते हैं जब वो मिल जाता है तो

सब कुछ इतना सूना क्यों हो जाता है

उसे खो सकने का तो कभी ख्याल भी

नही किया था
आज वो ढूंढे से भी नही मिल रहा

इतनी बेसिर पैर हो रही है

मंजिल कि
कोई सिरा दिख ही नही रहा
नही तो आगे बढूँ और थाम लूँ , जकड लूँ

आसमान में छाए बादलों को देखा तो लगा
कि जैसे उड़ रहें हैं ये
इनका तय है न एक मौसम उड़ने का
एक बरसने का
एक तरसने का
एक तरसने का
हम तो
फिर वही बात
अपनी मर्जी से कहाँ
अपने सफ़र के हम हैं
रूख हवाओं का जिधर है
उधर के हम है
लेकिन क्यों हवाएं हमारे रुख के साथ नहीं हैं
क्यों इस कायनात कि सारी साजिशे हमारे खिलाफ रहीं हैं
क्यों '

रविवार, 14 अगस्त 2011

इस आजादी पर

घुमकड़ी का अपना अलग मजा है आप अकेले होकर भी एक नए शहर में एक नई जगह पर अकेले नही होते क्योंकि वहां बहुत कुछ होता है आपके जानने समझने, देखने और महसूस करने के लिए... दिल्ली की दुनिया में रहकर पंजाब मेरे लिए सिर्फ फिल्मों में दिखने वाली एक ऐसी जगह थी जहाँ बेहद खूबसूरत सरसों के खेत होते है ..इससे ज्यादा कभी मैंने सोचा ही नही शायद ....या जरुरत ही नही पड़ी सोचने की
लेकिन जरूरतों से जुस्तजू के दरम्यान एक रात में ही मेरे रहने का ठिकाना बदला और ६ सितम्बर २०१० को मैं लुधियाना आ गई ....फिर एक सिलसिला शुरू हुआ घुमकड़ी के उस शौक को पूरा करने का जो दिल्ली में रहते हुए सिर्फ कनाट प्लेस, लाजपत नगर, साकेत या मंडी हाउस तक सीमित था...हालाँकि मैं अपना ये शौक बहुत बेहतरी से तो पूरा नही कर पाई ..लेकिन एक छोटी से अनजानी सी अनसोची सी यात्रा हुई ..


फिरोजपुर
का गाँव हुसैनीवाला, पाकिस्तान की सरहद से सटा...मेरी हमेशा से पाकिस्तान जाने की इच्छा रही है .....वजह है ये जानना कि आखिर कौन सी ऐसी खाई है जिसने एक देश को दो बना दिया और दो पड़ोसियों को कभी एक होने नही दिया..लेकिन जिदगी की दूसरी  और जरूरतों और दबावों के आगे ये इच्छा जरा साइड पर ही रहती थी ...दरसल मैं फिरोजपुर अखबार के लिए एक स्टोरी करने गई थी ...कुछ पता नही था कि जहाँ जाना है वो जगह कितनी दूर है , वहां जाने का साधन क्या है और हा रात से पहले घर भी लौटना था...मुझे मुहार जमशेर नाम के एक गाँव में जाना था जो फिरोजपुर से भी १२० किलोमीटर दूर था और दोपहर के  3 :३० बजे फिरोजपुर से इस गाँव के लिए निकलने का मतलब था वापसी में देरी और असुरक्षा... इसलिए एक जानने वाले से पूछा  कि यहाँ सरहद पर बना कौन सा गाँव सबसे नजदीक है ..तब उसने हुस्सैनिवाला के बारे में बताया.. तब नही सोचा था कि आज मेरी वो साइड की हुई इच्छा यूँ पूरी होने वाली है.. गाँव पहुंचकर वहां बने बोर्डर के बारे में पता चला तो सोचा कि यहाँ देखते है क्या होता है ..बस फिर रास्ता ही सब कुछ जानता  था और हम निरे अजनबी एक मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे ...जब पहुंचे तो दिखी
दो सरहदे...एक तरफ पाकिस्तान ....एक तरफ हिन्दुस्तान
एक तरफ पाकिस्तान के लोग ..दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के
इधर हमारे सिपाही ..उधर उनके
एक दूसरे के आगे पैर ठोकते हुए ...
एक दूसरे को अकड़ दिखाते हुए ..
अपने अपने झंडे को ऊँचा उठाते हुए ..
वहां से पाकिस्तान जिंदाबाद  के नारे लगा रहे कुछ लोग
तो यहाँ से हिन्दुस्तान की जयकार करते  नौजवान
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एक साथ बहुत से सवाल उमड़ घुमड़ आये ये सब देख कर कि
ये सब क्यों हो रहा है ?
किसने बनवाया होगा ये बोर्डर ?
जब दुश्मनी है तो ये ठोक बजाने का दिखावा क्यों ?
 क्या मिल जाता है एक दूसरे के झंडे को निचा दिखाकर ?
क्या कभी मन नही करता होगा आपस में आम लोगों की तरह हसने बोलने का ?
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जब वहां एक सिपाही से इन सवालों के जवाब लेना चाहा तो उसने कहा हमें मीडिया वालों से बिना इजाजत बात करने की परमिशन नही है
जब तक वहां सेरेमनी चलती रही सिर्फ दुश्मनी दिखाई दी
जब वो सेरेमनी ख़त्म हुई और हम लोग बाहर आने लगे तब किसी को बातें करते सूना .." ये लोग सिर्फ आधे घंटे की इस सरेमोनी में ही ये ठोक बजाते है रात को साथ बैठकर दारु पीते है ..
फिर देखा की सीढियों से उतरते हुए पाकिस्तान के कुछ बच्चे हमें हाथ हिलाकर बाय कर रहे है
कुछ मुस्कुरा रहे हैं
कुछ नजरों में निगाहे डालकर कुछ ढूँढना चाह रहे है
ये वो बातें है जिन्हें लिखकर बयाँ नही किया जा सकता
हां आप चाहे तो पढ़कर महसूस जरुर कर सकते हैं ...
ये चिंदी चिंदी से एक दो पल जब आँखों के आगे दुबारा तैरते है तो लगता है यहाँ मैं रीट्रीट सेरेमनी नही
रीथिंक टू रीबिल्ड सरेमोनी देखने आई थी
यानि दुबारा से ये सोचना की हमें क्या बनाना है
दो दुश्मन देश??
दो दोस्त??
एक टुटा हुआ एक रूठा हुआ देश??
या फिर अगर हम ये सारी सरहदे ही मिटा दें !!!!! सिर्फ बातों में नही सच में ...सच में जाये और वो लोहे की तारें काट आये किसी औजार से
अब मिट जाना चाहिए इन सरहदों का अस्तित्व...हम दोनों देशवासी तो facebook पर कब से एक दूसरे के दोस्त हैं
हमारा दिल कब से धड़क रहा है विभाजन में अपने पीछे छुट चुके परिवारों के लिए

हम कहाँ चाहते है अब लड़ना झगड़ना हम तो चाहते है पाकिस्तान के खूबसूरत शहरों में जाकर छुट्टियाँ बिताना ...(इस आजादी दिवस पर पहली बार बेहद गुलाम अनुभव कर रही हूँ मैं खुद को)



गुरुवार, 4 अगस्त 2011

उसका खेत और मेरा दिल

 (सावन का महीना है मगर इस बार जुलाई में मानसून मुंह बनाये बैठा है
न तन भीग पाया न मन , हम कवि दिल लोगों को बारिश कुछ ज्यादा ही पसंद होती है , मुझे बहुत पसंद है मेरे लिए शायद antiseptic की तरह  है. खैर दिल दे जरा हटकर देखा तो वो खेत दिखाई दिए जो बारिश के इन्तजार में है वो किसान जिसके लिए शायद ये बारिश antiseptic नही बल्कि अमृत की तरह थी जीवनदायी आखिर लुधिअना में आज काफी दिन बाद सुबह का स्वागत बरखा ने किया है)


मेरी नजरें भी थी आसमान तरफ
वो भी देख रहा था
बनते बिगड़ते बादलों को
मेरी रूह भी थी उदास और प्यासी
 वो भी बेचैन था सूखे से
हम दोनों रो रहे थे
और चाहते थे
कि
काश ये
आकाश भी रो दे
हमारे आंसुओं को धो दे
मैं  नही खा पा रही थी कुछ भी, कुछ दिनों से
और
उसके घर नही बना था कुछ, बहुत दिनों से
बहुत  दिनों से हमारे दिन थे सीले सीले
और रातें गीली गीली
पर हम भीग नही पाये थे
जीत नही पाए थे
अपनी उम्मीदों से
 उसका खेत ख़ाली था
और मेरा दिल 

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

मैं लिखना चाहती हूँ

 (मेरे लिए जिंदगी में लिखना बहुत जरुरी है ..उतना ही जितना कि जीना- खाना-पीना
जिन दिनों नहीं लिख पाती वो दिन बेचैन होते हैं और रातें करवट करवट
लेकिन कई बार हमारे लिखने का विषय बिलकुल rigid  हो जाता है यानि हम एक ही दुनिया के इर्द गिर्द घूमते रहते है
सावन, साजन, मोहब्बत, मंजिले....ये कुछ ही सब कुछ नही हैं
अगर हम शब्दों को जोड़कर किसी बात को बेहतरी से कहने का हुनर रखते है
तो क्यों न कुछ ऐसा कहें जिससे एक दिशा मिले हमें भी पढने वाले को भी
कुछ ऐसा ही करने की कोशिश थी मगर फिर ये कविता बन गई ...)

मैं लिखना चाहती हूँ
कुछ ऐसे लेख जो जुड़े हो देश, दुनिया और समाज से
कुछ ऐसी कवितायेँ
जिनमे न हो बारिश, फूल, भवरे, रास्ते, मंजिले और तुम्हारा जिक्र
जिनमे हो भूख, तड़प, समानता, संघर्ष और क्रांति की बातें
..
..
.
आज भी जब में लिख रही हूँ कुछ
तो चाहती हूँ कि
लिखूं
एक मीडिया मुग़ल का अंत (रुपेर्द मर्डोक के अखबार न्यूज़ ऑफ़  द वर्ल्ड के  बारे में )
समाज सेवी अन्ना और अड़ियल सरकार के बीच चल रहा द्वन्द
कुछ कर नही सकती मगर कहूँ कुछ
उन बम धमाकों के बारे में जो आतंकियों के लिए थे
महज जन्मदिन के पटाखे
मगर उनसे बेडोल हो गई थी कई जिंदगियां
और भरा पूरा
हँसता खेलता
अपनी चमक से
सारी दुनिया को रोशन करता
एक शहर
मैं लिखना चाह रही हूँ बहुत दिनों से
पद्नाभ्स्वामी मंदिर के खजाने
और
उस खजाने को खोलने की याचिका डालने वाले
व्यक्ति की मौत से
पनपे अंधविश्वास
और अथाह दौलत
के इस्तेमाल के बारे में कुछ
जब पीने अखबार में देखी मर्लिन मुनरो की मूर्ति की तस्वीर
जिस पर टिकी हैं सारी दुनिया की निगाहें
और जिस ड्रेस के कारण ही
कहा जाता है कि
हो गया था उसका तलाक
हां मैं लिखना चाह रही थी बहुत कुछ इस महंगाई के मौसम
में टाटा के ३२ हजार का घर बनाने के प्रोजेक्ट के बारे में कुछ
देखो न
कितना कुछ था मेरे पास लिखने के लिए
और मैं बस लिखती रही
तुम्हे
तुम्हारे इन्तजार को
हर बार आने वाली इस सुखी सी बहार को

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

बारिश, धरती, आसमान मैं और तुम ..मेरे प्रिये

(एक ऐसे समाज में जहाँ लड़के नौकरी करने वाली लड़कियां ढून्ढ रहे है
और लड़कियों का अपने कर्रिएर के लिए शादी बच्चे यहाँ तक कि कई बार प्रेम को भी दरकिनार कर देना आम हो गया है
ये कविता उस औरत कि बात को बयाँ करने के लिए है जो अपने पति से बहुत प्यार करती है और .... उसके प्यार के साथ ही अपने सपनो को सतरंगी बनाना चाहती है जो इक्कीसवी सदी में रहकर भी सिर्फ अपने लिए नही जी रही...अपनों के लिए जी रही है
ये उसका नारीत्व भी हो सकता है और उसकी आदत भी जिसे वो आज के आधुनिक युग में justify  कर पाती है )




आज फिर आई बारिश
दरवाजे पर हुई जोरों से आवाज
बहुत दिनों बाद अनमनी सी नींद
जल्दी खुल गई आज
मगर मैंने दरवाजा नही खोला
नही देखा बाहर
झांककर
किस तरह पेड़ हरे भरे हो गए है
बूंदों का स्पर्श पाकर
किस तरह हवा के सर्द झोंकों से
पंछी घोंसलों में अलिगनबद हो गए है
किस तरह धरती भीग रही है
चुपचाप एक शांत अहसास के साथ
अहसास जो कह रहा है
कि दूरिया हमेशा फासले नही होते
और नजदीकियां हमेशा करीब होने का प्रमाण पत्र नही दे सकती
जब आसमान धरती को ये अहसास दे सकता है
जब बूंदे पत्तो को चूम सकती है
पंछी आजाद गगन को छोड़ अपने घरोंदे  में
रम सकते है
तो तुम क्यों नही हो सकते मेरे सबसे करीब
हमेशा नजरों के सामने होकर भी
क्यों मैं हमेशा कहती हूँ तुमसे आधी बात
और छुपा लेती हूँ आधी
बताने की चाहत रखते हुए भी
क्यों मुझे लगता है कि मेरे जीवनसाथी
तुम नही समझोगे इस बात को
सुनोगे तो नही दोगे फिर मेरा साथ
तुम रूठ जाओगे मुझसे
मन्वाओगे अपनी जिद
थोप दोगे अपना निर्णय
चादर, परदे बच्चों का स्कूल सब कुछ तुम कहते गए
मैं रजामंद होती गई
मेरी पसंद का सवाल ही नही उठा
मैं खो गई तुम्हारी दलीलों
और दुनिया  की मुझसे जयादा समझ होने के तर्क में
मगर मेरे प्रिये अब जब मैं
फिर से रंगना चाहती हूँ अपनी
जिंदगी को अपने रंग में
वो रंग
जिस पर तुम्हारे प्यार की छाया
और मेरी उम्र की धूप ने
डाल दिया था पर्दा
तो दिल से तुम्हे बताकर
तुम्हारी तस्वीर से ढेरों बातें करके
अपनी आखों से तुमसे सबकुछ कहकर
और होठों को सीकर
भर दिया है नौकरी के लिए आवेदन पत्र
इस उम्मीद के साथ की तुम इसे सिर्फ मेरा नही समझोगे
हमारा समझ कर स्वीकार करोगे
और तुम्हारी सहमति के साथ मैं
महसूस कर सकूंगी
आसमान और धरा की दूरियों के बीच पनपते
हमेशा करीब होने के अहसास को
और
पी सकूंगी तुम्हारे प्यार की
वो बूँद जिसका मैंने  चातक की तरह
इन्तजार किया है
हर सावन को स्वाति नक्षत्र  मानकर

कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...