सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

कमजोरी

उस दिन
हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा
काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी
ऐसा कोई ड्रायर होता
.
.
फिर मुझे याद आया
आंसुओं का सूख जाना, एक बीमारी होता है
ड्राई आई सिंड्रोम नाम की एक बीमारी
.
.
मतलब आंसू सूख जाना बीमारी होता है
और
आंसू आते ही रहें
रुकें ही ना...तो
कमजोरी







सोमवार, 30 दिसंबर 2019

थाईलैंड- समंदर को सीने से लगाए खड़ा एक देश


समझ नहीं आता कहां से शुरू किया जाए। 
चार साल पहले पासपोर्ट बनवाने में हुए संघर्ष से।
दो साल पहले देखे गए विदेश यात्रा के सपने से या फिर बिलुकल अभी से जब हम इस सपने को पूरा करके वापस देश लौट आए हैं।

सपनों को जी लेना बहुत खूबसूरत होता है। 

लेकिन इन्हीं सपनों को पूरा करने के पीछे इतनी लंबी एक कहानी होती है...कि बताने का सोचने से पहले ही एक अजीब सी थकान महसूस होने लगती है।

फिर लगता है, चलो छोड़ो, क्या बताना, अब तो हो गया...

लेकिन
...बताना जरूरी होता है...बताने से अहसास होता है कि कुछ लम्हे जो कुछ लम्हों के लिए ही आए थे, लेकिन उन लम्हों को लाने में कितने घंटों, दिनों, महीनों और साल का वक्त लगा...और कितनी मजेदार कोशिशें हुईं...और उन सपनों को पूरा करने के बीच कितनी बार हम लड़े, झगड़े, हंसे, रूठे, रोए और फिर जुट गए उन्हीं कोशिशों में :) 

शुरुआत हुई थी यूरोप यात्रा के प्लान से बीच में आए दुबई और सिंगापुर मगर इन पर भी बात नहीं बनी...और हम हाल ही में होकर आए हैं थाईलैंड।

थाईलैंड, जो बजट, छुट्टियों, पसंद और मौसम के हिसाब से फिलहाल सबसे मुफीद था।पहली बार पासपोर्ट पर स्टैम्प लगने की खुशी जाहिर नहीं की जा सकती, उसे आप सिर्फ एक ट्रेवलर के चेहरे पर देख सकते हैं। नई दिल्ली से बैंकॉक एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद पासपोर्ट पर वीजा स्टैम्प की इस प्रोसेस से गुजरना मुश्किल भरा लगा।  

थाईलैंड के लोग अंग्रेजी भी बहुत कम समझते हैं। वहां लोगों से बात करने में काफी मुश्किल हो रही थी...मदद कर रहे थे, तो सिर्फ साइनबोर्ड्स। उन्हीं की मदद से जब दो-तीन घंटे अलग-अलग लाइनों में लगने के बाद पासपोर्ट पर स्टैम्प लगी, तो उस वक्त ऐसा लगा जैसे हम किसी सपने को पाने की पहली सीढ़ी चढ़ गए हों।


इसके बाद थी बैंकॉक से फुकेट की फ्लाइट और बीते 14 घंटे से भूखे-प्यासे हम।

तो हम भारत के रुपयों को थाईलैंड के बाट में कन्वर्ट करवाकर जो करंसी अपने साथ लाए थे, उसमें से पहला खर्च किया पानी की बोतल पर , जो हमें एयरपोर्ट पर सौ बाट की मिली...और इसके बाद मैं अपने नेचर के मुताबिक अपने माथे पर तरेरे आने से रोक नहीं पाई...वो पानी पी नहीं पाई और बस ये फैसला करके रह गई कि यहां कुछ नहीं खाऊंगी...चाहे भूखी मर जाऊं।

लेकिन अपने नेचर के मुताबिक आकाश टॉयलेट का बहाना लेकर उठे और एयरपोर्ट से ही 180 बाट का सैंडविच लेकर आ गए, जो पानी की तुलना में मुझे काफी सस्ता लगा और भूख पर काबू ना हो पाने के कारण हम दोनों ने उसी सैंडविच से डिनर और ब्रेकफास्ट दोनों कर लिया। इस तरह सैंडविच के सहारे हम फुकेट पहुंचे, क्योंकि फ्लाइट में हमें जो मील सर्व हुआ, उसमें वेजिटेरियन ऑप्शन ही नहीं था।फुकेट एयरपोर्ट पर पहुंचकर जो कैब हमें लेने आने वाली थी, उसे ढूंढने में फिर लैंग्वेज प्रॉब्लम सामने आई। जिस जगह कैब को मिलना था, वहां हमारे नाम का कोई बोर्ड नहीं था। काफी मशक्कत के बाद किसी तरह वहां खड़े लोगों से बात करके मालूम चला कि हमें लेने आने वाला स्टाफ अभी खुद ही एयरपोर्ट नहीं पहुंचा है। मेकमाईट्रिप की ऐसी कृपा हम पर दूसरी बार बरस रही थी... :(

मगर उस वक्त हमारे अंदर गुस्सा करने की भी हिम्मत नहीं थी। कैब ड्राइवर हमें फुकेट एयरपोर्ट से हमारे होटल तक ले गया, तो रास्ते में हमने उससे काफी बातें कीं। वो अंग्रेजी समझता था और थोड़ा बहुत भारत के बारे में भी जानता था। हमने उसे कुछ इंडियन कुकीज खिलाईं, तो उसने भी हमें अपनी एक इच्छा बताई। वो हमारे देश के सिक्किम को देखना चाहता है। उसने कहा, उसके पास फिलहाल इतने पैसे नहीं है, लेकिन अगर पैसे जोड़ पाया, तो सिक्किम घूमने जरूर जाएगा।

उसने इंडियन कुकीज की भी बहुत तारीफ की। हमने भी उससे फुकेट में इंडियन फूड के बारे में पूछा। उसने हमें बताया कि हमारे होटल से 15-20 मिनट दूर हमें अच्छे इंडियन रेस्तरां मिल जाएंगे। लेकिन उस वक्त हम भूखे होने के साथ-साथ बहुत थके हुए भी थे, इसलिए होटल से उम्मीदें लगाकर सीधे वहीं पहुंचना ज्यादा बेहतर लगा।

होटल पहुंचने के बाद जाहिर तौर पर पहला काम था वहां का मेन्यू चेक करके कुछ ऑर्डर देना, ताकि हमारे फ्रेश होने तक कुछ खाने को मिल जाए।

होटल के उस मेन्यू में एक चीज जो अवेलबल थी और समझ आ रही थी, वो थी पास्ता। इंडिया में मैं बहुत अच्छा पास्ता बनाती भी हूं और मुझे खाने में भी अच्छा लगता है...जुबान पर वही स्वाद आया और मुझे लगा कुछ नया ट्राई करने की बजाय इस समय यही ऑर्डर कर देना सही होगा।

लेकिन सारी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए पास्ता के नाम पर मोटे-मोटे नूडल्स आए, जिसमें कुछ अजीब स्मेल थी, जो खराब नहीं थी, लेकिन मेरे लिए नई थी और बर्दाश्त से बाहर भी... मैं वो नूडल्स या पास्ता भी नहीं खा पाईं...उस दिन पहली बार मैंने गार्लिक ब्रेड खाई, जो उन नूडल्स के साथ दी गई थी। और उस दिन से ग्रालिक ब्रेड मेरी फेवरेट चीजों में भी शामिल हो गई। आखिर में इंडिया से लाई गईं कुकीज और नमकीन खाकर ही मैंने पेट भरा।

भूख और थकान के मारे एक अजीब से नेगेटिविटी महसूस हो रही थी। लग ही नहीं रहा था कि घूम भी पाएंगे। मगर हर नई सुबह कुछ नया  लेकर आती है और फुकेट में हमारी पहली सुबह कुछ ऐसी ही थी...बहुत खूबसूरत। सारी भूख औऱ थकान मिटा देने वाली।होटल के बुफे में नॉनवेज के साथ वेज ऑप्शन भी थे। और सुबह तक कहीं न कहीं मैंने खुद को मेंटली प्रिप्येर कर लिया था कि खाने के मामले में कम्प्रोमाइज करना पड़ सकता है।

पहला दिन

पहली सुबह हम निकले जेम्स बॉन्ड आईलैंड , बैटमैन केव और साथ में आने वाली बहुत सी खूबसूरत जगहों की सैर पर।

होटल से हमें फेरी स्टॉप तक ले जाने के लिए एक मिनी बस आई। इसके बाद हम फेरी पर सवार होकर पहली बार किसी आईलैंड को देखने जा रहे थे। फेरी का स्टाफ बहुत ही इंटरटेनिंग था। वहां एक बड़े डाइनिंग हॉल जैसे माहौल था। फेरी के चारों तरफ बैठने के लिए बैंच थीं और बीच में एक बड़ी टेबल जिस पर पानी, कॉफी,चाय, कुकीज और कोल़्डड्रिंक की व्यवस्था की गई थी। फेरी पर बैठने के कुछ ही देर बाद सभी लोगों का फोटोज और सेल्फी लेने का सिलसिला शुरू हो गया। फेरी ट्रेवल हमने मुंबई में भी किया था, लेकिन वहां का समंदर और यहां का समंदर जमीन-आसमान का अंतर रखता है।

होटल से हमें फेरी स्टॉप तक ले जाने के लिए एक मिनी बस आई। इसके बाद हम फेरी पर सवार होकर पहली बार किसी आईलैंड को देखने जा रहे थे। फेरी का स्टाफ बहुत ही इंटरटेनिंग था। वहां एक बड़े डाइनिंग हॉल जैसे माहौल था। फेरी के चारों तरफ बैठने के लिए बैंच थीं और बीच में एक बड़ी टेबल जिस पर पानी, कॉफी,चाय, कुकीज और कोल़्डड्रिंक की व्यवस्था की गई थी। फेरी पर बैठने के कुछ ही देर बाद सभी लोगों का फोटोज और सेल्फी लेने का सिलसिला शुरू हो गया। फेरी ट्रेवल हमने मुंबई में भी किया था, लेकिन वहां का समंदर और यहां का समंदर जमीन-आसमान का अंतर रखता है। आप नीले समंदर के बीचों बीच हैं और चारों तरफ आपको हरे-भरे पहाड़ नजर आ रहे हैं। आसमान बिलकुल साफ है। और इसी फेरी राइड के बीच आपको मौका मिलता है, केनोइंग का। 

आपकी फेरी समंदर के बीच में ही एक दूसरी फेरी के सहारे लंगर डालती है और फिर आपको फेरी से एक-एक केनोई पर ट्रांसफर किया जाता है। इसके सहारे आप समंदर को और करीब से महसूस कर पाते हैं और उन जगहों तक पहुंच पाते हैं, जहां से फेरी या बोट के जरिये नहीं जाया जा सकता।जैसे हम केनोइंग करते हुए पहुंचे बैटमैन केव में। यकीन मानिए बहुत डरावना और रोमांचक सीन था। आप एक अंधेरी सी गुफा में पानी के बीचोबीच हैं और गुफा की छत पर हजारों चमकादड़ उलटे लटके हुए हैं। बस कल्पना कीजिए...इसके आगे बताया नहीं जा सकता कुछ।इसके बाद केनोइंग के दूसरे पड़ाव पर हमने की समंदर के बीच बने ऐसे पहाड़ों की सैर जो जानवरों की अलग-अलग शेप्स में ढल गए हैं। 

कोई हाथी जैसी सूंड बाहर निकालकर खड़ा है, तो कोई जिराफ जैसी गर्दन।इसके बाद हम पहुंचे जेम्स बॉन्ड आईलैंड। वही जेम्स बॉन्ड आईलैंड, जहां 1974 में जेम्स बॉन्ड मूवी द मैन विद द गोल्डन गन की शूटिंग हुई थी। तभी से इसे जेम्स बॉन्ड आईलैंड के तौर पर जाना जाता है।सतही तौर पर देखें, तो ये सिर्फ एक लंबा सा पहाड़ है, जो समंदर के बीचों बीच तना खड़ा है, एकदम अकेला। लेकिन इसे देखना अपने आप में जैसे एक पूरे दृश्य और किसी आइकोनिक फिगर को देखना है, बिलकुल इंडिया गेट या गेटवे ऑफ इंडिया की तरह ही। फेरी ने हमें यहां एक घंटे रुकने का मौका दिया और यहां से लौटने के बाद हमें फेरी पर ही मिला लंच।

जैसी कि उम्मीद थी लंच में वेजिटेरियन ऑप्शंस में सिर्फ फ्राइड राइस और अनियन रिंग्स ही थे। हमने वही खाकर पेट पूजा की और वापसी में थकान के चलते समंदर के बीच से उठती ठंडी हवाओं में कब नींद आ गई, पता नहीं चला। सुबह आठ बजे से शुरु हुआ हमारा ये सफर शाम साढ़े पांच बजे खत्म हुआ और हम वापस अपने होटल पहुंच गए।

कुछ देर आराम करने के बाद हमें करना था डिनर का इंतजाम, जिसके लिए होटल के मेन्यू पर डिपेंड नहीं रहा जा सकता था। कुछ देर आराम करने के बाद करीब आठ बजे हम डिनर के लिए निकल पड़े।

अब हमें एक्सप्लोर करना था हमारे होटल के काफी नजदीक स्थित पटोंग बीच और बांग्ला स्ट्रीट, जो दुनिया भर में मशहूर है। हम यहां सुस्ताने के मूड में सिर्फ खाना खाकर लौटने के लिए पहुंचे थे, लेकिन शांत से शहर से गुजरने के बाद जैसे एक नई सी दुनिया में हमारा स्वागत हुआ।

ओपन क्लब्स में पोल डांस करती बेहद लंबी-ऊंची डांसर्स, हर तरफ रोशनी और रंगों से नहाया हुआ माहौल। सड़क के दोनों तरफ बने शॉपिंग स्टोर्स और इतनी चहल-पहल जैसे दिन अभी निकला हो और हर कोई पूरी ऊर्जा से लबरेज काम में जुटा हो।हालांकि हमारा ध्यान अगले ही पल उस चकाचौंध से ज्यादा इंडियन वेज फूड वाला रेस्तरां ढूंढने पर गया, तो हमने उसी के बारे में पूछताछ शुरू की। वहां हमें मिला बॉम्बे फूड रेस्तरां। ये रेस्तरां जैसे अपने घर की तरह बांहें फैलाएं हमारा फेवरेट खाना सजाए स्वागत कर रहा था। यहां हर तरह का इंडियन फूड बिलकुल इंडियन अंदाज में परोसा जाता है। बस कहने की देर है, और आपका ऑर्डर हाजिर। पूरे दो दिन बाद दाल, रोटी और सब्जी खाकर जैसे दिल और पेट दोनों खुश हो गए।


दूसरा दिन

दूसरे दिन हमें जाना था फी-फी आईलैंड, जो फुकेट के सबसे पॉपुलर टूरिस्ट स्पॉट्स में से एक है और दुनिया भर में मशहूर भी। ये थाईलैंड में मौजूद सभी आईलैंड्स का शाहरुख खान यानी सुपरस्टार है। इसकी खूबसूरती पहली ही नजर में जैसे दीवाना कर देती है। समंदर का नीला-हरा रंग और उसके बीच में बने पहाड़.... यहां पहुंचते हुए दिखने वाले नजारों के लिए कोई शब्द या परिभाषा मुझे तो नहीं सूझी...कुछ देर तस्वीरें खींचने के बाद मन हुआ जैसे हर एक दृश्य को बस चुपचाप हमेशा के लिए अपने भीतर जज्ब कर लिया जाए। फी-फी आईलैंड पहुंचकर स्वीमिंग, स्नॉरक्लिंग का मौका भी मिलता है और अगर आप ये नहीं करना चाहता, तो दिल खोलकर इस आईलैंड पर मौज मस्ती कर सकते हैं। यहां पानी के बीच दूर तक बिना किसी खतरे के जाकर स्विमिंग और वाटर स्पोर्ट्स का मजा लिया जा सकता है। 

इसके बीच सी-फेसिंग रेस्तरां में ही लंच की भी व्यवस्था है। पास ही मार्केट भी है, जैसे यहां के सोविनियर प्रोडक्ट खरीदे जा सकते हैं। दूसरा दिन पूरी तरह फी-फी आईलैंड के नाम रहा और डिनर के लिए हम फिर बांग्ला स्ट्रीट ही पहुंचे। यहां खाना खाने के बाद हमें नजर आई क्रिसमस डेकोरेशन और लाइव म्यूजिक परफॉर्मेंस...जो कि काफी खूबसूरत थी। तीसरे दिन हमें फुकेट से क्राबी जाना था, इसलिए हम समय से  होटल लौट आए...

एक बात बताना शायद मैं भूल गई...अगर आप टूर पैकेज पर आए हैं, तब तो आपके लिए कार बुक होती हैं। लेकिन अगर आप बिना पैकेज यहां आते हैं, तो थाईलैंड में लाइफलाइन का काम करती हैं स्कूटी। यहां 24 घंटे के लिए 200 बाट पर स्कूटी किराए पर मिल जाती है। फिर आप पूरा शहर नाप सकते हैं। इसके अलावा यहां बाइक टैक्सी भी हर चौराहे पर खड़ी मिल जाती है। यहां हेलमेट लगाने या तीन लोगों के टू-व्हीलर पर साथ ना बैठने जैसे कोई नियम नहीं हैं। हमने बाइक टैक्सी की मदद से ही पटोंग बीच और बांग्ला स्ट्रीट एक्सप्लोर की।


तीसरा दिन

सुबह 7 बजे ही हमें क्राबी के लिए निकलना था...हम वहां लॉन्ग टेल बोट से पहुंचे और 12 बजे होटल में चेकइन किया। अच्छी बात ये रही कि क्राबी में हमारा होटल आओ नांग बीच के बिलकुल सामने था और होटल के सामने इंडियन रेस्तरां के एक से बढ़कर एक विकल्प। यहां आकर ना भूखा रहना पड़ा ना ही वेज फूड ढूंढने की मशक्कत करनी पड़ी। इतना ही नहीं, यहां हमें मिला गोविंदा रेस्तरां, जो कृष्ण भक्त चलाते हैं। 

यहां का वातावरण और खाना इतना अनोखा और अद्भुत था कि बिना खाने की जरूरत के भी हम यहां जाकर बैठ जाते थे। इस रेस्तरां में दाखिल होने के लिए आपको चप्पल जूते बाहर निकालने होते हैं। यहां बुफे सिस्टम भी है और आप अपनी पसंद से कुछ ऑर्डर भी कर सकते हैं। नीचे बैठकर खाना खाने की ट्रेडीशनल व्यवस्था भी है और टेबल चेयर के साथ मॉर्डन अरेंजमेंट भी। पहले दिन हमने आओनांग बीच एक्सप्लोर किया और आसपास की मार्केट देखी।


चौथा दिन

चौथे दिन हमें सुबह आठ बजे ही पोडा आईलैंड के लिए निकलना था। फिर एक बार हम स्पीडबोट में सवार होकर निकल पड़े और अब जो नजारे रास्ते में थे, वो फी-फी आईलैंड से भी ज्यादा अद्भुत थे। यहां स्पीडबोट में जाने से पहले ही आपके चप्पल जूते जमा करवा लिए जाते हैं। 

थाईलैंड को जितना घूमा, वहां एक बात सामने आई कि पर्यावरण संरक्षण और साफ-सफाई को लेकर काफी जागरुकता है। पोडा आईलैंड की व्हाइट सैंड में आप जमकर मस्ती कर सकते हैं। यहां कई तरह की वाटर एक्टिविटीज करने का भी मौका मिलता है और फिर सनबाथ का ऑप्शन तो है ही। यहां सनस्क्रीन और टॉवल लेकर जाना बहुत जरूरी है, वरना आपको मेरी तरह टैनिंग भी हो सकती है।

पांचवा दिन 

पांचवें दिन हमारी वापसी थी और हम थाईलैंड की खूबसूरत और यहां मिली खूबसूरत यादों को अलविदा कहकर 18 घंटे लंबे सफर पर निकल पड़े दिल्ली वापस आने के लिए।


[ बहुत कुछ लिख देने के बाद भी काफी कुछ छूट जाता है, अगर आप भी कभी फुकेट या क्राबी जाने का प्लान करें और कुछ जानकारी चाहिए हो, तो मुझसे फेसबुक पर कॉन्टेक्ट कर सकते हैं- https://www.facebook.com/himani.diwan ]


मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

कोट और पुतली की प्रेम कहानी


एक शहर का नाम है कोट और नजदीक में एक गांव है, जिसका नाम है पुतली। 

अक्सर आस-पास रहते हुए आपस में काफी अंतर होते हुए भी साथ चलने और साथ होने की इतनी आदत हो जाती है कि उस अंतर को खत्म करके एक हो जाने का अहसास हर पल दिलो-दिमाग में हावी होने लगता है।
शायद कोट और पुतली के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा और वो एक होकर कोटपुतली बन गए।
शायद ये लवस्टोरीज को लेकर मेरा अतिरेक ही है कि मैंने अपनी कल्पना से ये कहानी गढ़ दी है...मुझे गढ़ते हुए अच्छा लगा और उम्मीद पाल चुकी हूं कि पढ़ने वालों को पढ़ते हुए अच्छा लगेगा...इसके आगे की कहानी ये है कि कोटपुतली दिल्ली से 175 किमी दूर है, गुड़गांव से 128 किमी, जयपुर से 105 किमी और अलवर से 70 किमी। कोटपुतली की लवस्टोरी जो मैंने अपने मन से गढ़ दी है उसे आप अपनी आंखों से देख सकते हैं वहां जाकर जहां मेरी इमेजिनेशन में कोट और पुतली की शादी हुई थी। उस जगह का नाम है जस्ट देसी। 
Just Desi एक ठौर है दिल्ली से जयपुर जाते वक्त सुस्ताने के लिए। शहर की आपाधापी के बीच खुद को एक 

ऐसा मौका देने के लिए जो कम से कम एक महीने के लिए आपको तरोताजा रख सकता है। यहां आपको खेतों की रौनक मिलेगी और चाहे तो एक-दो हाथ बुआई-कटाई में लगाकर खेती को समझ भी सकते हैं। ताजा और एकदम ऑर्गेनिक सब्जियां लेकर भी आ सकते हैं।

प्रकृति अपने आप में जादुई होती है और मिट्टी को आकार लेते देखना भी मुझे उस जादू का ही एक हिस्सा लगता है। यहां आप ये जादू सिर्फ होते हुए ही नहीं देखते खुद वो जादू कर भी सकते हैं। यहां क्ले मॉडलिंग का एक कॉर्नर बना है, जहां आप अपनी पसंद के बर्तन बना सकते हैं...ये बर्तन अपने घर ले जाकर हमेशा के लिए यादों को भी सहेज सकते हैं।
अगर आपको लगता है कि चक्की पीसने का कनेक्शन सिर्फ जेल जाने से है, तो आप गलत हैं। एक जमाने में
जब हर घर में चक्की होती थी और महिलाएं अनाज हर रोज उसी चक्की पर पीसा करती थीं...वो जमाना जस्ट
देसी में फिर से जी उठता है, यहां बने चक्की कॉर्नर के साथ। बच्चों को उस जमाने की झलक दिखाने का ये अच्छा तरीका हो सकता है।

फिर चूल्हे की रोटी और बिना मशीन के दूध से मक्खन निकालने का तरीका, सूरज की परछाई से समय देखने की  ट्रिक जिस तरह आपके बच्चे यहां देखेंगे, शायद वो शहरों में देखने को ना ही मिले। 
ये ठौर मेन सड़क पर है, लेकिन इसके लिए सीढ़ियां उतरकर एक नई दुनिया में जाना पड़ता है, ये दुनिया सड़क पर तेज रफ्तार से जाती गाड़ियों से शायद नजर ना आए, इसलिए जीपीएस ऑन करके सही पते तक पहुंचना सही रहता है। मगर ज्यों-ज्यों आप सीढ़ियां उतरकर उस दुनिया में जाते हैं, उसके बाद के पल हमेशा के लिए यादगार बन जाते हैं।


ऐसे समय में जब नौकरी से छुट्टी मिलने का झंझट हो और एक ऑफ में ही दुनिया समेटनी पड़े, तब इस ठौर का 
रूख करके दुनिया बदलने का अनुभव लिया जा सकता है।








गुरुवार, 15 जून 2017

फिल्में सिर्फ देखें ही नहीं, बचाना भी सीखें



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फिल्में देखने का शौक है, तो उन्हें बचाने का शौक भी पालना होगा, वरना बचेंगी नहीं फिल्में। पहली बोलती फिल्म आलमआरा का एक भी प्रिंट उपलब्ध नहीं हैं।

शुक्रवार, 2 जून 2017

मैं, वो, ये सब

वो नहीं चाहता क‌ि
मैं उसे चाहूं
तो मैं उसे चाहूं कैसे

मैं खुद को भी चाहूं
तो उससे अलग कैसे रहूं
मैं रहती हूं अब
मैं, वो हूं जैसे

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

मैं एफर्टलेस हो जाना चाहती हूं


तुम्हें पाने की इतनी प्रार्थनाएं की हैं।
इतने मंद‌िरों की घंट‌ियां बजाई हैं।
इतने व्रत रखे हैं।
आधी-आधी रात में उठकर इतने-इतने ख्वाब बुने हैं
इतनी-इतनी कव‌िताएं ल‌िखी हैं, तुमसे मिले बिना क‌ि 
अब तुम्हारे मिल जाने पर
मैं बिलकुल एफर्टलेस हो जाना चाहती हूं।

मैं चाहती हूं क‌ि तुम्हें पुकारूं भी ना
और तुम आ जाओ।

मैं चाहती हूं क‌ि तुमसे कहूं भी ना 
और तुम समझ जाओ।

मैं चाहती हूं क‌ि तुम सुन भी न पाओ
और मी टू भी कह दो।

मैं चाहती हूं क‌ि मेरी जरूरत का अहसास 
मुझसे पहले तुम तक पहुंचे।

मैं चाहती हूं क‌ि हिचक‌ियां तुम्हें पानी की कमी से नहीं 
मेरे याद करने पर ही आएं।

मैं चाहती हूं क‌ि मेरे दिल में गहराते जा रहे सन्नाटों को पहचानो तुम
और उन्हें मिटाने के ल‌िए हर रोज गिटार की धुन पर एक नया गीत सुनाओ।

मैं चाहती हूं क‌ि तुम ये समझो क‌ि तुम्हारा मेरे पास होना
आसमान के जमीन से मिल जाने जैसा जादुई है मेरे ल‌िए
मैं चाहती हूं क‌ि तुम ये जादू मुझे हर रोज द‌िखाओ।

तुम कह सकते हो क‌ि तुम्हारे भी अपने एफर्ट्स रहे हैं 
मगर मैं फ‌िर भी यही कहूंगी क‌ि तुम हमेशा से एफर्टलेस थे
अब मैं 
तुम हो जाना 
चाहती हूं। 

सोमवार, 16 जनवरी 2017

नरेश सक्सेना की तीन जरूरी कव‌िताएं

बहते हुए पानी ने
पत्थरों पर निशान छोड़े हैं
अजीब बात है
पत्थरों ने पानी पर

कोई निशान नहीं छोड़ा।

॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

दीमकों को
पढ़ना नहीं आता
वे चाट जाती हैं
पूरी
क़िताब
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

हवा के चलने से
बादल कुछ इधर-उधर होते हें
लेकिन कोई असर नहीं पड़ता
उस लगातार काले पड़ते जा रहे आकाश पर
मुझे याद आता है बचपन में घर के सामने तारों से लटका
एक मरे हुए पक्षी का काला शरीर
मेरे साथ ही साथ बड़ा हो गया है मेरा डर
मरा हुआ वह काला पक्षी आकाश हो गया

बुधवार, 11 जनवरी 2017

दिमाग के रिसाइकिल बिन से

डियर जिंदगी

अक्सर सांसें लेते हुए भी तुम साथ नहीं होती हो और कुछ दिन पहले ऐसा हुआ कि सांसें रुकने ही वाली थीं कि तुमने आकर हाथ पकड़ लिया।
स्कूटी से एक छोटा-सा एक्सीडेंट इस बड़ी सी दुनिया की बहुत छोटी सी घटना थी, लेकिन इस छोटे से जेहन में इस घटना के ओर-छोर इतने बड़े होकर बाहर आए कि दिलो-दिमाग हिल गया। मुझे याद आया एक बार किसी ने मुझसे कहा था, 'क्या दीवान साहब छोटी-छोटी बात पर परेशान हो जाती हो, बड़े झटके कैसे झेलोगी।' कुछ बातें कैसे दिमाग के फोल्डर में हमेशा के लिए पेस्ट हो जाती हैं। डिलीट का बटन दबा दो फिर भी कहीं न कहीं कभी न कभी रिसाइकिल बिन  से बाहर निकलकर फिर अपनी जगह बना लेती हैं। ये बात भी उन्हीं बातों में से एक है।
एक झटका लगा और फिर चार दिन बिस्तर पर। वैसे तो ये सुनहरा मौका है कि जितना पेंडिंग है उतना पढ़ लिया जाए, जितना सोचा है लिख लिया जाए, लेकिन मौके अक्सर हाथ से निकल जाते हैं। तो ये मौका भी निकल ही रहा है। हां कुछ पुरानी डायरियां जरूर खोलकर पढ़ी जा रही हैं। उन्हीं में से ये एक किस्सा निकला, जो कभी किसी अखबार से मैंने अपनी डायरी में नोट किया था।
फिलॉसफिकल होने का इससे बड़ा सबूत और कुछ नहीं हो सकता कि आप हर दिन मरने के बारे में सोचें और हर दिन जीने की कोशिश करें। कोशिशें अक्सर सोच को पीछे छोड़ देती हैं। मेरी सोच को भी उस कोशिश ने पीछे छोड़ दिया।
डायरी में ये किस्सा मैंने 29 सितंबर 2008 को लिखा था। आज तारीख है 11 जनवरी 2016।

डियर जिंदगी तुम्हारे होने पर ताज्जुब करना अब बेईमानी होगी।
कोशिश करती हूं कि तुम्हारे होने के साथ मैं भी हो सकूं।


''पुराणों में कथा है कि शुक्रदेव अपने पिता के साथ जंगल में एक कुटिया बनाकर रहते थे, जब वे अभी छोटे थे, तो खेल-खेल में एक दिन उन्हें ख्याल आया कि अपनी कुटिया के बाहर गुलाब का पौधा लगाना चाहिए। खोजबीन
करके वह कहीं से गुलाब के एक-दो पौधे लाए और उन्हें कुटिया के बाहर क्यारी में रोप दिया। नित्य नियम से वे उन पौधों को सींचते, उनकी छंटाई करते और धूप से बचाने का प्रबंध करते। कुछ दिन बाद गुलाब की कली दिखाई देने लगी, लेकिन उसकी तुलना में कांटे कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहे थे। उन्होंने सोचा कि गुलाब खिलने में देर लगेगी, तब तक तो ढेरों बड़े-बड़े कांटें उग आएंगे। यह सोचकर शुक्रदेव ने पौधों की देखभाल करनी छोड़ दी।
तीमारदारी के अभाव में गुलाब के पौधे धीरे-धीरे मुरझाने लगे और आखिरकार सूख गए। पिता ने शुक्रदेव से पूछा कि उन्होंने पौधों की देखभाल एकाएक बंद क्यों कर दी। शुक्रदेव बोले- इनमें फूलों की अपेक्षा कांटें अधिक तेजी से बढ़ रहे थे, जो चुभते थे इसलिए मैंने पौधों की देखभाल छोड़ दी।
शुक्रदेव का जवाब सुनकर पिता मुस्कुराए और समझाया-
तुमने कांटों के भय से पौधों की देखभाल छोड़ दी, इसी कारण वे सूख गए, कांटों के भय से हर कोई ऐसा ही करता रहा, तो गुलाब कैसे खिलेंगे।''




मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

ईरान से सीखकर भारत भी खड़ी कर रहा है दीवार

 26 दिसंबर 2016 को अमर उजाला में प्रकाशित

दिल्ली का बुराड़ी क्षेत्र 'नेकी की दीवार' के कारण चर्चा में है। यहां की हरित विहार कॉलोनी में अंग्रेज स‌िंह दहिया ने एक दीवार को नेकी के नाम कर दिया है। इसमें उनका साथ दे रहे हैं हरित विहार आर.डब्ल्यू.एसोस‌िएशन के प्रधान विजय परोदा। विजय बताते हैं, 'तीन-चार महीने पहले अंग्रेज स‌िंह ने हमसे 'नेकी की दीवार' बनाने के  बारे में बात की। सुनने में यह आइडिया नया भी था और नेक भी। हमने उनका साथ दिया। एक दीवार चुनी और उस पर पेंट से लिखवा द‌िया- 'अधिक वाले दे जाएं, जरूरतमंद ले जाएं।' कुछ ही समय में यहां कपड़े, क‌िताबें, जूते, बर्तन और बिस्तर तक जमा होने लगे। जितने लोग रखने आते, उतने ही जरूरतमंद यहां सामान लेने भी पहुंचते। अव्यवस्था न हो, इसके ल‌िए हमने एक व्यक्त‌ि की यहां ड्यूटी भी लगाई है। जिसे महीने की तनख्वाह भी दी जाती है। अब दूसरी कॉलोनियों से भी लोग यहां आने लगे हैं। अगर भविष्य में यह दीवार छोटी पड़ेगी, तो हम आर.डब्ल्यू.ए के दफ्तर में बड़ी 'नेकी की दीवार' बनाने के ल‌िए भी तैयार हैं।' 'नेकी की दीवार' दिल्ली वालों के ल‌िए नई हो सकती है, मगर राजस्थान में अब यह एक अभियान का रूप लेती जा रही है। शुरुआत हुई थी इसी साल अगस्त में। यहां भीलवाड़ा में रहने वाले वंदना नवल और प्रकाश नवल ने अपने घर के सामने बने पार्क की दीवार को ऊंची करने के ल‌िए अर्बन इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को एक अर्जी दी। उनसे वजह पूछी गई , तो उन्होंने 'नेकी की दीवार' बनाने की बात कही। ट्रस्ट को आइडिया पसंद आया और उन्होंने इसका स्रोत पूछा, तब सामने आया ईरान। वंदना और प्रकाश ने टीवी पर ईरान की 'दीवार-ए-मेहरबानी' के बारे में एक रिपोर्ट देखी थी। साल 2015 में ईरान में बेघर और गरीबों की मदद करने के ल‌िए मशहद शहर में एक अजनबी ने इस तरह की एक दीवार बनाई थी। दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा गया था- जिनके पास जरूरत से ज्यादा है, वो इस दीवार पर टांग जाएं और जिन्हें जरूरत है, वो ले जाएं। इससे प्रेरित होकर वंदना और प्रकाश ने अपने घर के ठीक सामने नेकी की दीवार बनाने के बारे में सोचा। यूआईटी से मंजूरी मिलने के बाद कलाकार के.जी.कदम से इस दीवार को पेंट करवाया गया और नेकी का सिलसिला चल पड़ा। लोग अपनी जरूरत से ज्यादा का सामान यहां लाने लगे और जरूरतमंद ले जाने लगे। वंदना बताती हैं, ' मैं एक गृहिणी हूं। ये दीवार घर के सामने बनाने के पीछे वजह यही थी क‌ि इसका पूरा ध्यान रखा जा सके। मेरी रसोई की ख‌िड़की से दीवार साफ दिखती है। हम पत‌ि-पत्नी इसके रख-रखाव और व्यवस्था का पूरा ध्यान रखते हैं।' वंदना और प्रकाश की इस एक शुरुआत ने भीलवाड़ा ही नहीं पूरे राजस्थान में नेकी की बयार ला दी है। अकेले भीलवाड़ा में ही अब ऐसी चार दीवारें बनाई जा चुकी हैं। जयपुर भी इस सूची में शामिल हो चुका है। यूआईटी की तरफ से प्रदेश भर में इसके प्रसार को लेकर योजना बनाई जा रही है। वाराणसी, लखनऊ, झांसी, ललितपुर, चंडीगढ़, भोपाल, आगरा, गुरुग्राम और नोएडा तक भी नेकी की दीवार का यह आइडिया पहुंच चुका है। नये साल में उम्मीद की जानी चाह‌िए क‌ि यह नेक आइडिया सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं, देश भर में वायरल होगा और इंसानियत की नई मिसाल सामने आएंगी।


कराची से रोम तक                                              

ईरान के मशहद शहर से हुई 'दीवार-ए-मेहरबानी' की शुरुआत इसी साल जनवरी महीने में पाकिस्तान के कराची शहर भी पहुंची। धीरे-धीरे कराची से पेशावर, रावलप‌िंडी, लाहौर और सियालकोट तक यह संदेश गया और 'नेकी की दीवार' आकार लेती गईं। जनवरी में ही यह आइडिया चीन भी पहुंचा। यहां के ल‌िउजोउ, झेंगझोऊ और युनन प्रांत में भी 'वॉल ऑफ काइंडनेस' के नाम से नेकी का संदेश दिया जा रहा है। अफगानिस्तान के काबुल में भी मार्च महीने में 'नेकी की दीवार' बनाई जा चुकी है। रोम के मैरीमाउंट इंटरनेशनल स्कूल के बच्चों द्वारा की गई एक शुरुआत से यहां भी 'वॉल ऑफ काइंडनेस' की नींव पड़ चुकी है।



शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

दिल का ढक्कन




दिल खुलकर प्यार भी कर लेता है
और नफरत भी

मगर दिल को खोले जा सकने का कोई इंतजाम नहीं है

कोई तो दरवाजा, खिड़की या ढक्कन ही होता
जिसे खोलकर दिल में दाखिल होते और
एक झाड़ू में बुहार देते सारे कड़वे जज्बात और
नासूर सी बनती जा रही यादें

और तुम्हारे नाम पर भी मिट्टी डालकर एक पौधा उगा सकते तो
कितना अच्छा होता।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

उदास रातें

उदास रातों में जो कविताएं लिखी जाती हैं
वो अक्सर दिन के उजाले को मैला कर जाती हैं।

उदास रातों में जो ख्वाब बुने जाते हैं।
वो जिंदगी की हकीकत को और कसैला कर जाते हैं।

उदास रातों में जिन लोगों को याद किया जाता है।
उन्हें दिन के समय य़ूं ही भुला भी दिया जाता है।

उदास रातों में जिन बातों से चेहरे पर हंसी आती है
उन्हीं बातों से दिन की रोशनी में आंखों के भीतर ही भीतर नमी आती है।

उदास रातें जो कहना चाहती हैं
उन्हें सुनने की हिम्मत दिन में कहीं खो सी जाती है।

उदास रातेॆ जब पास आकर बैठती हैं
तो उदासी दोहरी हो जाती है।
दिन भर की हंसी-खुशी कोरी हो जाती है।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

प्यार की रफ कॉपी


प्यार को उस रफ कॉपी की तरह होना चाहिए था
जिस पर बार-बार गणित के सवालों का अभ्हयास किया जाता था।

पहले मासिक परीक्षा, फिर छमाही, फिर वार्षिक परीक्षा
हर परीक्षा से पहले कितनी ही कॉपियां भर जाया करती थीं
अभ्यास करते-करते।
फिर एक दिन सारा अभ्यास रद्दी में चला जाता था।
फिर एक दिन अभ्यास का असली नतीजा सामने आता था।
प्यार को उस नतीजे की तरह ही होना चाहिए था।
जो बार-बार अभ्यास के बाद सामने आता है।

मगर प्यार गणित के सवालों की तरह सिर्फ पेचीदा ही रहा
प्यार के गणित को बार-बार अभ्यास करके हल करने का मौका नहीं मिला।

एक भी कॉपी पूरी नहीं भर पाई।

जितने भी पन्ने भरे, सब पर काटे का निशान लगाना पड़ा।
सारे सवाल गलत हल हो गए थे।

अभ्यास करने का  मौका नहीं दिया गया।
समय पूरा हो चुका था।
उत्तर पुस्तिका छीन ली गई।


नतीजा क्या होता...।





गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

तुझे ल‌िखकर, पढ़ना


तुझे पढ़कर
लिखना चाहिए था।
तुझे लिखकर
पढ़ना मुश्किल पड़ रहा है अब।


तुझे मेरी आंखों में देखना चाहिए था
एक दफा
मेरे होंठों पर ठहर जान ा  तेरा
खल रहा है अब


न किए होते तूने मुझसे वादे अगर
मैं शिकायत भी न करती
तेरा वादों से पलट जाना
अखर रहा है अब


ना ना ना करते भी
मंजूर किया है मैंने रब का हर सितम
मगर तेरे आगे अपना बिखर जाना
मुझे कसक रहा है अब

रविवार, 20 दिसंबर 2015

अकेले

'तुम्हारे साथ कोई नहीं है क्या बेटा', चौकीदार ने पूछा। 
'नहीं'। लड़की ने कहा। 
'तो यहां मत रुको, चली जाओ', चौकीदार ने समझाते हुए कहा।
'हम्म्म....बस कुछ फोटो खींचकर, थोड़ा घूमकर चली जाउंगी।'लड़की ने कहा।
'मैं इसलिए कह रहा हूं कि यहां ज्यादातर खाली ही रहता है। कुछ चरसी-नशेड़ी भी घूमते रहते हैं। अकेली लड़की हो, किसी के साथ होतीं, तो कोई बात नहीं थी।' चौकीदार ने फिर समझाया।
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। अलग-अलग एंगल से फोटो खींचने की कोशिश की और जब देखा कि सच में एक अजीब सा लड़का उसे ही घूर रहा है, तो वहां से निकल गई।

रास्ते में उसने गुलाब के दो फूलों की तसवीर ली। 
झूला झूलते दो बच्चों की तसवीर ली। 
एक-दूसरे के पीछे भागती दो गिलहरियों की तसवीर ली। 
बैडमिंटन खेलते एक लड़का और एक लड़की की तसवीर ली। 
एक-दूसरे के गले में हाथ डाले, कंधे पर बैग लटकाए स्कूल से लौटते दो बच्चों की तसवीर ली।
उसने अपनी एक भी तसवीर में अकेलेपन को कैद नहीं किया। 
उसे खौफ होने लगा था अकेलेपन से, अकेलेपन नाम के शब्द से भी। 

घर में पिछले कई दिनों से ये एहसास उसे तंग किए था कि वो अकेली हो गई है। उसके साथ कोई नहीं है। उसके पास कोई नहीं है। इस अहसास को भगाने के लिए वो घर से निकली थी- दिल्ली की अकेली गलियों में, अकेली इमारतों को देखने। सोचा होगा, कि अपना अकेलापन वो उन वीरान सी पड़ी इमारतों के साथ बांटकर किसी के साथ होना महसूस कर सकेगी। 
काफी समय पहले उसने दिल्ली के महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क के बारे में पढ़ा था। गुलाब का बड़ा सा बगीचा, कई मकबरे, दो बावड़ी और एक मस्जिद होने के बावजूद भी २०० एकड़ के इस पार्क के बारे में पढ़कर उसे ये पार्क अकेला ही लगा। अपने अकेलेपन से गुजरते हुए इस पार्क का अकेलापन भी उसे याद आया। पता नहीं उसने अपने अकेलेपन को इस जगह के साथ बांटना चाहा या इस पार्क के अकेलेपन को अपने साथ। मगर वो सुबह ही घर से निकल गई अकेलेपन को जड़ से खत्म करने के मिशन पर। मगर चौकीदार के एक सवाल ने उसके सारे मिशन को फेल कर दिया था। ('तुम्हारे साथ कोई नहीं है क्या बेटा') ये सवाल उसके कानों में गूंजता ही जा रहा था।  वो फिर भारी मन से घर लौटी थी और भी ज्यादा अकेली होकर।  

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

जीरो

अकेले कितना उदास दिखता है जीरो
जैसे कोई अस्तित्व ही न हो

जैसे ही कोई संख्या करीब आकर खड़ी होती है
ऐसे लगता है- खिल उठा हो

कुछ होकर भी
जीरो के बिना संख्या, ज्यादा कुछ नहीं हो पाती

कुछ न होकर भी
संख्या के साथ, जीरो बहुत कुछ हो जाता है

जिंदगी, जीरो जैसी हो गई है
जिसे हर वक्त
एक संख्या की तलाश है

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

गुरु दत्त

फिल्मों के देखने, जानने और थोड़ा बहुत समझने के काफी अरसे बाद मैंने गुरु दत्त को जाना। जब जाना, तो इस जान-पहचान को और बढ़ाने का मन किया। इसलिए उनकी फिल्में देखीं। जितना ज्यादा जाना उतना ही ज्यादा उनकी कला और हुनर की अहमियत समझ आती गई। इसी सफर में नसरीन मुन्नी कबीर की लिखी एक किताब 'गुरु दत्त- हिंदी सिनेमा का कवि' हाल में पढ़ी है। इसी किताब से कुछ दिलचस्प बातें-

 

हवा में जोर से उड़ते परदे, शरद ऋतु में पत्तियों की अंतिम फड़फड़ाहट की तरह हवा में उड़ते कागज, छाया और प्रकाश में रहस्यमय तरीके से एकांत में  चलता व्यक्ति ... ऐसा चित्रण अनगिनत व्यक्तियों को झकझोरता रहा है। यही वजह है शायद कि मृत्यु के तीस साल बाद भी गुरु दत्त की कला एक जीवित शक्ति से ज्यादा रही।

वास्तव में भारतीय सिनेमा में उनके योगदान की पूरी पहचान सन् 1964 के कुछ वर्षों के बाद ही हुई। 'प्यासा' देखने के बाद एक अमेरिकी विद्धान ने टिप्पणी की थी - 'यदि गुरु दत्त का काम उनके जीवनकाल में ही विश्वविख्यात होता तो उनकी गिनती भी डगलस पार्क और बिली विल्डर जैसे व्यक्तियों में होती।'

1925 के जुलाई माह में बरसात के मौसम में बैंगलोर में गुरु दत्त का जन्म हुआ था।

उनका नाम गुरु दत्त होने के पीछे वजह थी कि उनका जन्म गुरुवार के दिन हुआ था, जो कि गुरु का दिन होता है। इसलिए उनके मामा ने उनका नाम गुरु दत्त रखा। वैसे उनका असल नाम शिवशंकर पादुकोण था।

सोलह साल की उम्र में गुरु दत्त को अपनी पहली नौकरी एक टेलीफोन ऑपरेटर के तौर पर मिली थी। उनकी मासिक तनख्वाह 40 रुपये थी। आत्माराम और ललिता उनके भाई और बहन को याद है कि गुरु दत्त ने अपनी इस पहली तनख्वाह से अपने पूरे परिवार के लिए तोहफे खरीदे थे।

शुरुआत में नृत्य के प्रति रुझान उन्हें अल्मोड़ा उदय शंकर की डांस अकेडमी ले गया।
फिर फिल्म बनाने की चाह उन्हें प्रभात स्टूडियो ले गई।

लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि आज की भौतिकतावादी जिंदगी में एक कलाकार की कीमत कितनी कम थी और कैसे एक रचनात्मक दिमाग को संतुष्ट करने के लिए व्यक्तिगत प्रतिभा ही काफी नहीं होती। उन अवसादपूर्ण दिनों में, बंटवारे के कुछ दिनों बाद, गुरु दत्त ने 'प्यासा' का पहला ड्राफ्ट लिखा। शुरुआत में इसका नाम 'कशमकश' रखा गया था।

एक बार गीता बाली की बहन ने गुरु दत्त से कहा, 'आप क्यों नहीं अभिनय करते।'
वह कभी मानते न थे कि वह अभिनय कर सकते हैं। वह चाहते भी न थे। 'आर-पार' के लिए शम्मी कपूर को लेने की काफी कोशिश की गई औऱ 'मिस्टर एंड मिसेज 55' के लिए सुनील दत्त का कैमरा टेस्ट भी लिया गया। सभी इंतजाम होने के बाद गुरु दत्त बेचैन हो जाते थे। उपयुक्त नायक न मिलने पर वह खाली तो नहीं बैठ सकते थे, इसलिए उन्होंने स्वयं ही अपनी फिल्मों में काम करने का निश्चय किया। इसलिए उन्होंने 'बाज' फिल्म में अभिनय किया।

कई पटकथा लेखकों के साथ काम करने के निराशाजनक अनुभव के बाद सौभाग्य से उनकी मुलाकात अबरार अल्वी से हुई। अल्वी नागपुर से थे और उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की थी। वह नागपुर से मुंबई अभिनेता बनने की इच्छा लेकर आए थे। अल्वी के रिश्ते के भाई ने अल्वी का परिचय राज खोसला से करवाया। जब राज ने जाना कि अल्वी एक अच्छे लेखक हैं, तो उन्होंने उनसे 'बाज' के संवादों को पुन लिखने को कहा। गुर दत्त उनके कम से प्रसन्न हुए और आगे की फिल्म 'आर-पार' में उनके साथ काम करने को कहा।

गुरुदत्त के काम में अबरार अल्वी का सहयोग आसानी से आंका नहीं जा सकता। कई दिनों और महीनों तक साथ रहने के कारण समय के साथ उनकी दोस्ती बढ़ती गई। आखिरकार गुरु दत्त को एक ऐसा लेखक मिल गया, जो सिनेमा के माध्यम को समझता था। 40 के दशक की कई फिल्मों के अधिकतर पात्र चाहे वह राजा हो या सामान्य व्यक्ति, एक ही शैली में बात करते हुए देखे जा सकते हैं। अल्वी की यही खासियत थी कि वे अपने पात्रों को एक विशिष्ट पहचान दे सके। उनके प्रत्येक पात्र के संवाद उसके समाज तथा क्षेत्रीयता की पहचान दिलाते थे।

गुरु दत्त को उनके जानने वाले आज भी याद करते हैं उनकी अनिश्चितता को लेकर, चंचल मन को लेकर, बार-बार शूटिंग करने की आदत को लेकर।

30 अक्तूबर 1964 को  उनके निधन पर फिल्मफेयर ने एक ऐसा लेख छापा, जिसका शीर्षक था- खुदा, मौत और गुलाम,     कैफी आजमी ने गुरु दत्त की याद में एक कविता लिखी, जिसे इसके अग्रलेख में छापा गया-

'रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई,
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।'

किताब में शामिल गुरु दत्त के लिखे एक लेख का अहम अंश

अगर साहित्य, काव्य या चित्रकला को पैसों के लिहाज से उचित पुरस्कृत नहीं किया जाता या नहीं पहचाना जाता तो यह अधिकतर उन लोगों की प्रवृत्ति  को दर्शाता है, जिन्हें उसका दायित्व उठाना चाहिए, न कि उस महान तपस्वी का, जिसने उसकी रचना की है। यही सच्चाई फिल्म के साथ भी है। अगर वह सचमुच में क्लासिक फिल्म है, पर अपेक्षित कमाई नहीं करती, तो उसका दोष पूरी तरह से रचनाकार पर नहीं मढ़ा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि वित्तीय सफलता व विफलता अक्सर दर्शकों की सौंदर्यानुभूति की क्षमता, बौद्धिक स्तर तथा उनकी इच्छाओं- आकांक्षाओं आदि बाहरी तत्वों पर निर्भर रहती है। कई शताब्दियों से गौरव ग्रंथों के रचनाकार लीक से हटकर चलने और वर्तमान चलन से ऊपर उठने के दुःसाहस का दंड भोगते रहे हैं।

आइए हम कुछ उदाहरण देखें-
कहा जाता है कि महान कवि होमर को अपने जीवनकाल में भीख मांगनी पड़ी। उन सात नगरों ने होमर को मृत घोषित किया, जहां जीवित होमर जीने के  लिए भीख मांगते थे।

गोल्ड स्मिथ को विकार ऑफ वेकफील्ड की पांडुलिपि की पांडुलिपि को अपना किराया भरने के लिए बेचना पड़ा। जॉनसन ने रसेल्स लिखकर अने परिवार के एक सदस्य के अंतिम संस्कार का खर्चा पूरा किया।

वान गॉग को रंग खरीदने के लिए कई सप्ताहों तक भूखा रहना पड़ा- अपनी पेंटिंग सूरजमूखी के फूल को कैनवास पर उतारने के लिए।

अपने ही देश में रामायण के रचनाकार तुलसीदास को आर्थिक संकटों से गुजरना पड़ा।

काव्यमयी महानता के बावजूद कबीर को अंत तक एक गरीब जुलाहे की तरह रहना पड़ा।

नरेश मेहता को जिन्होंने वैष्णव जन जैसे कालजयी गीत लिखे, को अपने सबसे पसंदीदा राग केदार को गिरवी रखना पड़ा अपने घरेलू जीवन का ऋण चुकाने के लिए।

सोमवार, 11 मई 2015

दो बाल्टी पानी

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।

फिर

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
पहले नींद आई
फिर सपने आए
फिर सुबह हुई।


ऐसा ही होता रहा
कई बरसों तक
सपने आकर जाते रहे
कुछ सच हुए
कुछ बस सताते रहे

मगर
एक दिन जब

रात हुई
बिस्तर सजा
आंखें बंद की
तो न नींद आई
न सपने आए

क्योंकि उस रोज
सपना दिन में ही देख लिया था
मैंने देखा था अपनी आंखों से
राजस्थान के एक गांव में रहने वाली 

लड़की की आंखों में तैरते सपने को
वो 

एक दिन 
दो बाल्टी पानी से नहाना चाहती थी।





रविवार, 19 अप्रैल 2015

खबर कहती है

आकाश चुप है
धरती चुप

जंगल चुप है
समंदर चुप

खेत भी चुप हैं, बाग भी
महल भी और किले भी हैं चुप

हवा भी चली चुपचाप ही
चुप्पी साधे बर्फ भी पिघल रही है न जाने कब से

मगर खबरों में बहुत शोर है इस चुप्पी का

खबर कहती है- जंगल कट रहे हैं
फिर जंगल से चीखने की आवाज क्यों नहीं आती

खबर कहती है- समंदर मैला हो रहा है
फिर समंदर क्यों नहीं छीन लेता हमसे उसे देखने का सुकून

खबर कहती है- धरती बंजर हो रही है, खेत सूख रहे हैं
फिर मिट्टी इनकार क्यों नहीं कर देती बीज को अपनाने से

खबर कहती है- महल और किलों की दीवार रंगी जा रही है अपशब्दों और अश्लील चित्रों से
फिर क्यूं नहीं कर देते ये महल और किले एलान-ए-जंग

खबर कहती है- हवा में घुल रहे हैं हानिकारक तत्व
फिर हवा चल क्यों रही है
मना क्यों नहीं कर देती चलने से

फिर क्यूं...
आकाश चुप है
धरती भी चुप

क्यों
जंगल चुप है
समंदर चुप

क्यों
खेत और बाग चुप हैं
और क्यों महल किले चुप

क्यों
हवा भी चुपचाप चले जा रही है और
क्यों
बर्फ की चुप्पी टूटती नहीं

क्यों?

शनिवार, 29 नवंबर 2014

तीन ब‌िंद‌िया

कभी बातों से पहले
और कभी बाद में दर्ज होती हैं
वो जो तीन ब‌िंदियां
असंख्य शब्द छिपे होते हैं उनमें
और 
सैंकड़ों भावनाएं
लाखों फलसफे
करोड़ों अफसाने भी हो सकते हैं 
आप स्वतंत्र हैं चुनने के ल‌िए 
जो चाहें।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

अलहदा




इन कविताओं को एक साथ पोस्ट करना खुद को
 एक कलाकार जैसा महसूस करना है।
विकल्प

विकल्पहीनता
को कभी गहराई से महसूस करके देखना
इससे सुखद अहसास नहीं मिलेगा
विकल्पों की इस भीड़ में।


तुम

तुम्हें समंदर की तरह होना चाहिए था
मगर तुम पहाड़ जैसे थे
मैं नदी नहीं बन सकी
दरिया ही रही
समंदर में जा मिलना ही
शायद नसीब था मेरा।


लिखना

जीती हूं तो लिखती हूं
लिखती हूं तो जी लेती हूं
डरती हूं मगर
लिखने को जुर्म न करार दे दे कहीं
उसकी अदालत।


राजनीति

अब से
मेरी भी अपनी एक राजनीति है
मैं राज को राज रखकर
नीतियों को नींद की गोली खिलाकर
खुद को जगाना चाहती हूं जीने के लिए।


अंधेरा

अंधेरे का होना
रोशना का न होना नहीं है
अंधेरे का होना
अंधेरे का ही होना भी नहीं है
अंधेरे का मतलब
आंखों को कुछ समझ ना आना है
बस।



समर्पण

मेरा हर समर्पण बेकार था
क्योंकि
मैं अपना

शरीर सौंपने में
हिचकिचाई थी जरा।



कमजोरी

उस दिन हैंड ड्रायर से हाथ सुखाते हुए मैंने सोचा काश आंसुओं को सुखाने के लिए भी ऐसा कोई ड्रायर होता . . फिर मुझे याद आया आंसुओं का स...